देश भर के जैन संगठनों ने वर्ष 2027 में प्रस्तावित राष्ट्रीय जनगणना से पहले ‘लेट एवरी जैन काउंट’ नाम से एक जागरूकता अभियान शुरू किया है। अभियान के…
देश भर के जैन संगठनों ने वर्ष 2027 में प्रस्तावित राष्ट्रीय जनगणना से पहले ‘लेट एवरी जैन काउंट’ नाम से एक जागरूकता अभियान शुरू किया है। अभियान के तहत समाज के हर व्यक्ति से आग्रह किया जा रहा है कि वह जनगणना प्रपत्र के धर्म वाले कॉलम में सावधानीपूर्वक और स्पष्ट रूप से ‘जैन’ लिखे। अभियान का मुख्य उद्देश्य जैन समाज की सही गणना दर्ज कराना है। संगठनों का मानना है कि अब तक दर्ज आंकड़े समाज की वास्तविक संख्या को पूरी तरह नहीं दर्शाते, और इसका कारण जैनों की संख्या में कमी नहीं, बल्कि यह है कि कई परिवार धर्म दर्ज कराते समय आवश्यक सतर्कता नहीं बरतते।
पहचान और दस्तावेज के बीच का अंतर
जनगणना 2011 के अनुसार देश में जैन आबादी 44.51 लाख (44,51,753) दर्ज की गई थी, जो कुल जनसंख्या का लगभग 0.4 प्रतिशत है। जैन संगठनों का कहना है कि उनके अपने आकलनों और पारिवारिक नेटवर्क के आधार पर देश में जैनों की वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है। उनके अनुसार यह अंतर मुख्य रूप से इस बात से पैदा होता है कि जनगणना प्रपत्र किस तरह भरा जाता है।
अभियान से जुड़े लोगों का कहना है कि यह किसी की ओर से जानबूझकर की गई गलती नहीं, बल्कि एक चूक भर है। जैन और हिंदू समुदाय सदियों से साझा सांस्कृतिक और सामाजिक परिवेश में रहते आए हैं, ऐसे में धर्म वाला कॉलम अक्सर बिना अधिक सोचे-विचारे भर दिया जाता है, या फिर जो व्यक्ति परिवार की ओर से प्रपत्र भर रहा होता है, उसी पर छोड़ दिया जाता है। अभियान से जुड़े एक प्रवक्ता ने कहा, “यह चंद सेकंड के ध्यान का मामला है, इरादे का नहीं।”
समान उपनाम भी इस भ्रम को बढ़ाते हैं। शाह, मेहता, पारेख, देसाई, दोशी, वोरा, सेठ, कोठारी, मोदी, गांधी, लोढ़ा और सोनी जैसे उपनाम जैन और हिंदू, दोनों परिवारों में समान रूप से मिलते हैं। इनमें से कुछ उपनाम, जैसे मेहता, पारसी और सिख परिवारों में भी पाए जाते हैं। चूंकि केवल उपनाम से धर्म का कोई संकेत नहीं मिलता, इसलिए संगठनों का कहना है कि कई बार धर्म पूछने के बजाय अनुमान से दर्ज हो जाता है, विशेषकर उन मामलों में जहां परिवार का कोई सदस्य उत्तर देने के लिए मौजूद न हो। अभियान का सुझाव सीधा है, परिवार गणना के समय अपना धर्म स्पष्ट रूप से बताएं और यह भी देख लें कि प्रपत्र में ‘जैन’ ही दर्ज हुआ है।
जनगणना 2027 में पहली बार
डिजिटल सेल्फ-एन्यूमरेशन यानी स्वयं गणना की सुविधा दिए जाने की उम्मीद है, जिसके तहत परिवार अपनी जानकारी स्वयं ऑनलाइन दर्ज कर सकेंगे। अभियान से जुड़े लोग इसे एक सामयिक और स्वागतयोग्य कदम बताते हैं, जिससे हर परिवार को अपनी जानकारी सही ढंग से दर्ज कराने का सीधा और सरल अवसर मिलेगा।
वृहद कोलकाता खरतरगच्छ जैन संघ के अध्यक्ष सुनील कुमार चूरोरिया ने कहा, “जनगणना 2027 वह उपयुक्त अवसर है जब हमारे समाज के चारों पंथ एक साधारण-सी बात पर एकजुट होकर खड़े हों।” उन्होंने कहा, “धर्म वाले कॉलम में उत्तर केवल एक शब्द है, जैन। न पंथ, न जाति, न वह नाम जो हम घर में इस्तेमाल करते हैं, केवल जैन।”
सही गणना, सही तस्वीर
अभियान से जुड़े लोगों का कहना है कि सटीक गणना से यह भी सुनिश्चित होता है कि जहां-जहां जैन परिवार रहते हैं, वहां उनकी उपस्थिति ठीक ढंग से दर्ज हो। अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम जैसी क्षेत्र-आधारित विकास योजनाओं में शैक्षिक और कौशल विकास से जुड़े बुनियादी ढांचे के लिए ऐसे क्षेत्रों की पहचान की जाती है, जहां अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदाय मिलकर स्थानीय आबादी का एक बड़ा हिस्सा, लगभग 25 प्रतिशत, बनाते हों, साथ ही अन्य विकास संकेतकों को भी ध्यान में रखा जाता है। सही दर्ज होने से इतना भर सुनिश्चित होता है कि जैन परिवार इस व्यापक तस्वीर में दिखाई दें।
