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Home > धर्म > शरीर में लोहे के हुक चुभोकर हवा में लटकते हैं लोग… केरल की बेहद चौका देने वाली रहस्यमयी परंपरा

शरीर में लोहे के हुक चुभोकर हवा में लटकते हैं लोग… केरल की बेहद चौका देने वाली रहस्यमयी परंपरा

What is Garudan Parava: केरल में चलती आ रहा एक ऐसी डरावनी और खोफनाक परंपरा, जिसमें कलाकार अपने शरीर में लोहे के हुक चुभोकर हवा में लटकते हैं. आइये जानते हैं क्या हैं गरुड़न परवा परंपरा का महत्व

Written By: Chhaya Sharma
Last Updated: January 10, 2026 14:18:39 IST

Garudan Parava:  भारत में तरह-तरह की परंपराएं प्रचलित हैं, जिन्हें सुनकर और देखकर आप चौक जाएंगे.  सदियों से चली आ रही यह परंपराएं बेहद रहस्यमयी हैं. ऐसी ही केरल में काफी लंबे समय से चलती आ रही चौका दने वाली रहस्यमयी परंपरा है, जिसे गरुड़न परवा कहा जाता है. इसमें इसमें कलाकार अपने शरीर में लोहे के हुक चुभोकर हवा में लटकते हैं, केरल की यह परंपरा सुनने और देखने में बेहद खोफनाक और डरावनी लगती है. आइये जानते हैं क्या हैं गरुड़न परवा परंपरा का महत्व और क्या है इसके पीछे का रहस्य

केरल की गरुड़न परवा परंपरा

गरुड़न परवा की परंपरा केरल के कुछ चुनिंदा भद्रकाली मंदिरों में की जाती है. “गरुड़न” का अर्थ होता है भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ और “परवा” का मतलब होता है अनुष्ठान या प्रदर्शन. गरुड़न परवा की परंपरा के पीछे केवल पीड़ा नहीं, बल्कि गहरी आस्था, पौराणिक विश्वास और देवी भद्रकाली से जुड़ी कहानी छिपी है. इसमें कलाकार गरुड़ का रूप धारण करके देवी भद्रकाली का दूत बनते हैं

भद्रकाली और भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ से जुड़ी है कहानी

पौराणिक कथा के अनुसार, भद्रकाली ने जब दारिकासुर जैसे शक्तिशाली असुरों का वध किया, तब भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ ने युद्ध के बाद देवी के क्रोध को शांत करने की भूमिका निभाई थी. गरुड़न परवा उसी कथा का प्रतीकात्मक रूप माना जाता है. कलाकार जब गरुड़ का वेश धारण करता है, तब वहा के लोगों की मान्यताओं के अनुसार उन पर देवी की शक्ति का आशीर्वाद उतरता है. गरुड़न परवा की परंपरा में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस अनुष्ठान में कलाकार अपनी पीठ और जांघों पर विशेष हुक लगावाते हैं, जिनमें रस्सियाँ बांधकर उन्हें एक लकड़ी या लोहे के शाफ्ट से हवा में उठाया जाता है. इस दौरान वो दर्द में नहीं होते, बल्कि एक तरह की trance यानी अर्ध-चेतन अवस्था में चले जाते है. वहा के लोगों की मान्यता है कि उस समय कलाकार में देवी भद्रकाली की शक्ति होती है, इसलिए उन्हें पीड़ा महसूस नहीं होती. इस अनुष्ठान के दौरान गरुड़न तेज आवाज़ में मंत्र बोलते है, नृत्य करते है और कभी-कभी भविष्यवाणियां तक कर देते हैं, जिसे श्रद्धालु देवी का संदेश मानते हैं और बड़ी श्रद्धा से सुनते हैं. इसे केवल शारीरिक करतब नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव माना जाता है.

अंधविश्वास है या विश्वास 

लेकिन आज के समय में जब आधुनिक सोच और मानव अधिकारों की बात होती है, तो सदियों से चली आ रही गरुड़न परवा जैसी परंपराएं सवालों के घेरे में आ जाती हैं. कई लोगों को यह अंधविश्वास और खतरनाक लगती है. लेकिन फिर भी यह परंपरा कभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. इसका कारण है गरुड़न परवा की परंपरा में लोगों की गहरी आस्था और विश्वास है कि यह अनुष्ठान देवी को प्रसन्न करता है और गांव को विपत्तियों से बचाता है. हालांकि अब यह परंपरा बहुत सीमित हो गई है और  केरल के केवल कुछ मंदिरों तक सिमट कर गई है. इसलिए कई जगहों पर सुरक्षा बढ़ा दी गई है और सुनिश्चित किया गया है कि कलाकार अपनी इच्छा से ही इसमें भाग ले. गरुड़न परवा की परंपरा भले ही अजीब या डरावनी लगे, लेकिन इसे समझने के लिए हमें उनकी संस्कृति और विश्वास को भी समझना होगा, जिसकी वजह से यह आज तक जीवित है.

