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Holika Dahan 2026: कब मनाई जाएगी होली 3 या 4 मार्च को?, पंडित से जानें होलिका दहन का सही मुहूर्त और तारीख

Holika Dahan 2026: इंतजार लगभग खत्म हो गया है! होली 2026 बस आने ही वाली है. लोगों में उत्साह है और तैयारियां ज़ोरों पर हैं. पंडित जयराम द्विवेदी से जानिए होली का शुभ मुहूर्त और समय.

Written By: Pushpendra Trivedi
Last Updated: 2026-02-22 11:17:58

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Holika Dahan 2026: फरवरी का महीना फुर्र होने को है और एक इसके बाद भारतीय त्योहार का आगाज होने वाला है. इंतजार लगभग खत्म हो गया है! होली 2026 बस आने ही वाली है. लोगों में उत्साह है और तैयारियां ज़ोरों पर हैं. स्किन-फ्रेंडली रंगों से लेकर दावत की रेसिपी, पार्टी लुक और पुराने कपड़ों तक, लोग त्योहार की रंगीन भावना में डूबने के लिए तैयार हो रहे हैं. होली का त्योहार लोगों में प्यार, सदभावना और एकता को दर्शाता है. यह दिन सारे गिले शिकवे दूर करने का पर्व भी है. अगर आप किसी से बात नहीं कर रहें हैं तो उसे रंग लगाकर रिश्ते को फिर से स्टार्ट कर सकते हैं.

हिंदू संस्कृति में होली का त्योहार काफी फेमस है और लोगों द्वारा इसे बड़े स्तर पर सेलिब्रेट किया जाता है. होली से पहले लोग रंगभरी एकादशी भी मना ते हैं. होली सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि विदेशों में भी लोग इसे उत्साह के साथ मनाते हैं. ऐसे में लोगों के मन में अक्सर कंफ्यूजन रहता है कि होली कब है? तो चलिए कुंडेश्वर धाम के पंडित रामकुमार द्विवेदी से जानते हैं कि होली का पर्व कब मनाया जाना है?

होली 2026 की तारीख और समय

पंडित रामकुमार द्विवेदी के अनुसार, पंचांग में फागुन या फाल्गुन तिथि 02 मार्च को शाम 05 बजकर 55 मिनट पर शुरू होगी, जो 3 मार्च को शाम 4 बजकर 40 मिनट तक रहेगी. इसी के साथ भद्रा की भी शुरुआत भी हो जाएगी. यानी 2 मार्च 2026, सोमवार को भद्रा शाम 5 बजकर 55 मिनट पर शुरू हो जाएगी, जिसका समापन 3 मार्च की सुबह 5 बजकर 32 मिनट पर होगा. ऐसे में होलिका दहन का सही समय 3 मार्च को किया जाएगा. 3 मार्च को होलिका दहन का मुहूर्त शाम 6 बजकर 22 मिनट से लेकर रात 8 बजकर 50 मिनट के बीच होगा इसी के चलते होली के रंग का पर्व 4 मार्च को धूमधाम से मनाया जाएगा. इससे पहले होलिका दहन होता है, जिसको लोग एकसाथ इकट्ठा होकर भगवान की पूजा करते हैं. होलिका दहन 3 मार्च को पड़ रही है. 

होली का है विशेष महत्व

रामकुमार द्विवेदी के मुताबिक, होली का सनातन धर्म में विशेष महत्व है. यह हिंदुओं के सबसे अहम त्योहारों में से एक है. इस त्योहार की दो खास बाते लोगों के बीच इसके महत्व को और भी बढ़ा देती हैं. वह हैं बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न और भगवान कृष्ण और राधा के बीच प्रेम. इस पर्व को सर्दियों के खत्म होने और बसंत के आने का भी प्रतीक के तौर पर भी देखते हैं. यह त्योहार इंसान के अंदर के भेदभाव को मिटाता है और लोग रंग के जश्न में एकसाथ डूबे नजर आते हैं. होली में रंग को इस बात का भी प्रतीक के तौर पर माना जाता है कि इंसान के जीवन में इसी तरह खुशियों के रंग छाए रहें. 

पौराणिक महत्व

वैदिक पंडित रामकुमार द्विवेदी बताते हैं कि होली का महतव आज से नहीं बल्कि कई सदियों पुराना है. इसका हमारे पुराणों में भी उल्लेख मिलता है. एक कहानी इसके बारे में काफी प्रचलित है. भगवान कृष्ण सांवले रंग के लिए जाने जाते हैं. ऐसा माना जाता है कि उन्हें इस बात को लेकर इनसिक्योरिटी महसूस होती थी कि क्या राधा, जो गोरी थीं, इसे स्वीकार करेंगी. जब उन्होंने यह चिंता अपनी मां को बताई, तो यशोदा ने उन्हें राधा के चेहरे पर रंग लगाने की सलाह दी ताकि उनके बीच दिखने वाले रंग के अंतर को हटाया जा सके. 

कृष्ण ने उनकी सलाह मान ली और आगे चलकर होली के दौरान रंगों से खेलने की प्रेरणा मिली. होली मथुरा और वृंदावन में बहुत उत्साह के साथ मनाई जाती है क्योंकि ये जगहें भगवान कृष्ण की कहानी से काफी हद तक जुड़ी हुई हैं. एक और कहानी कहती है कि राक्षस राजा हिरण्यकश्यप की बहन होलिका ने प्रह्लाद को आग में जलाने की कोशिश की. लेकिन, भगवान ने प्रह्लाद को बचा लिया, जबकि वह जलकर राख हो गईं. इसे बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाने लगा. इसी वजह से हर साल होलिका दहन किया जाने लगा और दूसरे दिन रंग की होली खेली जाने लगी. 

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Last Updated: 2026-02-22 11:17:58

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