Kalashtami 2026: आज कालाष्टमी का व्रत है और यह व्रत भगवान शिव के रौद्र स्वरूप भगवान काल भैरव को समर्पित होता है. मान्यता के अनुसार भगवान काल भैरव की पूजा से जीवन की परेशानियां दूर होती हैं. आज के दिन शाम के समय कालाष्टमी व्रत की कथा जरूर पढ़नी या सुननी चाहिए, ऐसा करने से आज की पूजा और व्रत का पूरा फल मिलता हैं. इसके अलावा आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए कुछ खास उपाय बताए गए हैं. आइये जानते हैं यहां.
कालाष्टमी व्रत 2026
Kalashtami 2026 Vrat Katha And Upay: हर साल फाल्गुन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन कालाष्टमी का व्रत किया जाता हैं, इसलिए आज कालाष्टमी व्रत है और यह व्रत भगवान शिव के रौद्र स्वरूप भगवान काल भैरव को समर्पित होता है क्योंकि शिवपुराण के अनुसार कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान कालभैरव का जन्म हुआ था। मान्यताओं के अनुसार, आज के दिन जो भी व्यक्ति भगवान काल भैरव की पूरे विधि विधान से पूजा करता और व्रत रखता है उसके जीवन की परेशानियां दूर होती है और तंत्र-मंत्र या जादू-टोने से जुड़ी हर प्रकार की बाधा समाप्त हो जाती है, लेकिन यह व्रत तभी पूरा माना जाता हैं, जब कालाष्टमी व्रत की कथा पढ़ी या सुनी जाए, क्योंकि किसी भी व्रत को करने से पहले यह जानना जरूरी है, कि व्रत क्यों रखा जा रहा है और इसका महत्व क्या है, इसलिए हिंदू धर्म में हर व्रत के लिए कथा जरूर पढ़नी चाहिए. इसके अलावा अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करना चाहते हैं, तो आज के दिन आपको कुछ खास उपाय भी जरूर करने चाहिए. आइये जानते हैं यहां कालाष्टमी व्रत कथा और आज के दिन किए जाने वाले उपाय
हिंदू धर्म की पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार विष्णु जी और ब्रह्मा जी के बीच विवाद उत्पन्न हुआ, कि उनमें से श्रेष्ठ कौन है, होते-होते यह विवाद काफी बढ़ गया. जिसके बाद विष्णु जी और ब्रह्मा जी शिव जी के पास पहुंचे. समाधान निकालने के लिए भगवान शिव एक सभा का आयोजन करा. इस सभा में बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, सिद्ध संत आदि उपस्थित हुए. इस सभा में लिए गए एक निर्णय को भगवान विष्णु स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन ब्रह्मा जी संतुष्ट नहीं होते. जिसके बाद वो महादेव का अपमान करते हैं। शांतचित्त शिव अपना यह अपमान सहन नहीं कर पाते हैं और रौद्र रूप धारण कर लेते हैं, इसके बाद भगवान शंकर प्रलय रूपी हो जाते है और उनका यह रौद्र रूप देख कर तीनों लोक डर से कांपने लगते है और सभी देवी देवता भयभीत हो जाते है. भगवान शिव के इसी रूद्र रूप से भगवान भैरव प्रकट होते हैं, श्वान पर सवार हाथ में दंड लिए रूप की वजह से उन्हें "दंडाधिपति" भी कहा जाता है, यह शिव का अत्यंत भयंकर रूप होता है. भगवान शंकर का रौद्र रूप भैरव ब्रह्म देव के पांचवें सिर को काट दिया, जिसके बाद ब्रह्म देव को उनके गलती का एहसास होता है और ऐसा होते ही ब्रह्म देव व विष्णु देव के मध्य विवाद समाप्त होता है. रौद्र रूप भैरव ब्रह्म के ज्ञान को अर्जित करता है, जिससे उनका अभिमान व अहंकार नष्ट हो जाता है. इसके बाद ब्रह्मा जी काल भैरव से माफी मांगते हैं और इसके बाद भगवान शिव अपने असली रूप में आ जाते हैं. लेकिन काल भैरव पर ब्रह्म हत्या का पाप लग गया था. जिसके बाद भगवान शिव अपने रौद्र रूप भैरव को इस पाप से मुक्ति पाने के लिए काशी में प्रायश्चित करने को कहा. जिसके बाद भैरव ने कोतवाल के रूप में भगवान शिव की सेवा की और उन्हें ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली. इसलिए, कहा जाता है कि कालाष्टमी के दिन भगवान भैरव की पूजा करने से भक्तों के सभी भय और कष्ट दूर हो जाते हैं.
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