Holika Dahan Prahlad Story: होलिका दहन हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है. यह त्योहार फाल्गुन मास की पूर्णिमा की रात को मनाया जाता है. यह केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह आस्था, भक्ति और सच्चाई की जीत का प्रतीक है.यह त्योहार लोगों को जोड़ता है. परिवार और पड़ोसी एक साथ इकट्ठा होते हैं. आपसी मनमुटाव भूलकर नई शुरुआत करते हैंअब कई जगह पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए छोटी और सुरक्षित होलिका जलाई जाती है. लोग सूखी लकड़ियों और प्राकृतिक सामग्री का उपयोग करते हैं ताकि प्रकृति को नुकसान न पहुंचे
इस पर्व के पीछे भक्त प्रह्लाद, उनके पिता हिरण्यकश्यप और होलिका की पौराणिक कथा जुड़ी हुई है. यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति और विश्वास के सामने सबसे बड़ी बुराई भी टिक नहीं सकती.
प्रह्लाद और हिरण्यकश्यप की कथा
हिरण्यकश्यप एक असुर राजा था. उसने कठोर तपस्या करके वरदान प्राप्त किया था, जिससे वह बहुत शक्तिशाली बन गया. शक्ति मिलने के बाद उसमें अहंकार आ गया. वह खुद को भगवान मानने लगा और चाहता था कि सभी लोग उसी की पूजा करें.लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का भक्त था. उसने भगवान विष्णु की भक्ति करना नहीं छोड़ा, चाहे उसके पिता ने कितनी ही बार उसे रोका.हिरण्यकश्यप को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं थी. उसने प्रह्लाद को कई बार मारने की कोशिश की. उसे ऊंचाई से नीचे फेंक दिया गया,हाथियों से कुचलवाने की कोशिश की गई, भूखा तक रखा गया,लेकिन हर बार भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गए.
होलिका की भूमिका
हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को वरदान था कि वह आग में नहीं जलेगी. तब हिरण्यकश्यप ने एक योजना बनाई.होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई. उसे विश्वास था कि वह सुरक्षित रहेगी और प्रह्लाद जल जाएगा.लेकिन हुआ इसके विपरीत.क्योंकि होलिका की नीयत गलत थी, उसका वरदान काम नहीं आया. वह अग्नि में जल गई, जबकि भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बाहर निकल आए.यही घटना होलिका दहन के रूप में याद की जाती है.
भगवान नरसिंह का अवतार
बाद में भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लिया. यह आधा मनुष्य और आधा सिंह का रूप था. उन्होंने हिरण्यकश्यप का अंत किया और प्रह्लाद की रक्षा की.इस घटना ने साबित कर दिया कि अहंकार और बुराई का अंत निश्चित है, और सच्ची भक्ति की हमेशा जीत होती है.
होलिका दहन क्यों मनाया जाता है?
होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है. इस दिन लोग लकड़ियों का ढेर लगाकर अग्नि जलाते हैं.लोग परिवार और समाज के साथ मिलकर पूजा करते हैं और अग्नि की परिक्रमा करते हैं. यह अग्नि नकारात्मकता, अहंकार और बुरी शक्तियों को जलाने का प्रतीक मानी जाती है.