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Coffin Homes: दम घुटने वाले ‘कॉफिन होम्स’ में कैसे रहते हैं लाखों लोग? हिलना डुलना तो दूर खड़े होने की भी नहीं है जगह

Coffin Homes: हांगकांग में एक ऐसी जगह है जहां लोग ना तो ठीक से लेट पाते हैं और ना ही खड़े हो पाते हैं. एक डिब्डे या बक्से की तरह पिंजड़े में बंद लोगों का जीवन काफी डरावना है. टॉयलेट के पास ही खाना बनाना और भी कई परेशानियों से जूझना होता है.

Coffin Homes:  हांगकांग दुनिया के सबसे अमीर शहरों में से एक है, लेकिन यह एक छोटा सा तटीय इलाका भी है जो अपनी बहुत ज़्यादा आबादी को संभालने के लिए संघर्ष कर रहा है. 427 स्क्वायर मील (1,108 sqkm) के एरिया में 7.5 मिलियन लोगों को घर देना एक चुनौती से कम नहीं है. इसके लिए नए-नए तरीकों की जरूरत है. पुराने ड्रेनपाइप में बने लग्ज़री माइक्रो-अपार्टमेंट से लेकर शहर के सबसे गरीब लोगों के छोटे कॉफ़िन और पिंजरे जैसे घरों तक यह दुनिया में रहने के लिए सबसे महंगी जगह बनी हुई है.

अपनी चमकदार स्काईलाइन और आंखें फाड़ देने वाली प्रॉपर्टी की कीमतों के लिए मशहूर हांगकांग शहर में हजारों लोग इतनी छोटी जगहों पर रहते हैं कि वे सीधे खड़े नहीं हो सकते, अपने हाथ नहीं फैला सकते या बिना शरीर घुमाए मुड़ भी नहीं सकते. धरती के सबसे अमीर शहरों में से एक हांगकांग के ‘कॉफिन होम्स’ में लोग बक्सों के अंदर रह रहे हैं.

हांगकांग का ‘कॉफिन होम्स’

लगातार 14 सालों से हांगकांग ने दुनिया के सबसे महंगे हाउसिंग मार्केट का खिताब अपने नाम किया है. हरी-भरी पहाड़ियों से कांच के टावर दिखाई पड़ते हैं. लग्ज़री कारें डिज़ाइनर स्टोरफ्रंट के सामने से गुज़रती हैं और कुछ अमीर लोग अकूत दौलत पर कब्ज़ा करते हैं. फिर भी उस चमकदार तस्वीर के नीचे एक पैरेलल शहर है जो पुरानी इमारतों में बना है और मेटल की जालियों और पतले प्लाईवुड पार्टीशन के पीछे छिपा है. यह दुनिया का सबसे छोटा अपार्टमेंट है. इनका साइज़ सिर्फ़ 16 स्क्वेयर फ़ीट है और इन्हें कॉफ़िन होम के नाम से जाना जाता है. एक यूट्यूबर रूही सेनेट ने अपने व्लॉग में दर्शकों को डेवलप्ड दुनिया की सबसे कठिन परिस्थिति में रह रहे लोगों के घर के बारे में बताया है. 

दुनिया के महंगे शहरों में से एक

हांगकांग के रेटिंग और वैल्यूएशन डिपार्टमेंट के अनुसार, 2024 की तीसरी तिमाही में, हांगकांग में घर की औसत कीमत HK$13,755 (US$1.8k/£1.4k) प्रति स्क्वायर फुट थी. एनडीटीवी डिजिटल में लगी खबर के अनुसार, हॉन्ग कॉन्ग के 16-स्क्वायर-फुट कॉफ़िन होम का किराया आमतौर पर $230 से $450 USD प्रति महीना (INR 20,858 से INR 45,353) तक होता है.

हैरानी की बात है कि हाल के सालों में यह आंकड़ा कम हो गया है. इसकी वजह हांगकांग में घरों की कमी और इतनी कीमत न होने के कारण मांग में कमी है. हांगकांग को लगातार दुनिया के सबसे कम सस्ते घरों के बाज़ारों में से एक माना जाता है और यहां घर खरीदने की दर सबसे कम 51% है. एक स्टैंडर्ड पालना लगभग 28×52 इंच (10 स्क्वेयर फ़ीट) का होता है. कॉफ़िन होम इससे दोगुना खर्च करते हैं. ऐसी तंग जगहों में लगभग 2,00,000 से 2,20,000 लोग सबडिवाइडेड या कॉफ़िन-स्टाइल यूनिट में रहते हैं. कई बुज़ुर्ग या कम इनकम वाले वर्कर, माइग्रेंट, या ऐसे लोग हैं जो प्रॉपर्टी मार्केट की वजह से पीछे रह गए हैं, उनके लिए पब्लिक हाउसिंग मौजूद है. 

कॉफ़िन होम क्या है?

