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Dasha Mata Vrat Katha: क्या आपने पढ़ी है दशा माता की यह व्रत कथा? सुहागिन महिलाएं जरूर करें इसका पाठ, दूर हो सकती हैं जीवन की परेशानियां

Dasha Mata Vrat Katha 2026: हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को दशा माता का व्रत रखा जाता है, जो 2026 में 13 मार्च को पड़ेगा. इस दिन सुहागिन महिलाएं परिवार की सुख-समृद्धि और पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखकर दशा माता की पूजा करती हैं और पीपल के पेड़ पर दस गांठ वाला डोरा चढ़ाती हैं. आइए जानते हैं,पूजा की विधी और पौराणिक कथा.

Written By: Shivashakti narayan singh
Last Updated: 2026-03-13 13:11:36

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Dasha Mata ki kahani: हिंदू पंचांग के अनुसार ‘चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि’ को दशा माता का व्रत रखा जाता है. यह व्रत विशेष रूप से सुहागिन महिलाएं अपने परिवार की खुशहाली, पति की लंबी उम्र और घर की समृद्धि के लिए करती हैं. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने और दशा माता की कथा सुनने या पढ़ने से जीवन की परेशानियां दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है.

इस दिन महिलाएं पीपल के पेड़ की पूजा करती हैं और ‘दस गांठों वाला पवित्र धागा’अर्पित कर उसे गले में धारण करती हैं. इसे दशा माता का डोरा कहा जाता है. माना जाता है कि श्रद्धा और नियम से व्रत करने पर माता अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं.

 दशा माता व्रत 2026 की तिथि

पंचांग के अनुसार चैत्र कृष्ण दशमी तिथि ’13 मार्च 2026 को सुबह 6:28 बजे से शुरू होकर 14 मार्च 2026 को सुबह 8:10 बजे तक’ रहेगी. इसलिए इस वर्ष दशा माता का व्रत 13 मार्च, शुक्रवार को रखा जाएगा.

दशा माता व्रत की पौराणिक कथा

प्राचीन समय में एक प्रसिद्ध राजा ‘नल’ और उनकी पत्नी ‘दमयंती’ का राज्य था. दोनों का जीवन सुख और समृद्धि से भरा हुआ था और प्रजा भी खुशहाल थी. एक दिन होली के बाद दशमी तिथि के दिन एक ब्राह्मणी महल में आई और उसने रानी से कहा कि आज दशा माता का व्रत है, इसलिए इस दिन पूजा करके दशा माता का डोरा गले में धारण करना शुभ माना जाता है.रानी दमयंती ने श्रद्धा से वह डोरा लिया और विधिपूर्वक पूजा कर उसे अपने गले में बांध लिया. कुछ समय बाद राजा नल ने रानी के गले में बंधा धागा देखा और आश्चर्य से पूछा कि इतने आभूषणों के होते हुए भी यह साधारण धागा क्यों पहना है. रानी कुछ समझाती उससे पहले ही राजा ने वह धागा तोड़कर जमीन पर फेंक दिया.रानी ने तुरंत उसे उठाकर सम्मान से रख लिया और कहा कि यह दशा माता का डोरा है, इसका अपमान करना ठीक नहीं.उस रात राजा नल को स्वप्न में एक वृद्धा दिखाई दी. वह वास्तव में दशा माता थीं. उन्होंने राजा से कहा कि उनके अपमान के कारण अब उसके अच्छे दिन समाप्त होने वाले हैं और कठिन समय शुरू होगा. इतना कहकर वह अंतर्ध्यान हो गईं.सके बाद धीरे-धीरे राजा के जीवन में संकट आने लगे. राज्य की समृद्धि खत्म होने लगी, धन-संपत्ति नष्ट हो गई और हालात इतने खराब हो गए कि उन्हें अपना राज्य छोड़कर भटकना पड़ा.राजा और रानी अपने दोनों बच्चों को सुरक्षित स्थान पर छोड़कर दूसरे प्रदेश की ओर निकल पड़े. रास्ते में कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. कभी भोजन की कमी हुई तो कभी अपमान सहना पड़ा.एक समय ऐसा भी आया जब दोनों को अलग-अलग जगह काम करना पड़ा. रानी अपने मायके के महल में दासी बनकर काम करने लगीं और राजा एक तेली के यहां मजदूरी करने लगे.काफी समय तक कठिनाइयों का सामना करने के बाद एक दिन दशमी तिथि आई. उस दिन रानी ने श्रद्धा से दशा माता का व्रत किया और उनसे अपनी भूल की क्षमा मांगी.माता की कृपा से धीरे-धीरे उनके बुरे दिन समाप्त होने लगे. परिवार दोबारा मिल गया और उनकी किस्मत फिर से चमक उठी. बाद में राजा-रानी अपने राज्य लौटे और पहले की तरह समृद्ध जीवन जीने लगे.

 व्रत कथा का महत्व

इस कथा से यह सीख मिलती है कि देवी-देवताओं का अपमान नहीं करना चाहिए और कठिन समय में भी आस्था नहीं छोड़नी चाहिए. श्रद्धा से किया गया व्रत और पूजा जीवन में सुख, समृद्धि और शांति लाने का मार्ग बन सकती है.धार्मिक मान्यता है कि जो महिलाएं दशा माता का व्रत रखकर यह कथा सुनती या पढ़ती हैं, उन्हें परिवार की खुशहाली, स्वास्थ्य और सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है.

