Where is my Train App Success Story: भारत में ट्रेन सिर्फ़ सफ़र का साधन नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी की धड़कन है. हर दिन करोड़ों लोग रेलवे पर भरोसा कर अपने घर, काम और सपनों की ओर बढ़ते हैं. लेकिन जब ट्रेन घंटों लेट हो जाए, तो प्लेटफॉर्म पर बैठा यात्री सबसे ज़्यादा असहाय महसूस करता है. आज भले ही हम मोबाइल से ट्रेन की लाइव लोकेशन देख लेते हों, लेकिन दस साल पहले यह सुविधा केवल कल्पना थी. इसी कल्पना को सही साबित अहमद निज़ाम मोहाइदीन ने कर दिखाया था. वह न तो IIT और न ही NIT से पढ़े हैं बल्कि उन्होंने चेन्नई के प्रतिष्ठित कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग, गिंडी से कंप्यूटर साइंस में बीई की डिग्री हासिल की हैं.
प्लेटफॉर्म पर बैठा एक यात्री, दिमाग में एक सवाल
साल 2015 में अहमद निज़ाम मोहाइदीन भी ऐसे ही एक आम यात्री थे. स्टेशन पर पहुंचे तो पता चला कि ट्रेन कई घंटों की देरी से आएगी. इंतज़ार, झुंझलाहट और समय की बर्बादी, इन्हीं पलों में उनके मन में एक सवाल उठा कि जब ओला और उबर ड्राइवर की लाइव लोकेशन दिखा सकते हैं, तो ट्रेन क्यों नहीं? इसी सोच ने रियल-टाइम ट्रेन ट्रैकिंग के आइडिया को जन्म दिया.
एक समस्या से समाधान की शुरुआत
अहमद निज़ाम पहले ही Sigmoid Labs नाम की टेक कंपनी से जुड़े थे, जो डेटा और AI आधारित सॉल्यूशंस पर काम करती थी. उन्होंने अपनी टीम के साथ ट्रेन की लाइव ट्रैकिंग पर काम शुरू किया. आसान लगने वाला यह आइडिया हकीकत में बेहद चुनौतीपूर्ण था. करीब एक साल की मेहनत, 20 से ज़्यादा प्रोटोटाइप और कई असफलताओं के बाद जाकर सही समाधान निकल पाया.
जब इंटरनेट नहीं था सहारा
उस दौर में न तो स्मार्टफोन हर हाथ में थे और न ही तेज़ इंटरनेट आम था. फंडिंग भी सीमित थी. ऐसे में अहमद और उनकी टीम ने एक अलग रास्ता चुना. उन्होंने मोबाइल टावर सिग्नल का इस्तेमाल कर ट्रेन की लोकेशन बताने वाला सिस्टम तैयार किया. यही तकनीक आगे चलकर Where is My Train ऐप की पहचान बनी.
आम यात्रियों का भरोसेमंद साथी
धीरे-धीरे यह ऐप यात्रियों के बीच लोकप्रिय होने लगा. बिना इंटरनेट के भी ट्रेन की स्थिति जान पाना लोगों के लिए किसी राहत से कम नहीं था. यह ऐप खास तौर पर उन लोगों के काम आया, जिनके पास महंगे फोन या हाई-स्पीड डेटा नहीं था.
जब गूगल की नज़र पड़ी
Where is My Train की लोकप्रियता ने गूगल का ध्यान खींचा. दिसंबर 2018 में गूगल ने इसे बनाने वाली कंपनी को अधिग्रहित कर लिया. बताया जाता है कि यह डील करीब 280 करोड़ रुपये की थी, हालांकि आधिकारिक आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए. गूगल ने इस ऐप को अपनी Next Billion Users रणनीति का हिस्सा बनाया. मकसद साफ था उभरते बाजारों में ऐसे यूज़र्स तक पहुंचना, जहां इंटरनेट सीमित है लेकिन ज़रूरतें बड़ी हैं.