Budget 2026 expectations: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी को बजट 2026 पेश करेंगी. वित्त मंत्री अनिश्चित भू-राजनीतिक माहौल, अस्थिर पूंजी बाजारों, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, सोने-चांदी की डामलडोल स्थिति के साथ-साथ अन्य अनिश्चितताओं के बीच केंद्रीय बजट 2026 पेश करेंगी. हालांकि, एक बात निश्चित है कि 1 फरवरी 2026 को लोगों में ज्यादा खर्च करने के लिए अच्छी आय के वादे की उम्मीद हो सकती है. जैसा कि भारत 1 अप्रैल 2026 से नया इनकम-टैक्स एक्ट लागू करने की तैयारी कर रहा है. बड़े टैक्स बदलावों की उम्मीदों को माहौल में ढलने की जरूरत हो सकती है.
महंगाई पर नजर
यह संभव है कि बजट छोट, व्यावहारिक बदलावों और प्रशासनिक सुधारों पर ध्यान केंद्रित कर सकता है. जैसे कि तेजी से रिफंड आदि. ताकि, करदाता अनुभव में सुधार हो सके और नए कानून में सुचारू परिवर्तन आसान हो सके. कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जिन पर व्यक्तिगत करदाता अभी भी ध्यान दिए जाने की उम्मीद कर सकते हैं. सबसे अधिक बार उठाई जाने वाली उम्मीदों में से एक मानक कटौती में वृद्धि है, जो वर्तमान में पुरानी टैक्स व्यवस्था के तहत 50,000 रुपये और नई टैक्स व्यवस्था के तहत 75,000 रुपये है. महंगाई से जीने का खर्च लगातार बढ़ रहा है. ऐसे में सैलरी पाने वाले टैक्सपेयर्स को उम्मीद है कि डिडक्शन लिमिट को बढ़ाकर कम से कम 1 लाख रुपये कर दिया जाएगा. ज्यादा डिडक्शन से टैक्सपेयर्स को ऐसे समय में राहत मिलेगी जब बढ़ती महंगाई की वजह से घर के बजट पर ज्यादा दबाव पड़ रहा है.
इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर उम्मीद
Ashok Vashisht, Founder and Group President of WTicabs के अनुसार, आगामी यूनियन बजट से EV और ऑटो सेक्टर को काफी उम्मीदें हैं. यह सरकार मोबिलिटी इकोसिस्टम को मजबूत, डिजिटल रूप से एकीकृत और आधुनिक बनाने के लिए सपोर्ट भी प्रदान करेगी. इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए पर्क्विजिट वैल्यूएशन नियम इलेक्ट्रिक वाहन (EVs) को मोबिलिटी का भविष्य माना जा रहा है. अपनी व्यापक ESG प्रतिबद्धताओं के तहत, कई नियोक्ता अब कर्मचारियों को अपनी कंपनी कार लीज पॉलिसी के तहत EV चुनने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं.
हालांकि, मौजूदा पर्क्विजिट वैल्यूएशन नियम अभी भी पूरी तरह से कार की क्यूबिक कैपेसिटी पर निर्भर करते हैं. यह एक ऐसा तरीका है जो EVs की खास प्रकृति को ध्यान में नहीं रखता है, जिनमें पारंपरिक अर्थों में इंजन नहीं होता है. इसलिए, सरकार के लिए EVs के लिए विशेष रूप से एक अलग वैल्यूएशन मैकेनिज्म पेश करना व्यावहारिक हो सकता है ताकि उचित टैक्स ट्रीटमेंट सुनिश्चित किया जा सके और उनके इस्तेमाल को और बढ़ावा दिया जा सके.
क्या होम लोन पर राहत मिलेगी?
नई टैक्स व्यवस्था के तहत होम लोन ब्याज पर राहत होम लोन लेने वाले लंबे समय से अपने रीपेमेंट बोझ को कम करने के लिए ब्याज से संबंधित टैक्स कटौती पर निर्भर रहे हैं. हालांकि, नई टैक्स व्यवस्था के तहत व्यक्ति सैलरी इनकम के मुकाबले हाउसिंग लोन के ब्याज को एडजस्ट नहीं कर सकते हैं. यहां तक कि सेल्फ-ऑक्यूपाइड प्रॉपर्टी के मामले में भी हाउसिंग की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और सरकार का व्यापक लक्ष्य किफायती दरों पर घर के मालिकाना हक को बढ़ावा देना है. इसलिए उम्मीद है कि सरकार आने वाले बजट में नई टैक्स व्यवस्था के तहत कम से कम सेल्फ-ऑक्यूपाइड प्रॉपर्टी पर इस तरह की ब्याज कटौती की अनुमति दे सकती है. इससे मध्यम आय वाले टैक्सपेयर्स परिवारों को राहत मिलेगी और नई टैक्स व्यवस्था में टैक्सपेयर्स का भरोसा और बढ़ेगा.
देरी से रिटर्न भरने पर क्या बनेगी बात?
संशोधित या देरी से रिटर्न दाखिल करने की समय-सीमा मौजूदा प्रावधानों के तहत टैक्सपेयर्स किसी वित्तीय वर्ष के लिए संशोधित या देरी से रिटर्न उस साल के खत्म होने के बाद सिर्फ़ 31 दिसंबर तक ही फाइल कर सकते हैं. हालांकि, यह समय-सीमा अक्सर चुनौतियां खड़ी करती है, खासकर उन व्यक्तिगत टैक्सपेयर्स के लिए जिनकी इनकम या इन्वेस्टमेंट दूसरे देशों में हैं. क्योंकि, उनके अपने या होस्ट देशों में टैक्स फाइलिंग तब तक फाइनल नहीं हो पाती है. इस मिसमैच के कारण भारत में इनकम की अनजाने में कम रिपोर्टिंग या ज़्यादा रिपोर्टिंग हो सकती है.
उदाहरण के लिए एक अमेरिकी नागरिक जो भारत में आम निवासी बन जाता है, उसे एक ही भारतीय टैक्स रिटर्न में दो कैलेंडर वर्षों के कुछ हिस्सों के लिए ग्लोबल इनकम की रिपोर्ट करने की ज़रूरत हो सकती है. भले ही विदेशी टैक्स फाइलिंग बाद में पूरी होती हो. इन व्यावहारिक कठिनाइयों को देखते हुए संशोधित या देरी से रिटर्न दाखिल करने की समय-सीमा बढ़ाने से बहुत ज़रूरी राहत मिलेगी और सही रिपोर्टिंग सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है. नए इनकम टैक्स बदलावों के बीच टैक्सपेयर्स के लंबे वक्त से चली आ रही मांगों को पूरा करने का एक मौका देता है. आखिरकार, उम्मीद है कि बजट वित्तीय समझदारी और भारत के बढ़ते वेतनभोगी वर्ग की वास्तविक जरूरतों के बीच सही संतुलन बनाकर रखेगा.