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है. पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. India News इसकी सत्यता का दावा नहीं करता है.

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Written By: Shivashakti narayan singh
Last Updated: 2026-03-13 13:11:36

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Dasha Mata ki kahani: हिंदू पंचांग के अनुसार ‘चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि’ को दशा माता का व्रत रखा जाता है. यह व्रत विशेष रूप से सुहागिन महिलाएं अपने परिवार की खुशहाली, पति की लंबी उम्र और घर की समृद्धि के लिए करती हैं. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने और दशा माता की कथा सुनने या पढ़ने से जीवन की परेशानियां दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है.

इस दिन महिलाएं पीपल के पेड़ की पूजा करती हैं और ‘दस गांठों वाला पवित्र धागा’अर्पित कर उसे गले में धारण करती हैं. इसे दशा माता का डोरा कहा जाता है. माना जाता है कि श्रद्धा और नियम से व्रत करने पर माता अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं.

 दशा माता व्रत 2026 की तिथि

पंचांग के अनुसार चैत्र कृष्ण दशमी तिथि ’13 मार्च 2026 को सुबह 6:28 बजे से शुरू होकर 14 मार्च 2026 को सुबह 8:10 बजे तक’ रहेगी. इसलिए इस वर्ष दशा माता का व्रत 13 मार्च, शुक्रवार को रखा जाएगा.

दशा माता व्रत की पौराणिक कथा

प्राचीन समय में एक प्रसिद्ध राजा ‘नल’ और उनकी पत्नी ‘दमयंती’ का राज्य था. दोनों का जीवन सुख और समृद्धि से भरा हुआ था और प्रजा भी खुशहाल थी. एक दिन होली के बाद दशमी तिथि के दिन एक ब्राह्मणी महल में आई और उसने रानी से कहा कि आज दशा माता का व्रत है, इसलिए इस दिन पूजा करके दशा माता का डोरा गले में धारण करना शुभ माना जाता है.रानी दमयंती ने श्रद्धा से वह डोरा लिया और विधिपूर्वक पूजा कर उसे अपने गले में बांध लिया. कुछ समय बाद राजा नल ने रानी के गले में बंधा धागा देखा और आश्चर्य से पूछा कि इतने आभूषणों के होते हुए भी यह साधारण धागा क्यों पहना है. रानी कुछ समझाती उससे पहले ही राजा ने वह धागा तोड़कर जमीन पर फेंक दिया.रानी ने तुरंत उसे उठाकर सम्मान से रख लिया और कहा कि यह दशा माता का डोरा है, इसका अपमान करना ठीक नहीं.उस रात राजा नल को स्वप्न में एक वृद्धा दिखाई दी. वह वास्तव में दशा माता थीं. उन्होंने राजा से कहा कि उनके अपमान के कारण अब उसके अच्छे दिन समाप्त होने वाले हैं और कठिन समय शुरू होगा. इतना कहकर वह अंतर्ध्यान हो गईं.सके बाद धीरे-धीरे राजा के जीवन में संकट आने लगे. राज्य की समृद्धि खत्म होने लगी, धन-संपत्ति नष्ट हो गई और हालात इतने खराब हो गए कि उन्हें अपना राज्य छोड़कर भटकना पड़ा.राजा और रानी अपने दोनों बच्चों को सुरक्षित स्थान पर छोड़कर दूसरे प्रदेश की ओर निकल पड़े. रास्ते में कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. कभी भोजन की कमी हुई तो कभी अपमान सहना पड़ा.एक समय ऐसा भी आया जब दोनों को अलग-अलग जगह काम करना पड़ा. रानी अपने मायके के महल में दासी बनकर काम करने लगीं और राजा एक तेली के यहां मजदूरी करने लगे.काफी समय तक कठिनाइयों का सामना करने के बाद एक दिन दशमी तिथि आई. उस दिन रानी ने श्रद्धा से दशा माता का व्रत किया और उनसे अपनी भूल की क्षमा मांगी.माता की कृपा से धीरे-धीरे उनके बुरे दिन समाप्त होने लगे. परिवार दोबारा मिल गया और उनकी किस्मत फिर से चमक उठी. बाद में राजा-रानी अपने राज्य लौटे और पहले की तरह समृद्ध जीवन जीने लगे.

 व्रत कथा का महत्व

इस कथा से यह सीख मिलती है कि देवी-देवताओं का अपमान नहीं करना चाहिए और कठिन समय में भी आस्था नहीं छोड़नी चाहिए. श्रद्धा से किया गया व्रत और पूजा जीवन में सुख, समृद्धि और शांति लाने का मार्ग बन सकती है.धार्मिक मान्यता है कि जो महिलाएं दशा माता का व्रत रखकर यह कथा सुनती या पढ़ती हैं, उन्हें परिवार की खुशहाली, स्वास्थ्य और सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है.

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है. पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. India News इसकी सत्यता का दावा नहीं करता है.

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