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Home > Career > 300 रुपये किलो बिकते सेब ने बदली सोच, डिजिटल प्लेटफॉर्म से तीन गुना बढ़ाई आमदनी, ऐसे बनाई स्मार्ट फार्मिंग

300 रुपये किलो बिकते सेब ने बदली सोच, डिजिटल प्लेटफॉर्म से तीन गुना बढ़ाई आमदनी, ऐसे बनाई स्मार्ट फार्मिंग

Engineering Success Story: हिमाचल की एक लड़की ने इंजीनियरिंग छोड़ खेती अपनाई. बेंगलुरु में महंगे सेब देख समझा कि किसान को सही दाम नहीं मिलता. अब वह सेब को अपनी पहचान और बदलाव का जरिया बना चुकी हैं.

Written By: Munna Kumar
Last Updated: March 4, 2026 11:26:03 IST

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Success Story: रोज़ एक सेब खाने से डॉक्टर दूर रहते हैं. यह कहावत तो हम सबने सुनी है, लेकिन अपराजिता बंसल (Aparajita Bansal) के लिए सेब सिर्फ़ फल नहीं, बल्कि पहचान है. हिमाचल प्रदेश के मंडी ज़िले के बनोन गांव में सेब के बगीचे में पली-बढ़ीं अपराजिता ने कभी सोचा भी नहीं था कि वही खेती, जिससे वह दूर भागना चाहती थीं, एक दिन उनका जुनून बन जाएगी.

युवा उम्र में अपराजिता को लगता था कि गांव में अवसर कम हैं. वह पढ़ाई पूरी कर इंजीनियर बनीं और 2017 में बेंगलुरु चली गईं. लेकिन शहर के सुपरमार्केट में जब उन्होंने सेब 300 रुपये किलो बिकते देखे, तो चौंक गईं. उसी समय उनके माता-पिता मंडी में अपनी फसल का उचित दाम पाने के लिए संघर्ष कर रहे थे. उन्हें समझ आया कि असली मुनाफ़ा बिचौलियों को मिल रहा है, किसान को नहीं. यही सोच आगे चलकर बदलाव की वजह बनी.

Instagram से शुरू हुआ सीधा कारोबार

वर्ष 2021 में फसल के मौसम के दौरान अपराजिता ने अपने 10,000 फॉलोअर्स वाले इंस्टाग्राम समुदाय से पूछा क्या वे खेत से ताज़े तोड़े गए सेब खरीदना चाहेंगे? प्रतिक्रिया उम्मीद से कहीं ज़्यादा सकारात्मक थी. सिर्फ़ दो घंटे में 300 किलो सेब बिक गए. उन्होंने पहले ‘Him2Home’ और बाद में ‘फल फूल’ नाम से अपना ब्रांड रजिस्टर किया. आज वह सीधे ग्राहकों को सेब, फूल, दालें और बीज बेचती हैं. इस मॉडल से उनके परिवार की आय मंडी की तुलना में लगभग तीन गुना बढ़ी है.

सस्टेनेबल खेती की ओर कदम

अपराजिता ने नौकरी छोड़कर फुल-टाइम खेती को अपनाया. पिछले 4.5 वर्षों से उनके बगीचे में रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं हुआ है. मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए गाय के गोबर, वर्मीकम्पोस्ट और वेस्ट डीकंपोज़र का उपयोग किया जाता है. उन्होंने हैदराबाद स्थित Aranya Agricultural Alternatives से पर्माकल्चर का कोर्स किया. उनका मानना है कि मोनोकल्चर की बजाय विविध फसलें उगाने से मिट्टी भी स्वस्थ रहती है और जोखिम भी कम होता है.

क्लाइमेट चेंज की चुनौती

हालांकि, खेती आसान नहीं है. ओलावृष्टि, अनियमित मानसून और सूखे ने पिछले कुछ वर्षों में उनकी फसल को नुकसान पहुंचाया है. फिर भी वह कहती हैं कि हम ज़हर-मुक्त फल दे रहे हैं, यही हमारी सबसे बड़ी जीत है. अपराजिता की कहानी सिर्फ़ एक किसान की सफलता नहीं, बल्कि यह उदाहरण है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म और सस्टेनेबल खेती मिलकर किस तरह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकते हैं.

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Last Updated: March 4, 2026 11:26:03 IST

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Success Story: रोज़ एक सेब खाने से डॉक्टर दूर रहते हैं. यह कहावत तो हम सबने सुनी है, लेकिन अपराजिता बंसल (Aparajita Bansal) के लिए सेब सिर्फ़ फल नहीं, बल्कि पहचान है. हिमाचल प्रदेश के मंडी ज़िले के बनोन गांव में सेब के बगीचे में पली-बढ़ीं अपराजिता ने कभी सोचा भी नहीं था कि वही खेती, जिससे वह दूर भागना चाहती थीं, एक दिन उनका जुनून बन जाएगी.

युवा उम्र में अपराजिता को लगता था कि गांव में अवसर कम हैं. वह पढ़ाई पूरी कर इंजीनियर बनीं और 2017 में बेंगलुरु चली गईं. लेकिन शहर के सुपरमार्केट में जब उन्होंने सेब 300 रुपये किलो बिकते देखे, तो चौंक गईं. उसी समय उनके माता-पिता मंडी में अपनी फसल का उचित दाम पाने के लिए संघर्ष कर रहे थे. उन्हें समझ आया कि असली मुनाफ़ा बिचौलियों को मिल रहा है, किसान को नहीं. यही सोच आगे चलकर बदलाव की वजह बनी.

Instagram से शुरू हुआ सीधा कारोबार

वर्ष 2021 में फसल के मौसम के दौरान अपराजिता ने अपने 10,000 फॉलोअर्स वाले इंस्टाग्राम समुदाय से पूछा क्या वे खेत से ताज़े तोड़े गए सेब खरीदना चाहेंगे? प्रतिक्रिया उम्मीद से कहीं ज़्यादा सकारात्मक थी. सिर्फ़ दो घंटे में 300 किलो सेब बिक गए. उन्होंने पहले ‘Him2Home’ और बाद में ‘फल फूल’ नाम से अपना ब्रांड रजिस्टर किया. आज वह सीधे ग्राहकों को सेब, फूल, दालें और बीज बेचती हैं. इस मॉडल से उनके परिवार की आय मंडी की तुलना में लगभग तीन गुना बढ़ी है.

सस्टेनेबल खेती की ओर कदम

अपराजिता ने नौकरी छोड़कर फुल-टाइम खेती को अपनाया. पिछले 4.5 वर्षों से उनके बगीचे में रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं हुआ है. मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए गाय के गोबर, वर्मीकम्पोस्ट और वेस्ट डीकंपोज़र का उपयोग किया जाता है. उन्होंने हैदराबाद स्थित Aranya Agricultural Alternatives से पर्माकल्चर का कोर्स किया. उनका मानना है कि मोनोकल्चर की बजाय विविध फसलें उगाने से मिट्टी भी स्वस्थ रहती है और जोखिम भी कम होता है.

क्लाइमेट चेंज की चुनौती

हालांकि, खेती आसान नहीं है. ओलावृष्टि, अनियमित मानसून और सूखे ने पिछले कुछ वर्षों में उनकी फसल को नुकसान पहुंचाया है. फिर भी वह कहती हैं कि हम ज़हर-मुक्त फल दे रहे हैं, यही हमारी सबसे बड़ी जीत है. अपराजिता की कहानी सिर्फ़ एक किसान की सफलता नहीं, बल्कि यह उदाहरण है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म और सस्टेनेबल खेती मिलकर किस तरह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकते हैं.

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