Chaitra Navratri 2026 Day 2: चैत्र नवरात्रि का दूसरा दिन 19 मार्च को है. इस बार की नवरात्रि 9 दिनों की है. आज मां दुर्गा के दूसरे स्वरूप माता ब्रह्मचारिणी की पूजा होगी. बता दें कि, ब्रह्मचारिणी दो शब्दों ब्रह्मा और चारिणी से मिलकर बना है. यहां 'ब्रह्मा' का मतलब घोर तपस्या से है और 'चारिणी' का अर्थ आचरण से. कुल मिलाकर माता का दूसरा स्वरूप तप का आचरण करने से होता है. धर्म शास्त्रों के मुताबिक, मां दुर्गा के नव शक्तियों के इस दूसरे स्वरूप देवी ब्रह्मचारिणी ने अपने पूर्व जन्म में जब हिमालय के घर में पुत्री रूप में उत्पन्न हुई थीं तब नारद जी के उपदेश से इन्होंने भगवान शंकर जी को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी. इस तपस्या के कारण इन्हें तपस्चारिणी अर्थात ब्रह्मचारिणी नाम से समस्त जगत में पूजा जाता है. मान्यता है कि, मां के इस स्वरूप की पूजा से व्यक्ति के जीवन में कभी भी धन, संपत्ति और सुख की कमी नहीं होती है. अब सवाल है कि आखिर, चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा कैसे करें? मां ब्रह्मचारिणी की पूजा में किन मंत्रों का जप करना चाहिए? नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी को क्या भोग लगाएं? मां ब्रह्मचारिणी की कथा क्या है? इस बारे में India News को बता रहे हैं उन्नाव के ज्योतिषाचार्य ऋषिकांत मिश्र शास्त्री- मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने की विधि जगदजननी मां दुर्गा के दूसरे स्वस्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की उपासना के समय पीले या सफेद वस्त्र धारण करें. इसके बाद मां को सफेद वस्तुएं अर्पित करें जैसे मिश्री, शक्कर या पंचामृत साथ ही, ज्ञान और वैराग्य का कोई भी मंत्र जपा जा सकता है लेकिन मां ब्रह्मचारिणी के लिए "ऊं ऐं नमः" का जाप सबसे उत्तम माना जाता है. मां ब्रह्माचारिणी पूजा के मंत्र ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नम:दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते..या देवी सर्वभूतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता. नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम..दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू. देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा.. मां ब्रह्मचारिणी का भोग नवरात्रि के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी को चीनी, मिश्री, दूध या दूध से बने व्यंजनों (जैसे खीर, पेड़े) का भोग लगाने की परंपरा है. धार्मिक मान्यता है कि, इन चीजों का भोग लगाने से मां प्रसन्न होती हैं और साधक को लंबी आयु, सुख-शांति व सकारात्मक ऊर्जा का आशीर्वाद प्राप्त होता है. मां ब्रह्मचारिणी की व्रत कथा Brahmacharini Mata Vrat Katha पौराणिक कथा के अनुसार, देवी पार्वती ने दक्ष प्रजापति के घर ब्रह्मचारिणी के रूप में जन्म लिया था. देवी पार्वती का यह स्वरूप किसी संत के समान था. एक बार उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या करने का प्रण लिया. इनकी तपस्या हजारों वर्षों तक चलीं. भीषण गर्मी, कड़कड़ाती ठंड और तूफानी बारिश भी इनकी तपस्या का संकल्प नहीं तोड़ पाई. कहते हैं कि देवी ब्रह्मचारिणी केवल फल, फूल और बिल्व पत्र की पत्तियां खाकर ही हजारों साल तक जीवित रही थीं. जब भगवान शिव नहीं मानें तो उन्होंने इन चीजों का भी त्याग कर दिया और बिना भोजन व पानी के अपनी तपस्या को जारी रखा पत्तों को भी खाना छोड़ देने के कारण उनका एक नाम 'अर्पणा' भी पड़ गया. मां ब्रह्मचारिणी के पीछे की वजह नवरात्रि के दूसरे दिन मां दुर्गा के तपस्विनी रूप की पूजा की जाती है. शास्त्रों के अनुसार, मां दुर्गा ने पार्वती के रूप में हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया था. नारद मुनि की सलाह पर उन्होंने भगवान शिव को अपना पति प्राप्त करने के लिए अत्यंत कठोर तपस्या की थी. हजारों वर्षों तक निरंतर तपस्या करने के कारण ही उन्हें तपस्विनी और ब्रह्मचारिणी के नाम से जाना जाता है. इस कठिन तपस्या के दौरान, मां पार्वती ने कई वर्षों तक बिना कुछ खाए-पिए कठोर तप किया और भगवान शिव को प्रसन्न किया. उनके इस तपस्वी जीवन के प्रतीक स्वरूप नवरात्रि के दूसरे दिन उनकी पूजा और स्तवन किया जाता है. इस दिन, मां ब्रह्मचारिणी के रूप में उनकी पूजा उनके दृढ़ संकल्प और समर्पण को दर्शाती है. यह दिन हमें यह शिक्षा देता है कि सच्ची श्रद्धा, धैर्य और दृढ़ निश्चय के साथ हम किसी भी लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं.