Kalpavas Kya Hota Hai: माघ मेला 2026 की शुरूवात हो चुकी है, यह हर साल प्रयागराज की पवित्र भूमि पर बड़े धूमधाम और भक्ति के साथ मनाया जाता है. इस दैरान बहुत सारे लोग संगम के किनारे कड़ाके की ठंड के बीच,छोटे-छोटे टेंटों में रहते हैं, सख्त नियमों का पालन करते हैं और आध्यात्मिक अभ्यास करते हैं, जिसे ‘कल्पवास’ कहा जाता है. यह आध्यात्मिक अभ्यास, जो पौष पूर्णिमा से शुरू होकर माघ पूर्णिमा तक चलता है, हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है.
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि लोग एक महीने के लिए अपना घर और परिवार छोड़कर यहां क्यों आते हैं? आइए कल्पवास के धार्मिक महत्व और इसके नियमों के बारे में जानें, जो इस प्रकार हैं:
क्या होता है ‘कल्पवास’ ? (What is Kalpavas)
कल्पवास शब्द दो शब्दों ‘कल्प’, और ‘वास’, से मिलकर बना है , ‘कल्प का अर्थ है समय का चक्र, और ‘वास’ का अर्थ है निवास या रहना. पुराणों में कहा गया है कि कल्पवास करने से भक्त पिछले जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है और मोक्ष की ओर बढ़ता है.धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एक महीने तक संगम के किनारे रहने से व्यक्ति का मानसिक और आध्यात्मिक परिवर्तन होता है.
महाभारत में भी है कल्पवास का वर्णन
कल्पवास के दैरान, भक्त प्रयागराज में संगम के किनारे लगे छोटे- छोटे टेंटो में एक महीना, कुछ धार्मिक रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों का पालन करते हुए बिताते हैं. कुछ लोग तो मकर संक्रांति से ही अपना कल्पवास शुरू कर देते हैं. परंपरा के अनुसार, कल्पवास को किसी व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास का एक साधन माना जाता है. पुण्य प्राप्त करने के लिए माघ महीने के पूरे महीने संगम पर रहने की इस आध्यात्मिक प्रथा को कल्पवास कहा जाता है. ऐसा माना जाता है कि जो लोग कल्पवास करते हैं, उन्हें मनचाहा आशीर्वाद मिलता है और वे जन्म और पुनर्जन्म के बंधनों से भी मुक्त हो जाते हैं. महाभारत के अनुसार, माघ महीने में कल्पवास करने से मिलने वाला पुण्य बिना कुछ खाए सौ साल तक तपस्या करने से मिलने वाले पुण्य के बराबर होता है. इस दौरान साफ सफेद या पीले कपड़े पहनना उचित माना जाता है. शास्त्रों के अनुसार, कल्पवास की न्यूनतम अवधि एक रात हो सकती है, जबकि इसे तीन रात, तीन महीने, छह महीने, छह साल, बारह साल या जीवन भर के लिए भी किया जा सकता है.
कल्पवास का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माघ महीने के दौरान सभी देवी-देवता संगम के किनारे निवास करते हैं. इसलिए, यहां पूजा करने से विशेष आशीर्वाद मिलता है.माघ मेले के समय कल्पवास करना सिर्फ संगम तट के किनारे रहना ही नहीं बल्कि यह मन, शरीर और आत्मा की शुद्धि की एक प्रक्रिया है. कहा जाता है कि इस दौरान गंगा में स्नान करने और सात्विक जीवन जीने से शरीर और मन दोनों शुद्ध होते हैं. ऐसा माना जाता है कि जो लोग निर्धारित रीति-रिवाजों के अनुसार कल्पवास पूरा करते हैं, उन्हें जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है.
कल्पवास के नियम
- कल्पवास करने वाले लोग , जिन्हें कल्पवासी कहा जाता है वे दिन में केवल एक बार भोजन करते हैं, जिसमें फल या सात्विक भोजन शामिल होता है.
- कल्पवासी को दिन में तीन बार गंगा में स्नान करना और पुजा करनी होती है.
- कल्पवासी बिस्तर त्याग देते हैं और जमीन पर पुआल की चटाई या साधारण चटाई पर सोते हैं.
- कल्पवास के दौरान झूठ बोलने, गुस्सा करने और निंदा करने से बचना चाहिए और सांसारिक सुखों का त्याग करना चाहिए.
- कल्पवास के दैरान अपने टेंट में हर समय एक दीपक जलाए रखना चाहिए.