देश को दिशा देने वाला समाज
जैन संगठनों का कहना है कि सही आंकड़े ऐसे समाज की तस्वीर सामने रखेंगे, जिसका योगदान उसकी संख्या से कहीं अधिक रहा है। अक्टूबर 2025 में हैदराबाद में जैन इंटरनेशनल ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन के एक कार्यक्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि देश की आबादी में जैन समाज की हिस्सेदारी लगभग आधा प्रतिशत है, जबकि कुल कर संग्रह में इसका योगदान करीब 24 प्रतिशत है। उल्लेखनीय है कि सरकार समुदायवार कर संग्रह के आंकड़े प्रकाशित नहीं करती, और यह टिप्पणी समाज के आर्थिक योगदान को लेकर रक्षा मंत्री का आकलन है।
समाज का योगदान अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है। अहमदाबाद के एक जैन परिवार में जन्मे विक्रम साराभाई ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की स्थापना की और उन्हें भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक माना जाता है।उद्योगपति वालचंद हीराचंद ने वर्ष 1940 में देश की पहली विमान निर्माण इकाई हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट लिमिटेड स्थापित की, जिसका बाद में राष्ट्रीयकरण हुआ और आगे चलकर यह हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) बनी। कस्तूरभाई लालभाई भारतीय प्रबंध संस्थान, अहमदाबाद और फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी के सह-संस्थापक रहे। उदयपुर के एक धर्मनिष्ठ जैन परिवार में जन्मे भौतिक विज्ञानी दौलत सिंह कोठारी, जो आगे चलकर अखिल भारतीय श्वेतांबर स्थानकवासी कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष भी रहे, स्वतंत्र भारत के पहले रक्षा वैज्ञानिक सलाहकार बने और उन्होंने कोठारी आयोग की अध्यक्षता की, जिसकी सिफारिशों ने आधुनिक भारतीय शिक्षा नीति को आकार दिया। हाल के वर्षों में राजस्थान में पले-बढ़े भौतिक विज्ञानी जयनेंद्र के. जैन, जो इस समय पेंसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी में एवान प्यू यूनिवर्सिटी प्रोफेसर हैं, कंपोजिट फर्मियन पर अपने कार्य के लिए वर्ष 2025 के वुल्फ पुरस्कार (भौतिकी) से सम्मानित किए गए। वे भारत में लोढ़ा थ्योरेटिकल फिजिक्स इंस्टीट्यूट के संस्थापक निदेशक भी हैं।
देश भर में जैन ट्रस्ट और दानदाता बड़ी संख्या में विद्यालय, महाविद्यालय, अस्पताल और धर्मार्थ संस्थाएं संचालित करते हैं, जो व्यापक समाज की सेवा करती हैं। वहीं दान की परंपरा शिक्षा, स्वास्थ्य और आपदा राहत के क्षेत्र में निरंतर सहयोग देती रही है। यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल खजुराहो और चांपानेर-पावागढ़ परिसरों के जैन मंदिर, तथा माउंट आबू के दिलवाड़ा मंदिर और पालीताणा जैसे तीर्थ स्थल आज भी भारत की सांस्कृतिक विरासत में इस समाज के योगदान के स्थायी प्रतीक हैं।
श्री भारतवर्षीय दिगंबर जैन महासभा के अध्यक्ष गजराज गंगवाल ने कहा, “जिस समाज ने देश को उसका अंतरिक्ष कार्यक्रम, उसकी संस्थाएं और उसके विद्यालय दिए हों, उसकी गणना ठीक वैसी ही होनी चाहिए जैसा वह वास्तव में है।” उन्होंने कहा, “यह कागज पर दर्ज संख्या का मामला नहीं है। यह उस दस्तावेज का मामला है जो हमारी अगली पीढ़ी को विरासत में मिलेगा।”
ऊंची साक्षरता, और आगे बढ़ने की गुंजाइश
