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Home > धर्म > जैन मुनि कपड़े क्यों नहीं पहनते?इसके पीछे छिपे हैं 5 ऐसे गहरे रहस्य जिन्हें जानकर आप भी रह जाएंगे हैरान

जैन मुनि कपड़े क्यों नहीं पहनते?इसके पीछे छिपे हैं 5 ऐसे गहरे रहस्य जिन्हें जानकर आप भी रह जाएंगे हैरान

Jain Monk History: जैन धर्म अपनी अनोखी परंपराओं और कठिन साधना के लिए जाना जाता है. इन्हीं में से एक परंपरा है,कुछ जैन मुनियों का बिना कपड़ों के रहना. पहली नजर में यह बात अजीब लग सकती है, लेकिन इसके पीछे गहरी आध्यात्मिक सोच और सख्त नियम जुड़े होते हैं.

Written By: Shivashakti narayan singh
Last Updated: April 1, 2026 16:36:32 IST

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Jain Monk Cloths: जैन धर्म में मुख्य रूप से दो पंथ माने जाते हैं,श्वेतांबर और दिगंबर. श्वेतांबर संप्रदाय के साधु सफेद वस्त्र पहनते हैं, जबकि दिगंबर मुनि पूरी तरह निर्वस्त्र रहते हैं. दिगंबर मुनियों का जीवन बेहद अनुशासित और कठिन माना जाता है.दिगंबर परंपरा में दिशाओं को ही वस्त्र माना जाता है. यानी व्यक्ति प्रकृति के साथ उसी रूप में रहता है जैसा वह जन्म से है. यह पूर्ण त्याग और आत्मसंयम का प्रतीक माना जाता है.

दिगंबर मुनि मानते हैं कि जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य मोक्ष यानी आत्मा की मुक्ति है. इसके लिए हर तरह की सांसारिक चीजों का त्याग जरूरी माना जाता है. कपड़े भी एक प्रकार का भौतिक वस्त्र हैं, जो व्यक्ति में आसक्ति पैदा कर सकते हैं. इसलिए वे इन्हें पूरी तरह छोड़ देते हैं.उनका यह भी मानना है कि जब मन पूरी तरह शुद्ध हो जाता है, तब शरीर को ढकने की जरूरत नहीं रह जाती. कपड़ों को वे कई बार मन के विकारों को छिपाने का माध्यम मानते हैं. जब मन में कोई विकार ही नहीं, तो उसे ढकने की आवश्यकता भी नहीं है.

 हर मौसम में एक जैसा जीवन

दिगंबर मुनि सर्दी, गर्मी या बारिश,हर मौसम में बिना कपड़ों के ही रहते हैं. वे किसी तरह की सुविधा जैसे कंबल या गर्म कपड़ों का इस्तेमाल नहीं करते. उनका मानना है कि शरीर को सहनशील बनाना और हर परिस्थिति को समान भाव से स्वीकार करना साधना का हिस्सा है.

क्यों नहीं नहाते साधु-साध्वियां?

जैन मुनि और साध्वियां दीक्षा लेने के बाद सामान्य रूप से स्नान नहीं करते. इसका कारण यह है कि वे शरीर को अस्थायी मानते हैं. उनके अनुसार, असली शुद्धि शरीर की नहीं बल्कि आत्मा की होती है, जो ध्यान, तप और ज्ञान से प्राप्त होती है.

एक कठिन लेकिन अनुशासित जीवन

जैन मुनियों का जीवन त्याग, संयम और अनुशासन का उदाहरण होता है. वे न सिर्फ वस्त्रों का त्याग करते हैं, बल्कि सुख-सुविधाओं से भी पूरी तरह दूर रहते हैं. उनका हर कदम आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की दिशा में होता है.

  Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है. पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. India News इसकी सत्यता का दावा नहीं करता है.

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Written By: Shivashakti narayan singh
Last Updated: April 1, 2026 16:36:32 IST

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Jain Monk Cloths: जैन धर्म में मुख्य रूप से दो पंथ माने जाते हैं,श्वेतांबर और दिगंबर. श्वेतांबर संप्रदाय के साधु सफेद वस्त्र पहनते हैं, जबकि दिगंबर मुनि पूरी तरह निर्वस्त्र रहते हैं. दिगंबर मुनियों का जीवन बेहद अनुशासित और कठिन माना जाता है.दिगंबर परंपरा में दिशाओं को ही वस्त्र माना जाता है. यानी व्यक्ति प्रकृति के साथ उसी रूप में रहता है जैसा वह जन्म से है. यह पूर्ण त्याग और आत्मसंयम का प्रतीक माना जाता है.

दिगंबर मुनि मानते हैं कि जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य मोक्ष यानी आत्मा की मुक्ति है. इसके लिए हर तरह की सांसारिक चीजों का त्याग जरूरी माना जाता है. कपड़े भी एक प्रकार का भौतिक वस्त्र हैं, जो व्यक्ति में आसक्ति पैदा कर सकते हैं. इसलिए वे इन्हें पूरी तरह छोड़ देते हैं.उनका यह भी मानना है कि जब मन पूरी तरह शुद्ध हो जाता है, तब शरीर को ढकने की जरूरत नहीं रह जाती. कपड़ों को वे कई बार मन के विकारों को छिपाने का माध्यम मानते हैं. जब मन में कोई विकार ही नहीं, तो उसे ढकने की आवश्यकता भी नहीं है.

 हर मौसम में एक जैसा जीवन

दिगंबर मुनि सर्दी, गर्मी या बारिश,हर मौसम में बिना कपड़ों के ही रहते हैं. वे किसी तरह की सुविधा जैसे कंबल या गर्म कपड़ों का इस्तेमाल नहीं करते. उनका मानना है कि शरीर को सहनशील बनाना और हर परिस्थिति को समान भाव से स्वीकार करना साधना का हिस्सा है.

क्यों नहीं नहाते साधु-साध्वियां?

जैन मुनि और साध्वियां दीक्षा लेने के बाद सामान्य रूप से स्नान नहीं करते. इसका कारण यह है कि वे शरीर को अस्थायी मानते हैं. उनके अनुसार, असली शुद्धि शरीर की नहीं बल्कि आत्मा की होती है, जो ध्यान, तप और ज्ञान से प्राप्त होती है.

एक कठिन लेकिन अनुशासित जीवन

जैन मुनियों का जीवन त्याग, संयम और अनुशासन का उदाहरण होता है. वे न सिर्फ वस्त्रों का त्याग करते हैं, बल्कि सुख-सुविधाओं से भी पूरी तरह दूर रहते हैं. उनका हर कदम आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की दिशा में होता है.

  Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है. पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. India News इसकी सत्यता का दावा नहीं करता है.

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