Mahabharat: महर्षि वेदव्यास द्वारा लिखी गई महाभारत रोचक जानकारियों से भरी पड़ी है. एक रोचक कहानी ऐसे योद्धा की है, जिसने महाभारतकाल में भगवान कृष्ण को भी परास्त कर दिया था. बात उस समय की है- जब वनवास से लौटने के बाद पांडवों ने इंद्रप्रस्थ को अपनी राजधानी बनाई थी और ‘मायासभा’ नाम का भव्य महल बनवाया था. आइए जानते हैं इस पूरी दिलचस्प कहानी को-
पढ़िए उस योद्धा की दिलचस्प कहानी, जिसको भगवान भी नहीं कर पाए परास्त.
Mahabharat: महर्षि वेदव्यास द्वारा लिखी गई महाभारत रोचक जानकारियों से भरी पड़ी है. बस जरूरत है उनको खोजने की. एक रोचक कहानी ऐसे योद्धा की है, जिसने महाभारतकाल में भगवान कृष्ण को भी परास्त कर दिया था. बात उस समय की है- जब वनवास से लौटने के बाद पांडवों ने इंद्रप्रस्थ को अपनी राजधानी बनाई थी और ‘मायासभा’ नाम का भव्य महल बनवाया था. इस नई राजधानी में सबसे पहले नारद मुनि का पदार्पण हुआ. जब युधिष्ठिर ने उनका सत्कार किया तो नारद जी ने उन्हें ‘राजसूय यज्ञ’ करने की सलाह दी. साथ ही कहा, इस यज्ञ के जरिये खुद को स्थापित करना आपका कर्तव्य है. नारद मुनि का यह विचार युधिष्ठिर को अच्छा तो लगा, लेकिन कुछ सोच में पड़ गए. फिर युधिष्ठिर ने नारदजी से ही पूछ लिया कि- यह राजसूय यज्ञ कैसे किया जाता है? इस पर नारद ने कहा- पहले आप अपने दूतों को भारतवर्ष के कोने-कोने में भेजेंगे कि आप ही राजाओं के राजा हैं. यदि कोई आपका या आपके दूतों का विरोध करता है, तो उसे युद्ध में पराजित करना होगा. इसके बाद आप यहां इन्द्रप्रस्थ में राजसूय करेंगे, जिसमें आपके सभी मित्र और सहयोगी भाग लेंगे. ऐसा यज्ञ करना आसान नहीं है. नारद मुनि के जाने के बाद युधिष्ठिर ने अपने भाइयों और श्रीकृष्ण से परामर्श किया.
युधिष्ठिर के कहने पर श्रीकृष्ण विचारमग्न होने के बाद बोले- एक राजा है, जिसे पराजित करना कठिन होगा. उसका नाम है जरासंध, जो गिरिव्रज में शासन करता है. मेरे मामा कंस का विवाह जरासंध की पुत्रियों से हुआ था. कंस को मारने के कारण वह मुझे अपना दुश्मन मानता है. मेरा भी जरासंध से युद्ध में 18 बार आमना-सामना हो चुका है, पर मैंने उसे कभी पराजित नहीं कर पाया. उस जरासंध के कारण ही हमें मथुरा छोड़कर द्वारका जाना पड़ा. कृष्ण की आपबीती सुनकर युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ का विचार त्यागने का मन बना लिया. लेकिन, भीम और अर्जुन जरासंध को चुनौती देने के पक्ष में थे. भगवान कृष्ण ने चेतावनी देते हुए कहा कि जरासंध भगवान शिव का भक्त है और उसे उनकी सुरक्षा प्राप्त है. उसने अनगिनत राजाओं को बंदी बना रखा है, ताकि उनकी बलि दे सके. भगवान की इतनी बात सुनते ही अर्जुन के तन में मानो आग सी लग गई हो. तुरंत अर्जुन ने गरजते हुए कहा कि हम सभी योद्धा हैं और धर्म के पुत्र धर्मराज हैं. ऐसे में उन राजाओं को बचाना हमारा कर्तव्य है. फिर चाहे इसके लिए जरासंध को हराना पड़े. अनिच्छा के बावजूद युधिष्ठिर को बात माननी पड़ी.
‘महाभारत: नई पीढ़ी के लिए’ किताब में नमिता गोखले लिखती हैं कि जरासंध के जन्म की कहानी भी बड़ी दिलचस्प थी. जरासंध मगध के राजा बृहद्रथ का पुत्र था. बृहद्रथ की दो जुड़वा बहनें पत्नियां थीं और दोनों ही निसंतान थी. पुत्र की आस में बृहद्रथ बहुत दुखी रहता था. एक दिन राजा अपना राज्य छोड़कर वन में तपस्या के लिए चला गए. पति के साथ दोनों पत्नियां भी गईं. वन में उनकी भेंट एक प्रसिद्ध ऋषि से हुई, जो उनकी भक्ति से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने बृहद्रथ को इस आशीर्वाद के साथ एक मायावी आम दिया कि जब उनकी पत्नी इसे खाएगी तो उसे पुत्र होगा. राजा ने फल को दो बराबर भागों में काटा और अपनी दोनों प्रिय रानियों को एक-एक टुकड़ा दे दिया.
