Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा का होता है, जिनके हाथ में जपमाला और कमंडलु होता है, जो तपस्या, संयम और ज्ञान का प्रतीक है. हिमालय की पुत्री मां ब्रह्मचारिणी ने घोर तपस्या करके शिव को पति रूप में प्राप्त किया था और उनकी अर्धांगिनी बनी थी. इसलिए कहा जाता है जो भी व्यक्ति मा दुर्गा के दूसरे रूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा श्रद्धा-भाव से पूरे विधि विधान के साथ करता है, उसके असंभव कार्य भी संभव हो जाता हैं और जीवन में सफलता मिलती है.
धर्म शास्त्र के अनुसार चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन यानी मां ब्रह्मचारिणी की पूजा में कुछ नियमों का पालन करना जरूरी होता है, अगर आपसे कोई गलती हो जा , तो वर्षों की साधना, पूजा व्रत और तप सब व्यर्थ हो सकता है. इसलिए मां ब्रह्मचारिणी की पूजा में इन तीन बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है.
1. भोजन और ब्रह्मचर्य का उल्लंघन करना
चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन यानी मां ब्रह्मचारिणी की पूजा में यदी कोई व्रती व्यक्ति असंयमित भोजन करता है, मांस मदिरा का सेवन करता है और ब्रह्मचर्य के नियम का उल्लंघन करता है, तो उस व्यक्ति का व्रत निष्फल हो जाता है. पद्म पुराण में भी लिखा गया है कि “मद्यं मांसं न सेवेत व्रतानां ब्रह्मचारिणि”, मतलब है कि व्रत के दौरान अगर कोई मदिरा और मांस का सेवन करता है तो व्रत नष्ट कर देता है. व्रत के दौरान हमेशा सात्त्विक भोजन करना चाहिए और मन को शांत रखना चाहिए, ऐसा करने से ही शरीर तप के योग्य बनाता है, जबकि तामसिक भोजन व्यक्ति के शरीर की ऊर्जा को बढ़ाने का काम करता है, जिसकी वजह से आपके मन में गलत खयाल आ सकते हैं
2. अहंकार और क्रोध करना
चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन यानी मां ब्रह्मचारिणी की पूजा में किसी भी व्यक्ति या महिला को क्रोध या अहंकार में आकर किसी को गलत बोलने से बचना चाहिए, ऐसा करने से व्रत नष्ट हो जाता है. धर्म शास्त्रों के अनुसार “अहंकारः परं दुष्टं क्रोधो वा नाशकः तपः” मतलब है कि अहंकार और क्रोध तपस्या को तुरंत नष्ट कर देते हैं. मनोविज्ञान के अनुसार पूजा में गुस्सा आना मन की शांति भंग करता है.
3. मंत्र-जप में अशुद्धि या भूल होना
चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन यानी मां ब्रह्मचारिणी की पूजा में यदी कोई व्यक्ति या महिला मंत्र जप के दौरान अशुद्ध उच्चारण करें या मंत्र जाप अधूरा छोड़े, तो उसे पूजा और मंत्र जाप का पूरा फल नहीं मिलता है और व्रत वहीं नष्ट हो जाती है. धर्म शास्त्र के अनुसार मंत्र का उच्चारण सही स्वर और लय में होना जरूरी है, अगर ऐसा ना हो तो उसकी तरंगें मन-मस्तिष्क पर असर डालती हैं.
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