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है. पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. India News इसकी सत्यता का दावा नहीं करता है.

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शरीर में लोहे के हुक चुभोकर हवा में लटकते हैं लोग… केरल की बेहद चौका देने वाली रहस्यमयी परंपरा

What is Garudan Parava: केरल में चलती आ रहा एक ऐसी डरावनी और खोफनाक परंपरा, जिसमें कलाकार अपने शरीर में लोहे के हुक चुभोकर हवा में लटकते हैं. आइये जानते हैं क्या हैं गरुड़न परवा परंपरा का महत्व

Written By: Chhaya Sharma
Last Updated: January 10, 2026 14:18:39 IST

Garudan Parava:  भारत में तरह-तरह की परंपराएं प्रचलित हैं, जिन्हें सुनकर और देखकर आप चौक जाएंगे.  सदियों से चली आ रही यह परंपराएं बेहद रहस्यमयी हैं. ऐसी ही केरल में काफी लंबे समय से चलती आ रही चौका दने वाली रहस्यमयी परंपरा है, जिसे गरुड़न परवा कहा जाता है. इसमें इसमें कलाकार अपने शरीर में लोहे के हुक चुभोकर हवा में लटकते हैं, केरल की यह परंपरा सुनने और देखने में बेहद खोफनाक और डरावनी लगती है. आइये जानते हैं क्या हैं गरुड़न परवा परंपरा का महत्व और क्या है इसके पीछे का रहस्य

केरल की गरुड़न परवा परंपरा

गरुड़न परवा की परंपरा केरल के कुछ चुनिंदा भद्रकाली मंदिरों में की जाती है. “गरुड़न” का अर्थ होता है भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ और “परवा” का मतलब होता है अनुष्ठान या प्रदर्शन. गरुड़न परवा की परंपरा के पीछे केवल पीड़ा नहीं, बल्कि गहरी आस्था, पौराणिक विश्वास और देवी भद्रकाली से जुड़ी कहानी छिपी है. इसमें कलाकार गरुड़ का रूप धारण करके देवी भद्रकाली का दूत बनते हैं

भद्रकाली और भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ से जुड़ी है कहानी

पौराणिक कथा के अनुसार, भद्रकाली ने जब दारिकासुर जैसे शक्तिशाली असुरों का वध किया, तब भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ ने युद्ध के बाद देवी के क्रोध को शांत करने की भूमिका निभाई थी. गरुड़न परवा उसी कथा का प्रतीकात्मक रूप माना जाता है. कलाकार जब गरुड़ का वेश धारण करता है, तब वहा के लोगों की मान्यताओं के अनुसार उन पर देवी की शक्ति का आशीर्वाद उतरता है. गरुड़न परवा की परंपरा में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस अनुष्ठान में कलाकार अपनी पीठ और जांघों पर विशेष हुक लगावाते हैं, जिनमें रस्सियाँ बांधकर उन्हें एक लकड़ी या लोहे के शाफ्ट से हवा में उठाया जाता है. इस दौरान वो दर्द में नहीं होते, बल्कि एक तरह की trance यानी अर्ध-चेतन अवस्था में चले जाते है. वहा के लोगों की मान्यता है कि उस समय कलाकार में देवी भद्रकाली की शक्ति होती है, इसलिए उन्हें पीड़ा महसूस नहीं होती. इस अनुष्ठान के दौरान गरुड़न तेज आवाज़ में मंत्र बोलते है, नृत्य करते है और कभी-कभी भविष्यवाणियां तक कर देते हैं, जिसे श्रद्धालु देवी का संदेश मानते हैं और बड़ी श्रद्धा से सुनते हैं. इसे केवल शारीरिक करतब नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव माना जाता है.

अंधविश्वास है या विश्वास 

लेकिन आज के समय में जब आधुनिक सोच और मानव अधिकारों की बात होती है, तो सदियों से चली आ रही गरुड़न परवा जैसी परंपराएं सवालों के घेरे में आ जाती हैं. कई लोगों को यह अंधविश्वास और खतरनाक लगती है. लेकिन फिर भी यह परंपरा कभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. इसका कारण है गरुड़न परवा की परंपरा में लोगों की गहरी आस्था और विश्वास है कि यह अनुष्ठान देवी को प्रसन्न करता है और गांव को विपत्तियों से बचाता है. हालांकि अब यह परंपरा बहुत सीमित हो गई है और  केरल के केवल कुछ मंदिरों तक सिमट कर गई है. इसलिए कई जगहों पर सुरक्षा बढ़ा दी गई है और सुनिश्चित किया गया है कि कलाकार अपनी इच्छा से ही इसमें भाग ले. गरुड़न परवा की परंपरा भले ही अजीब या डरावनी लगे, लेकिन इसे समझने के लिए हमें उनकी संस्कृति और विश्वास को भी समझना होगा, जिसकी वजह से यह आज तक जीवित है.

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है. पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. India News इसकी सत्यता का दावा नहीं करता है.

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