कॉफ़िन होम को बेडस्पेस अपार्टमेंट भी कहा जाता है. यह 16 स्क्वेयर फ़ीट जितने छोटे हो सकते हैं. कुछ का साइज़ 30 स्क्वेयर फ़ीट से भी कम होता है, जो उन्हें नए रेगुलेटरी फ्रेमवर्क से बाहर रखता है. अंदर से यह अपार्टमेंट देखने में दर्जनों दूसरे बक्सों के बीच रखे लकड़ी या मेटल के बक्से से थोड़ा ज़्यादा है. एक 800-स्क्वायर-फुट के फ्लैट में 30 कॉफिन यूनिट तैयार किए जा सकते हैं. रहने वाले उस एक क्लॉस्ट्रोफोबिक जगह में सोते हैं, खाते हैं, अपने फोन पर स्क्रॉल करते हैं और कभी-कभी खाना भी बनाते हैं. 

डॉक्यूमेंट्री में बताया गया है कि इन कमरों में खड़ा होना या हाथ फैलाना भी नामुमकिन है. इसके बावजूद, ये कॉफिन एक ही समय में लिविंग रूम, किचन और बेडरूम का काम करते हैं. कुछ यूनिट रहने वाले लोगों के कंधों से ज़्यादा चौड़ी नहीं हैं. एक मामले में ऐसा बताया गया कि एक आदमी अपना दरवाज़ा बंद नहीं कर सका क्योंकि उसका कंधा फ्रेम से बाहर निकला हुआ था. दूसरा बिना गद्दे के सोया क्योंकि वह बहुत ज़्यादा जगह लेता है. 

इमारतें आधी-आधी बंट गईं

इनमें से कई यूनिट कभी बनने के लिए थीं ही नहीं. पुरानी इमारतों में पूरी मंज़िलों को गैर-कानूनी तरीके से बदल दिया गया है. कमरों की एक और लेयर बनाने के लिए छतें नीची कर दी गई हैं, जिससे एक मंज़िल दो तंग लेवल में बंट गई है. यह कभी एक स्टैंडर्ड फ्लैट था, वह अब पतले गलियारों और बक्सों का ढेर बन गया है. हर लेवल पर 20 से 30 सबडिवाइडेड यूनिट्स को ठूंस-ठूंस कर भरा गया है. छत की ऊंचाई इतनी कम है कि रहने वाले लगातार झुकते रहते हैं, जिसका असर समय के साथ शरीर पर पड़ता है. दीवारों में ओवरलोडेड वायरिंग सांप की तरह फैली हुई है. एक्सटेंशन कॉर्ड कई गुना बढ़ गए हैं. वेंटिलेशन बहुत कम है या है ही नहीं.

गर्मी, फफूंदी और कीड़ों के साथ रहना

गर्मियों में ये छोटे घर जहां केवल इंसान सीधा लेट सकता है, वहां दम घुटने लगता है. कुछ सबडिवाइडेड अपार्टमेंट्स के अंदर हवा की क्वालिटी सेफ लिमिट से कई गुना खराब पाई गई है. छतों पर फफूंदी फैल जाती है, जिससे यह और भी बेकार लगने लगता है.  गर्म, सीलन भरी हवा इस कॉफिन में बनी रहती है. कई यूनिट्स में तो नेचुरल लाइट्स के लिए भी जगह नहीं है. इसके अलावा यहां पर खटमल और अन्य तरह के कीड़ों से भी जूझना पड़ता है.

इतना ही नहीं बल्कि अलग-अलग हिस्सों में बंटे हुए फ्लैट में किचन तक नहीं है. रहने वाले लोग बाथरूम में खाना बनाते हैं और कभी-कभी तो सीधे टॉयलेट के बगल में खाना बनता है. सब्ज़ियां सिंक में धोई जाती हैं, जिसका इस्तेमाल टॉयलेट इस्तेमाल करने के बाद भी किया जाता है. कपड़े सिर पर लटके रहते हैं. अक्सर टॉयलेट बाउल पर ढक्कन तक नहीं होता. इस इंतज़ाम से साफ़-सफ़ाई की गंभीर चिंताएं पैदा होती हैं. 

हांगकांग की स्काईलाइन, खुशहाली की कहानी कहती है लेकिन असलियत इससे बहुत अलग है. सिर्फ़ 75 लोग इस इलाके की लगभग 10 प्रतिशत दौलत पर कंट्रोल करते हैं. आम मोहल्लों में भी लग्ज़री अपार्टमेंट 1 मिलियन US डॉलर से ज़्यादा में बिक सकते हैं. छोटे स्टैंडर्ड एक-बेडरूम वाले फ्लैट का महीने का किराया लगभग 4,000 US डॉलर हो सकता है. इन सबके बीच कॉफ़िन होम लगभग गायब से दिखते हैं. भागदौड़ भरी लाइफ में किसी को फर्क नहीं पड़ता कि कोई किस तरह जीवन गुजार रहा है.

Pushpendra Trivedi

मैं इंडिया न्यूज में सीनियर सब एडिटर की पोस्ट पर हूं. मैं यहां पर धर्म, लाइफस्टाइल, मनोरंजन, नेशनल, टेक एंड ऑटो और वायरल खबरों को एडिट करता हूं. मुझे पत्रकारिता और कंटेंट की फील्ड में 6 साल से ज्यादा का अनुभव है.

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