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Holashtak 2026: जानिए कब शुरू होगा होलाष्टक, इसके पीछे का रहस्य और क्यों इसे माना जाता है अशुभ!

Holashtak 2026: होलाष्टक का आठ दिन का समय धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से अशुभ होता है और इस दौरान शुभ कार्यों से परहेज करना माना जाता है.2026 में होलाष्टक  24 फरवरी से शुरू होकर 3 मार्च तक चलेगा, जो होली से ठीक आठ दिन पहले का समय है. ज्योतिष के अनुसार, होलाष्टक के प्रत्येक दिन पर अलग-अलग ग्रह की तीव्र ऊर्जा प्रभाव डालती है, जिससे बाधाएं और नकारात्मकता बढ़ती है. इस समय पूजा, ध्यान और आराधना करना शुभ माना जाता है.

Written By: Shivashakti narayan singh
Last Updated: 2026-02-18 12:14:09

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Holashtak 2026: होलाष्टक की शुरुआत इस साल 24 फरवरी से हो रही है. होली से ठीक आठ दिन पहले शुरू होने वाला यह समय धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से अशुभ माना जाता है. इस दौरान पारंपरिक रूप से शादी या कोई शुभ कार्य करने से परहेज किया जाता है. होलिका दहन. होलाष्टक के आठवें दिन मनाया जाता है.होलाष्टक की उत्पत्ति पौराणिक कथा से जुड़ी है, जिसमें राक्षस राजा हिरण्यकशिपु ने अपने भक्त पुत्र प्रह्लाद पर आठ दिन तक अत्याचार किया. यही कारण है कि यह आठ दिन नकारात्मक ऊर्जा से भरे माने जाते हैं.

विशेष रूप से, होलाष्टक का प्रभाव उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों पर अधिक माना जाता है, जैसे पंजाब के व्यास, रावी और सतलज नदी के पास, और अजमेर के पुष्कर क्षेत्र में. दक्षिण भारत में इसकी महत्ता कम है.संक्षेप में, होलाष्टक एक आठ-दिन का अशुभ समय है, जिसमें सावधानी बरतना और शुभ कार्यों से परहेज करना चाहिए.

फाल्गुन का महत्व

इस साल फाल्गुन माह 2 फरवरी से शुरू हो रहा है. इस महीने महाशिवरात्रि और होली जैसे बड़े त्योहार आते हैं. फाल्गुन माह धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इस महीने कई शुभ अवसर और उत्सव आते हैं.

 होलाष्टक की अवधि और नकारात्मक प्रभाव

ज्योतिष के अनुसार होलाष्टक का यह आठ दिन का समय नकारात्मक ऊर्जा से भरा होता है. इस दौरान शुभ या धार्मिक कार्य करने की सलाह नहीं दी जाती. होलाष्टक के प्रत्येक दिन का ग्रह प्रभाव अलग होता है -जैसे अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य और दशमी को शनि का प्रभाव तीव्र माना जाता है. इन ग्रहों के प्रभाव के कारण बाधाएं और नकारात्मकता बढ़ती हैं, इसलिए शादी, नए काम या अन्य शुभ गतिविधियों के लिए यह समय उपयुक्त नहीं माना जाता.

होलाष्टक की धार्मिक और पौराणिक कथा

होलाष्टक की उत्पत्ति प्राचीन पौराणिक कहानी से जुड़ी है. राक्षस राजा हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद, जो भगवान विष्णु के भक्त थे, को आठ दिन तक यातनाएं दी थीं. इसी कठिन और अशुभ आठ दिन की अवधि को होलाष्टक कहा जाने लगा.इस समय कुछ गतिविधियां वर्जित मानी जाती हैं, जबकि पूजा, ध्यान और प्रार्थना लाभकारी माने जाते हैं.होलाष्टक के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, नया व्यवसाय शुरू करना या अन्य शुभ कार्य नहीं करना चाहिए. माना जाता है कि इन दिनों नकारात्मक ऊर्जा अपने चरम पर होती है और शुभ कार्यों में बाधाएं पैदा कर सकती है.

होलाष्टक का भौगोलिक प्रभाव

होलाष्टक का प्रभाव मुख्य रूप से उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में देखा जाता है ,जैसे पंजाब में व्यास, रवि और सतलज नदियों के आसपास और अजमेर के पुष्कर क्षेत्र में. हालांकि, इन क्षेत्रों के बाहर भी लोग इस समय शुभ कार्य करने से बचते हैं. दक्षिण भारत में होलाष्टक का प्रचलन कम है.

Disclaimer : प्रिय पाठक, हमारी यह खबर पढ़ने के लिए शुक्रिया. यह खबर आपको केवल जागरूक करने के मकसद से लिखी गई है. हमने इसको लिखने में सामान्य जानकारियों की मदद ली है. INDIA News इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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Written By: Shivashakti narayan singh
Last Updated: 2026-02-18 12:14:09

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