आम खाने के बाद राजा बृहद्रथ की दोनों पत्नियां गर्भवती हो गईं, लेकिन बच्चों के जन्म के बाद राजा की खुशी डर में बदल गई. दोनों रानी ने एक आंख, एक हाथ, एक पैर आदि के साथ आधे बच्चे को जन्म दिया. रात को जब रानियां सो रही थीं, तब दाई ने दोनों आधे बच्चों को काले कपड़े में लपेटा और शहर के फाटक के बाहर रख आई. उसी रात जरा नाम की एक भूखी राक्षसी भोजन की खोज में घूम रही थी. उसकी नजर बच्चों पर पड़ी. उसने जैसे ही दोनों बच्चों को उठाया वे चमत्कारिक रूप से जुड़ गए. आंख से आंख मिल गईं, हाथ से हाथ, पैर से पैर.
अब जरा के हाथों में एक सुंदर-स्वस्थ बच्चा रखा था. जरा अपनी आंतरिक शक्तियों से जान गई कि ये बच्चा राजा बृहद्रथ का है. उस राक्षसी ने बच्चे को मारने की जगह राजा को लौटाने का फैसला किया. जरा राजा बृहद्रथ के पास गई और पूरी घटना सुनाई. राजा प्रसन्न हुए और अपने बेटे का नाम जरासंध रखने का निर्णय लिया, जिसका अर्थ है “वह जिसे जरा ने जोड़ा हो…
युधिष्ठिर के हामी भरने के बाद कृष्ण, अर्जुन और भीम मगध राज्य में गिरिव्रज के लिए प्रस्थान कर गए. तीनों सरयू नदी पार कर मिथिला से होते हुए और फिर गंगा नदी पार करके मगध पहुंचे. जरासंध की राजधानी में पहुंचने से पहले उन्होंने स्नातकों की तरह वेश धारण किया, अर्थात ब्राह्मण छात्र जिन्होंने अभी-अभी अपनी शिक्षा पूरी की है. नगर के लोगों ने उन्हें देखा और आश्चर्य में एक-दूसरे से फुसफुसाए कि न जाने वे कौन हैं. छद्मवेशधारी पांडव और कृष्ण ने जरासंध के महल में प्रवेश मुख्य द्वार से नहीं, बल्कि चतुराई से दीवार फांदकर किया. अंदर आकर उन्होंने राजा से मिलने की मांग की. जरासंध अपनी प्रार्थना में डूबा था. पर उसने अतिथियों को दूध और शहद खिलाने का निर्देश दिया और उनसे प्रतीक्षा करने का अनुरोध किया. अतिथियों जलपान से इनकार कर दिया और अधीरता से उसकी उसने प्रतीक्षा करने लगे.
जरासंध आधी रात के बाद अपनी पूजा से उठा और तीनों को देखकर सवाल किया- तुम्हारे शरीर छात्रों और पुजारियों की तरह नरम नहीं लगते. तुम्हारे कंधों पर धनुष के भार के चिह्न हैं. तुम तो अस्त्र चलाने वाले लोग लगते हो. आखिर तुम तीनों हो कौन? इस पर कृष्ण ने गरजते हुए कहा- वास्तव में हम तुम्हारे शत्रु हैं. मैं कृष्ण हूं और ये पांडव भाई अर्जुन और भीम हैं. हम तुम्हें चुनौती देते हैं तुम हममें से जिससे चाहो लड़ सकते हो. जरासंध ने उनकी ओर तिरस्कार से देखा और उपहास उड़ाते हुए कहा- मैं तुम्हें पहले ही अठारह बार पराजित कर चुका हूं और अब तुम्हारे साथ फिर लड़ने के लिए तैयार नहीं हूं. अर्जुन अभी भी एक बालक की तरह दिखता है. केवल भीम ही इतना बड़ा और शक्तिशाली है कि मुझसे मुकाबला कर सकता है. मैं उसी से युद्ध करूंगा.
भीम और जरासंध के बीच मुकाबला शुरू हो गया. दोनों ने एक-दूसरे को आंका. भीम ने जरासंध पर छलांग लगाई और उसे चित करने का प्रयास किया लेकिन वह आसानी से बच गया. दिन या रात की परवाह किए बिना दोनों 14 दिन और रात लड़ते रहे. धीरे-धीरे भीम ने बाजी मारनी शुरू कर दी थी. जैसे ही जरासंध थकने लगा भीम ने उसे हवा में उठा लिया और सौ बार घुमाकर जमीन पर पटक दिया. इसके बाद भीम ने उसे फिर से पकड़ा और उसके पैरों को तब तक जोर से खींचता रहा जब तक कि जरासंध के शरीर के दो हिस्से नहीं हो गए. कृष्ण और अर्जुन ने आश्चर्य से देखा कि राजा बीच से दो भागों में बंट गया था. हालांकि, दोनों हिस्से चमत्कारिक रूप से एक-दूसरे की ओर वापस खिंचे, रक्त त्वचा और मांसपेशियां मिलकर फिर एक हो गए और जरासंध फिर उठ खड़ा हुआ.
कृष्ण यह देख पूरा माजरा समझ गए. उन्होंने पास के पेड़ से एक पत्ता तोड़ा. भीम का ध्यान आकर्षित करके उन्होंने पत्ते को दो भागों में फाड़ा और दोनों टुकड़ों को विपरीत दिशाओं में फेंक दिया. भीम तुरंत समझ गए कि कृष्ण उसे क्या बताना चाह रहे हैं. अपनी सारी शक्ति इकट्ठी कर वह एक बार फिर जरासंध पर टूट पड़. उसके पैर पकड़े और उसे बीच से फाड़ दिया. फिर जरासंध के खंडित शरीर के दोनों हिस्सों को एक-दूसरे से जितना सम्भव हो सका, दूर फेंक दिया. उसके शरीर के दोनों हिस्से थोड़ी देर के लिए तड़पे और फिर ठंडे हो गए. इस तरह बलवानों में सबसे शक्तिशाली राजा जरासंध की मृत्यु हुई.
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