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बंगाली हिंदू किस दाल को मानते हैं मांसाहारी? महाभारत काल से है गहरा संबंध, जानें इस मान्यता के पीछे छिपी दिलचस्प कहानी

मसूर दाल मांसाहारी मान्यता: क्या आप जानते है कि मसूर दाल को बंगाली हिंदू में मांसाहारी माना जाता है? ऐसे में चलिए विस्तार से जानें कि ऐसा क्यों है और महाभारत काल से इसका क्या संबंध है.

Masoor Dal Non Vegetarian Belief: भारतीय थाली में दालें एक अहम भूमिका निभाती है. आप देश के किसी भी हिस्से में चले जाए, वहां आपकों खाने में एक कटोरी दाल जरूर मिलेगी. लोग भले ही शाकाहारी हो या मांसाहारी हर कोई दाल चावल और रोटी के साथ खाना पसंद करते है. लेकिन क्या आप जानते है कि बंगाली हिंदुओं में एक दाल है जो अपनी विवादित पहचान के लिए जाना जाता है. यह दाल लाल मसूर है, प्लांट बेस्ट खाना होने के बावजूद इसे अक्सर तामसिक या मांसाहारी माना जाता है. ऐसे में चलिए विस्तार से जानें कि मसूर दाल को मांसाहारी क्यों माना जाता है और इसका महाभारत काल से क्या कनेक्शन है.

मसूर दाल को तामसिक\ मांसाहारी क्यों माना जाता है?

हिंदू धर्म में, खाने की चीज़ों को तीन कैटेगरी में बांटा गया है:
  • सात्विक (शुद्ध),
  • राजसिक (उत्तेजक)
  • तामसिक (भारी या अशुद्ध)
मसूर दाल, प्याज और लहसुन की तरह, तामसिक कैटेगरी में आती है. माना जाता है कि ये खाने की चीज़ें सुस्ती बढ़ाती हैं, दिमाग को धुंधला करती हैं और नेगेटिव या कामुक विचारों को बढ़ावा देती हैं. इसीलिए ब्राह्मण, साधु, और तपस्वी, जो आध्यात्मिक पवित्रता की कोशिश करते हैं, इन्हें खाने से बचते हैं.

बंगाली विधावाओं को क्यों मना था मसूर दाल

एक समय था जब विधवाओं को मसूर दाल नहीं खानी पड़ती थी, खासकर बंगाली घरों में, जहां उनसे पूरी तरह शाकाहारी रहने की उम्मीद की जाती थी. लहसुन, प्याज़ और पुई साग जैसी कुछ सब्ज़ियों के साथ, लाल मसूर दाल को भी ज़्यादा प्रोटीन होने की वजह से मना माना जाता था. माना जाता था कि ये हॉर्मोन को बढ़ा सकती हैं और सेक्स की इच्छा बढ़ा सकती हैं, जिसे विधवाओं से धार्मिक अनुशासन के नाम पर दबाने की उम्मीद की जाती थी.

मसूर दाल का क्या है महाभारत से कनेक्शन?

महाभारत की एक कहानी भी है जो इस विश्वास को एक पौराणिक पहलू देती है. द्वापर युग में, हैहय वंश के राजा सहस्त्रबाहु अर्जुन ने ऋषि जमदग्नि से दिव्य गाय कामधेनु चुराने की कोशिश की थी. जब गाय घायल हो गई और उसका खून बहने लगा, तो कहा जाता है कि जहां भी उसका खून ज़मीन पर लगा, वहां मसूर दाल उग आई. क्योंकि कामधेनु को एक पवित्र, दिव्य प्राणी माना जाता है, इसलिए उनके दुख से जुड़ी कोई भी चीज़, जैसे लाल मसूर, अशुद्ध मानी जाती थी. इसलिए, कुछ ब्राह्मणों ने उन्हें खाने से बचना चुना.

गौड़ीय वैष्णव धर्म

बंगाली खाने-पीने की परंपराएं गौड़ीय वैष्णव धर्म से बहुत ज़्यादा प्रभावित हैं. इस परंपरा में, मसूर दाल की तुलना अक्सर मीट से की जाती है और इसे पूजा-पाठ या प्रसाद के लिए सही नहीं माना जाता है. ऐसा शायद उनके गहरे रंग की वजह से होता है, जिससे वैष्णव आमतौर पर बचते हैं. काले या लाल खाने को अक्सर अशुभ माना जाता है, और यह नफ़रत उनके खाने और पूजा-पाठ दोनों में दिखती है.

राक्षसी खून से पैदा हुआ मसूर दाल

एक और मान्यता राहु और केतु की पौराणिक कहानी से जुड़ी है. जब भगवान विष्णु ने राक्षस स्वरभानु का सिर काटा, तो उसका खून ज़मीन पर गिर गया. कहा जाता है कि राक्षसी खून की इन बूंदों से मसूर दाल उगी थी. इस कहानी को मानने वालों के लिए, यह जुड़ाव दाल को अशुद्ध या नॉन-वेजिटेरियन कहने के लिए काफी है.
Shristi S

Shristi S has been working in India News as Content Writer since August 2025, She's Working ITV Network Since 1 year first as internship and after completing intership Shristi Joined Inkhabar Haryana of ITV Group on November 2024.

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