जनगणना 2011 के अनुसार 94.88 प्रतिशत साक्षरता दर के साथ जैन समाज देश का सर्वाधिक साक्षर समुदाय है, और यह स्थिति पुरुषों तथा महिलाओं, दोनों के मामले में है। उच्च शिक्षा में भी समाज देश में सबसे आगे है, जहां 25.65 प्रतिशत जैन स्नातक या उससे अधिक शिक्षित हैं, जो दूसरे स्थान पर रहे समुदाय के लगभग तीन गुना है।
इसके बावजूद समाज के शिक्षाविदों का मानना है कि आगे बढ़ने की काफी गुंजाइश है। लगभग हर चार में से तीन जैन अब भी स्नातक नहीं हैं, और जनगणना 2011 में सात वर्ष से अधिक आयु के करीब 2.07 लाख जैन निरक्षर दर्ज किए गए थे। सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि जैन महिलाओं की साक्षरता दर लगभग 93 प्रतिशत होने के बावजूद उनकी कार्यबल में भागीदारी मात्र 14.08 प्रतिशत है, जो शिक्षित प्रतिभा के एक बड़े वर्ग की ओर संकेत करता है जो अब तक कार्यक्षेत्र में नहीं पहुंच सका है।
अभियान से जुड़े लोगों का मानना है कि सही गणना से समाज को उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अपनी और अधिक संस्थाएं स्थापित करने का आधार मिलेगा, जिनकी स्थापना और संचालन का अधिकार समाज को संविधान के अनुच्छेद 30(1) के तहत प्राप्त है। अभियान से जुड़े एक शिक्षाविद ने कहा, “साक्षरता के मोर्चे पर हमारे समाज ने अच्छा प्रदर्शन किया है। अगला कदम बड़े पैमाने पर उच्च शिक्षा है, और इसका अर्थ है अधिक महाविद्यालय, अधिक व्यावसायिक संस्थान और छोटे शहरों से आने वाले विद्यार्थियों के लिए अधिक छात्रावास।” उन्होंने कहा, “जिला स्तर तक अपनी वास्तविक संख्या जानना ही वह बिंदु है जहां से यह नियोजन शुरू होता है।”
किसी भी समाज के लिए क्यों जरूरी है उच्च शिक्षा
शिक्षाविद बताते हैं कि जब किसी भी समुदाय में स्नातक स्तर की शिक्षा सीमित रह जाती है, तो उसके कुछ दीर्घकालिक प्रभाव सामने आते हैं। सबसे पहले रोजगार के रास्ते सिकुड़ने लगते हैं, क्योंकि जिन परिवारों में स्नातक कम होते हैं, वे प्रायः पारंपरिक या पारिवारिक व्यवसायों तक ही सीमित रह जाते हैं और व्यावसायिक, तकनीकी तथा वेतनभोगी क्षेत्रों में उनका प्रवेश सीमित रहता है। इसका असर यह होता है कि निर्णय लेने वाले क्षेत्रों, जैसे प्रशासनिक सेवाओं, शोध, शिक्षा जगत, स्वास्थ्य और लोक प्रशासन में समुदाय की उपस्थिति कम हो जाती है, जिससे उन जगहों पर उसकी आवाज कमजोर पड़ती है जहां उससे जुड़ी नीतियां बनती हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर इसका सबसे गहरा असर आर्थिक प्रगति के अवरुद्ध होने के रूप में दिखाई देता है क्योंकि कठिनाई से बाहर निकलने का सबसे भरोसेमंद रास्ता उच्च शिक्षा ही है, और इसका अभाव प्रायः एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलता रहता है।
हर जैन परिवार से अभियान की अपील
‘लेट एवरी जैन काउंट’ अभियान की अपील एक ही ठोस कदम को लेकर है। जनगणना 2027 का प्रपत्र जब भी सामने आए, चाहे वह डिजिटल सेल्फ-एन्यूमरेशन के जरिए ऑनलाइन भरा जाए या प्रगणक के सामने, परिवार के हर सदस्य के धर्म वाले कॉलम में स्पष्ट रूप से ‘जैन’ दर्ज होना चाहिए। अभियान से जुड़े लोग परिवारों से आग्रह कर रहे हैं कि वे इसे अनुमान पर न छोड़ें, बल्कि स्वयं जांच लें कि प्रविष्टि सही दर्ज हुई है, यह सुनिश्चित करें कि बच्चों और बुजुर्गों सहित परिवार के सभी सदस्यों के नाम सूची में शामिल हों, और यह संदेश अपने परिवार, मंदिर तथा मोहल्ले के दायरे में आगे भी पहुंचाएं।
प्रवक्ता ने कहा, “यह अभियान किसी से कुछ मांग नहीं रहा है।” उन्होंने कहा, “यह जैनों से केवल इतना कह रहा है कि वे लिख दें कि वे पहले से क्या हैं। हर परिवार द्वारा ध्यान से लिखा गया वह एक शब्द ही वह शुरुआत है जहां से बाकी सब कुछ आरंभ होता है।”
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