Early Arthritis in Adults: आज के वक्त में 10 में से 8 लोग आर्थराइटिस से जुड़े दर्द से परेशान हैं. वजह सिर्फ एक कम उम्र में जो पोषण तत्व हमारे शरीर को मिलेने चाहिए उसकी कमी. आराम पसंद लाइफस्टाइल की वजह से हड्डियों की सेहत पर काफी बुरा असर पड़ा है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, चाय, रोटी और दाल पर आधारित रोज़ाना का भारतीय डाइट पैटर्न, हर उम्र के लोगों में हड्डियों की सेहत में गिरावट और जोड़ों की शुरुआती समस्याओं में तेज़ी से योगदान दे रहा है. ऐसे में चलिए विस्तार से जानें की कैसे न्यूट्रिशन की कमी, लाइफस्टाइल की आदतें और छिपी हुई कमियां भारतीयों में जल्दी आर्थराइटिस और जोड़ों के दर्द का कारण बन रही हैं.
क्या है एक्सपर्ट का कहना?
मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल में रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट और ऑर्थोपेडिक्स के सीनियर डायरेक्टर डॉ. साइमन थॉमस ने चेतावनी दी, हॉस्पिटल में 30 और 40 की उम्र के मरीज़ों की संख्या बढ़ रही है, जो घुटने के दर्द, पीठ दर्द और अकड़न की शिकायत करते हैं, जो पहले बुज़ुर्गों में ज़्यादा आम थीं.
स्टडीज कहती हैं कि छह में से एक भारतीय आर्थराइटिस से जुड़े दर्द से परेशान है और लगभग दो-तिहाई मामले महिलाओं के हैं, जो देश पर बढ़ते बोझ को दिखाता है. लंबे समय से चली आ रही न्यूट्रिशन की कमी एक बड़ी वजह बन रही है. जरूरी कैल्शियम, विटामिन D, हाई-क्वालिटी प्रोटीन और ज़रूरी माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी वाली डाइट धीरे-धीरे हड्डियों और कार्टिलेज को कमज़ोर कर देती है.
भारतीय खाना हड्डियों की समस्याएं कैसे पैदा करता है?
डॉ. थॉमस के अनुसार, आम तौर पर यह माना जाता है कि रेगुलर घर का बना खाना अपने आप सभी न्यूट्रिशनल ज़रूरतों को पूरा कर देता है. लेकिन, हड्डियों को सपोर्ट करने वाले न्यूट्रिएंट्स की कमी से बार-बार होने वाले पैटर्न धीरे-धीरे कमियां पैदा करते हैं. डॉ. थॉमस ने कहा कि कम उम्र के मरीज़ों में कार्टिलेज जल्दी पतला होने और हड्डियों की डेंसिटी कम होने की समस्या आ रही है, जिसे समय पर ठीक करके रोका जा सकता था. ज़्यादा चाय पीने से कैल्शियम एब्ज़ॉर्प्शन में और रुकावट आ सकती है. साथ ही, कम धूप में रहने से विटामिन D की कमी और बढ़ जाती है, जो दोनों ही हड्डियों की मज़बूती के लिए बहुत जरूरी हैं.
लाइफस्टाइल के कारण जो इसे और खराब करते हैं?
आजकल की बैठे रहने वाली दिनचर्या इस समस्या को और बढ़ा देती है. लंबे समय तक बैठे रहना, कम फ़िज़िकल एक्टिविटी, और वज़न उठाने वाली एक्सरसाइज़ की कमी हड्डियों की स्टिम्युलेशन को कम करती है, जो हड्डियों की डेंसिटी बनाए रखने का एक ज़रूरी कारण है. महिलाएं इन वजहों से खास तौर पर कमज़ोर होती हैं:
-बेसलाइन हड्डियों की डेंसिटी कम होना
-समय के साथ हार्मोनल बदलाव
30 के बाद खास ध्यान रखने की जरूरत
पारस हेल्थ में सीनियर डायरेक्टर और ऑर्थोपेडिक्स और ट्रॉमा के हेड, डॉ. अरविंद मेहरा बताते हैं कि बहुत से लोगों को यह पता नहीं होता कि रोज़ाना की खाने की आदतें धीरे-धीरे हड्डियों की मजबूती को कम कर सकती हैं. वह इस बात पर ज़ोर देते हैं कि प्रिवेंटिव ऑर्थोपेडिक केयर 30s की उम्र से ही शुरू हो जानी चाहिए. उन्होंने कहा कई युवा मरीज़ों को यह पता नहीं होता कि रोज़ाना की खाने की आदतें, अगर ठीक से बैलेंस न की जाएं, तो सालों तक चुपचाप हड्डियों की मजबूती को कम कर सकती हैं. प्रिवेंटिव ऑर्थोपेडिक्स 30s में ही शुरू हो जाना चाहिए, जिसमें न्यूट्रिशनल करेक्शन, स्ट्रक्चर्ड फिजिकल एक्टिविटी और समय पर स्क्रीनिंग पर ध्यान दिया जाना चाहिए. इन कमियों को जल्दी ठीक करने से भविष्य में ऑस्टियोआर्थराइटिस और फ्रैजिलिटी फ्रैक्चर का बोझ काफी कम हो सकता है.
आप अपनी हड्डियों की हेल्थ को कैसे बचा सकते हैं?
डॉ. मेहरा के अनुसार, जल्दी स्क्रीनिंग और लाइफस्टाइल में बदलाव से लंबे समय तक होने वाले नुकसान को रोका जा सकता है. कुछ आसान स्टेप्स में शामिल हैं:
- विटामिन D और कैल्शियम लेवल की टेस्टिंग
- प्रोटीन का सेवन बढ़ाना
- पर्याप्त धूप मिलना पक्का करना
- रेगुलर वज़न उठाने वाली एक्सरसाइज करना
डॉ. मेहरा ने कहा कि शुरुआती स्क्रीनिंग और बचाव के उपाय बहुत जरूरी हैं. विटामिन D और कैल्शियम लेवल की जांच के लिए आसान ब्लड टेस्ट, बेहतर प्रोटीन का सेवन, वज़न उठाने वाली एक्सरसाइज़, और जरूरत पड़ने पर सुधार के लिए सप्लीमेंट लेने से लंबे समय तक चलने-फिरने में मदद मिल सकती है. जोड़ों की बीमारियों से आबादी का एक बड़ा हिस्सा प्रभावित है, इसलिए ऐसे पोषण की कमी को दूर करना एक ज़रूरी स्वास्थ्य प्राथमिकता बन गई है.