Fallen Village Holi: उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले से लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित फालेन गांव को भक्त प्रह्लाद की धरती के रूप में जाना जाता है. यहां होलिका दहन सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि आस्था और साहस की जीवंत मिसाल है. सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार, पंडा समाज का एक सदस्य धधकती होलिका के अंगारों के बीच से नंगे पांव गुजरता है और आश्चर्य की बात यह है कि उसके शरीर पर आंच तक नहीं आती.
इस गांव में तैयार की जाने वाली होलिका सामान्य नहीं होती. लगभग 20 फीट ऊंची और 30 फीट लंबी लकड़ियों का विशाल ढांचा बनाया जाता है. शुभ मुहूर्त में दहन के बाद जब आग शांत होकर अंगारों में बदल जाती है, तब पंडा समाज का चुना हुआ व्यक्ति उनमें से निकलता है. इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु फालेन पहुंचते हैं और ‘भक्त प्रह्लाद’ के जयकारों से वातावरण गूंज उठता है.
बहन दिखाती है रास्ता
इस अनुष्ठान की एक खास परंपरा यह भी है कि अंगारों में प्रवेश करने से पहले पंडा की बहन दूध की धारा बहाकर रास्ता बताती है. इसे शुभ संकेत माना जाता है. इसके बाद पंडा अग्निकुंड में प्रवेश करता है और बिना किसी सुरक्षा साधन के पार निकल आता है. ग्रामीणों का विश्वास है कि अग्नि देवता उनकी रक्षा करते हैं.
45 दिनों की कठिन साधना
अंगारों से गुजरने वाला व्यक्ति यह परंपरा अचानक नहीं निभाता. इसके लिए लगभग 45 दिनों तक कठोर तपस्या करनी पड़ती है. इस दौरान वह मंदिर परिसर में ही रहता है, दिन में एक समय फलाहार करता है और सामान्य जीवन से दूरी बनाए रखता है. भजन, ध्यान और संयम के साथ यह साधना पूरी की जाती है.
आस्था और उत्सव का संगम
फालेन गांव की होली केवल अग्निपरीक्षा तक सीमित नहीं रहती. ढोल-नगाड़ों, झांझ-मंजीरों और लोकगीतों के साथ पूरा गांव उत्सव में डूब जाता है. प्रशासन भी श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए विशेष इंतजाम करता है.यह परंपरा भक्त प्रह्लाद की उस पौराणिक कथा की याद दिलाती है, जिसमें आस्था ने अग्नि पर विजय पाई थी. फालेन की होली इसी विश्वास को आज भी जीवित रखे हुए है.
‘एरच’ से भी जुड़ी है कहानी
उत्तर प्रदेश के झांसी जिले में बेतवा नदी के किनारे स्थित ‘एरच’ नामक जगह को भी कुछ लोग कुछ लोग ‘भक्त प्रहलाद’ के जन्म से जोड़कर बताते हैं, मान्यताओं के अनुसार यही जगह असुर राजा हिरण्यकश्यप की राजधानी थी. धर्म पुराणों के अनुसार होली की शुरूवात भी यहीं से हुई थी.