Science Behind Indian Temples: जब हम मंदिर में कदम रखते हैं, तो सबसे पहले मन को शांति का अनुभव होता है. भीड़ हो या सन्नाटा, घंटियों की आवाज हो या फिर अगरबत्ती की खुशबू, कुछ तो है जो मंदिर में मन को स्थिर कर देता है. ऐसे में हमेशा मन में सवाल आता है, कि क्या यह हमारे मन की आस्था है, या फिर इसके पीछे साइंस से जुड़ा कोई रहस्य हैं, जो मन को शांत बनाता है. आइये जानते हैं यहां.
मंदिर सर्फि पूजा स्थान नहीं होता है
भारती में मंदिरों को पूजा का स्थान नहीं माना जाता है. बल्कि प्राचीन काल में मंदिरों में लोग ध्यान करते थे, कुछ नया सीखते थे और मन को संतुलित करने की कोशिश करते थे. यही वजा है कि मंदिर में शांति का अनुभव होना हमारी आस्था के साथ-साथ मंदिरों की बनावट और उनका स्थान भी माना जाता है. गर्भगृह यानी जहाँ मुख्य देवी-देवता की मूर्ति स्थापित होती है, वो मंदिर का सबसे पवित्र हिस्सा माना जाता है. इसलिए इसे जानबूझकर छोटा, अंधेरा और शांत बनाया जाता था. जब कोई व्यक्ति मंदिर में प्रवेश करता है, तो उसे महसूस होता है कि बाहरी दुनिया पीछे छूट रही है, रोशनी कम हो रही है, आवाजें भी धीमी होती जा रही हैं और मनको शांति का अनुभव हो है. इसे ही आधुनिक भाषा में “मेंटल रीसेट” कहा जा सकता हैं.
मंदिरों का गर्भगृह होता है ऊर्जा का केंद्र
मान्यताओं के अनुसार मंदिरों के गर्भगृह को ऊर्जा का केंद्र माना जाता है, इसलिए वहां रखी गई भगवान की मूर्ति, उनके नीचे का स्थान और पूरा ढांचा भी इसी तरह से बनाया जाता था. ऐसे में वहां खड़े होने वाले व्यक्ति की हृदय और सांसों की गति धीमी हो जाती है और बुरे विचार नहीं आते हैं, आज के समय में इसे विज्ञान की भाषा में ध्यान या फिर मेडिटेशन की अवस्था कहा जाता है. तो ऐसा कहना गलत नहीं है कि, जो शांति आज के समय में लोग योग और मेडिटेशन से पाने की कोशिश करते हैं, वो आपको मंदिर में आसानी से मिल सकती है.
पृथ्वी का होता है अपना मैग्नेटिक फील्ड
अब बात करते हैं धरती के चुंबकीय क्षेत्र की, जिसे लेकर विज्ञान में कई तरह की धारणाएं है, विज्ञानिको का मानना है कि पृथ्वी का अपना एक मैग्नेटिक फील्ड होता है और मानव के के शरीर के साथ-सा उसके दिमाग और दिल को विद्युत संकेत भेजता है. इसलिए ही पुराने समय में मंदिरों को ऐसे स्थानों पर बनाया जाता था, जहां कि प्राकृतिक ऊर्जा अधिक संतुलित होती थी. हालांकि आधुनिक विज्ञान इस दावे को पूरी तरह प्रमाणित नहीं करते हैं. लेकिन फिर भी यह जरूर माना जाता है कि निश्चित दिशा में बैठने से मन को शांति का अनुभव होता है और ध्यान करने से मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पढ़ता है.
आस्था और विज्ञान का मेल होता है मंदिर
आपने देखा होगा कि मंदिरों में प्रवेश करने से पहले लोग जूते उतारते हैं, घंटी बजाते हैं और परिक्रमा भी लगाते हैं, लेकिन यह सब केवल परंपरा नहीं है, इसके पीछे आस्था के साथ वैज्ञानिक कारण भी है. दरअसल, नंगे पांव चलने से जमीन से सीधा संपर्क बनता है और स्वास्थ पर अच्छा असर पड़ता है, घंटी की ध्वनि मन को शांति पहुंचाती है. वहीं परिक्रमा शरीर को हल्का महसूस कराकर मन को स्थिर रखने का काम करती है. इन सभी छोटे-छोटे बातों को आज की वैज्ञानिक भाषा में “माइंडफुलनेस” कहते हैं. इसलिए यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि मंदिर कोई जादुई नहीं हैं, मंदिरों को इस समझ के साथ बनाया जाता है जिससे इंसान का मन शांत हो और शरीर संतुलित महसूस करें.
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