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Home > धर्म > नवरात्रि में कन्या पूजा के साथ क्यों किया जाता है बटुक का पूजन? जानिए इसके पीछे छिपा धार्मिक रहस्य

नवरात्रि में कन्या पूजा के साथ क्यों किया जाता है बटुक का पूजन? जानिए इसके पीछे छिपा धार्मिक रहस्य

Batuk Bhairav Puja: हिंदू मान्यताओं के अनुसार अष्टमी और नवमी के दिन छोटी-छोटी कन्याओं को मां दुर्गा का रूप मानकर उनकी पूजा की जाती है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि कन्या पूजन के दौरान एक छोटे बालक की पूजा भी की जाती है, जिसे बटुक भैरव का स्वरूप माना जाता है.

Written By: Shivashakti narayan singh
Last Updated: 2026-03-22 14:45:19

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Navratri 2026: नवरात्रि का पर्व देवी मां की भक्ति और साधना के लिए बेहद खास माना जाता है. पूरे नौ दिनों तक भक्त पूरी श्रद्धा के साथ मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा करते हैं. इन नौ दिनों में अष्टमी और नवमी का दिन सबसे महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इसी दिन कन्या पूजन किया जाता है.

धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां दुर्गा की पूजा तब तक पूरी नहीं मानी जाती जब तक भैरव जी का स्मरण या पूजन न किया जाए. बटुक भैरव, भगवान भैरव का ही एक सौम्य और बाल रूप माने जाते हैं.कहा जाता है कि जहां-जहां देवी मां के मंदिर या शक्तिपीठ हैं, वहां भैरव जी का स्थान भी अवश्य होता है. वे इन स्थानों के रक्षक माने जाते हैं. इसी कारण देवी के दर्शन से पहले या उनके साथ भैरव जी की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है.

 कन्या पूजन में बालक की पूजा क्यों?

कन्या पूजन के दौरान नौ कन्याओं के साथ एक बालक को भी बैठाकर भोजन कराया जाता है और उसका सम्मान किया जाता है. इस बालक को बटुक भैरव का रूप मानकर पूजा जाता है.मान्यता है कि ऐसा करने से पूजा पूर्ण होती है और भक्त को मां दुर्गा के साथ-साथ भैरव जी का भी आशीर्वाद मिलता है. इससे जीवन में सुख-समृद्धि और सुरक्षा बनी रहती है.

 कन्या पूजन का क्या है नियम?

कन्या पूजन में आमतौर पर 2 से 10 साल तक की कन्याओं को पूजा जाता है. इन्हें मां दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक माना जाता है.पूजा के दौरान इन कन्याओं को आदरपूर्वक बैठाकर भोजन कराया जाता है, उनके पैर धोए जाते हैं और उन्हें उपहार या दक्षिणा दी जाती है. यह देवी को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का एक खास तरीका माना जाता है.

बटुक भैरव की पूजा

नवरात्रि में कन्या पूजन सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि आस्था और श्रद्धा का प्रतीक है. इसमें कन्याओं के साथ बटुक भैरव के रूप में बालक की पूजा करना यह दर्शाता है कि देवी और उनके रक्षक दोनों का सम्मान जरूरी है.इसी वजह से कहा जाता है कि कन्या पूजन के साथ बटुक भैरव की पूजा करने से ही यह अनुष्ठान पूर्ण माना जाता है और भक्तों को पूर्ण फल की प्राप्ति होती है.

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है. पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. India News इसकी सत्यता का दावा नहीं करता है.

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Written By: Shivashakti narayan singh
Last Updated: 2026-03-22 14:45:19

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Navratri 2026: नवरात्रि का पर्व देवी मां की भक्ति और साधना के लिए बेहद खास माना जाता है. पूरे नौ दिनों तक भक्त पूरी श्रद्धा के साथ मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा करते हैं. इन नौ दिनों में अष्टमी और नवमी का दिन सबसे महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इसी दिन कन्या पूजन किया जाता है.

धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां दुर्गा की पूजा तब तक पूरी नहीं मानी जाती जब तक भैरव जी का स्मरण या पूजन न किया जाए. बटुक भैरव, भगवान भैरव का ही एक सौम्य और बाल रूप माने जाते हैं.कहा जाता है कि जहां-जहां देवी मां के मंदिर या शक्तिपीठ हैं, वहां भैरव जी का स्थान भी अवश्य होता है. वे इन स्थानों के रक्षक माने जाते हैं. इसी कारण देवी के दर्शन से पहले या उनके साथ भैरव जी की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है.

 कन्या पूजन में बालक की पूजा क्यों?

कन्या पूजन के दौरान नौ कन्याओं के साथ एक बालक को भी बैठाकर भोजन कराया जाता है और उसका सम्मान किया जाता है. इस बालक को बटुक भैरव का रूप मानकर पूजा जाता है.मान्यता है कि ऐसा करने से पूजा पूर्ण होती है और भक्त को मां दुर्गा के साथ-साथ भैरव जी का भी आशीर्वाद मिलता है. इससे जीवन में सुख-समृद्धि और सुरक्षा बनी रहती है.

 कन्या पूजन का क्या है नियम?

कन्या पूजन में आमतौर पर 2 से 10 साल तक की कन्याओं को पूजा जाता है. इन्हें मां दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक माना जाता है.पूजा के दौरान इन कन्याओं को आदरपूर्वक बैठाकर भोजन कराया जाता है, उनके पैर धोए जाते हैं और उन्हें उपहार या दक्षिणा दी जाती है. यह देवी को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का एक खास तरीका माना जाता है.

बटुक भैरव की पूजा

नवरात्रि में कन्या पूजन सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि आस्था और श्रद्धा का प्रतीक है. इसमें कन्याओं के साथ बटुक भैरव के रूप में बालक की पूजा करना यह दर्शाता है कि देवी और उनके रक्षक दोनों का सम्मान जरूरी है.इसी वजह से कहा जाता है कि कन्या पूजन के साथ बटुक भैरव की पूजा करने से ही यह अनुष्ठान पूर्ण माना जाता है और भक्तों को पूर्ण फल की प्राप्ति होती है.

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है. पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. India News इसकी सत्यता का दावा नहीं करता है.

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