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Sakat Chauth Vrat Katha In Hindi: सकट चौथ पर पढ़ें बुढ़िया और गणेश जी जुड़ी यह संकष्टी चतुर्थी व्रत की कहानी…. इसके बिना अधूरा है उपवास

Sakat Chauth Vrat Kahani In Hindi: संकष्टी चतुर्थी व्रत पर कहानी जरूर पढ़नी चाहिए, क्योकि इसके बिना व्रत अधूरा माना जाता है और उपवास का पूरा फल भी नहीं मिलता हैं. आइये पढ़ते हैं यहां संकष्टी चतुर्थी व्रत से जुड़ी बुढ़िया और गणेश जी की कहानी

Written By: Chhaya Sharma
Last Updated: January 5, 2026 22:37:26 IST

Sakat Chauth Vrat Ki Kahani: संकष्टी चतुर्थी को सकट चौथ और तिलकुट चौथ के नाम से भी जाना जाता हैं, इस दिन मताएं अपने बच्चों के खुशहाल जीवन की कामना के लिए व्रत करती है और कुछ महिलाएं संतान सुख की प्राप्ति की कामना से यह व्रत रखती हैं. सकट चौथ के दिन भगवान गणेश जी की पूजा की जाती है और रात में चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है. इसके अलावा आज के दिन गणेश की पूजा के साथ-साथ संकष्टी चतुर्थी व्रत की कहानी जरूर पढ़नी चाहिए क्योकि इसके बिना व्रत अधूरा माना जाता है और उपवास का पूरा फल भी नहीं मिलता हैं. आइये पढ़ते हैं यहां सकट चौथ से जुड़ी बुढ़िया और गणेश जी की व्रत कथा

सकट चौथ व्रत की कहानी (Sakat Chauth Vrat Ki Katha)

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार बाल रूप के दौरान भगवान गणेश हाथ में चुटकी भर चावल और चम्मच में दूध लेकर पृथ्वी लोक की तरफ निकले. वह सबको अपने लिए खीर बनाने के लिए कहते जा रहे थे, लेकिन किसी ने भी उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया. लेकिन एक गरीब बुढ़िया उनकी खीर बनाने के लिए मान गई. बुढ़िया ने चूल्हे पर एक भिगोना रख लिया, लेकिन गणेश जी ने  बुढ़िया से घर का सबसे बड़ा बर्तन चूल्हे पर चढ़ाने को कहा. बुढ़िया ने गणेश जी की बाल लीला समझते हुए घर का सबसे बड़ा भगोना चूल्हे पर चढ़ा दिया. गणेश जी के दिए हुए चावल और दूध बढ़ गए और पूरा भगोना खीर से भर गया, लेकिन इसी दौरान गणेश जी वहां से चले गए और बुढ़िया से बोले कि जब खीर बन जाए तो बुला लेना. वहीं गणेश जी के जाने के बाद बुढ़िया के बेटे की बहू ने एक कटोरा खीर खा ली और एक कटोरा खीर छिपा दी. वहींं जब खीर बनकर तैयार हो गई तो बुढिया गणेश जी को आवाज लगाई-आजा रे गणेशा खीर खा ले और फिर बोली, आजा रे गणेस्या खीर खा ले. तभी गणेश जी वहां पहुंच गए और कहा की मैंने तो खीर पहले ही खा ली है. तब बुढ़िया ने पूछा कि कब खाई तो गणेश जी बोले कि जब तेरी बहू ने खाई, तभी मेरा पेट भी भर गया. बुढ़िया ने अपने बहू की हरकत के लिए भगवान गणेश से माफी मांगी. वहीं जब बुढ़िया ने बाकी बची खीर के इस्तेमाल के बारे में पूछा तो गणेश जी कहा कि बाकी खीर को बुढ़िया तू नगर में बांट दो और जो बचें उसे अपने घर की जमीन के नीचे दबा दें. अगले दिन जब बुढ़िया उठी तो उसकी झोपड़ी महल में बदली हुई और खीर का बर्तन भी सोने- जवाहरातों से भरा मिले. गणेश जी की कृपा देखकर बुढ़िया बेहद खुश हुई. हे गणेश जी महाराज ! आपने जैसा फल बुढ़िया को दिया, वैसा सबको देना.

सकट चौथ की कथा (Sakat Chauth katha)

पौराणिक कथा के अनुसार, एक शहर में देवरानी-जेठानी रहती थी. देवरानी गरीब थी लेकिन जेठानी अमीर थी. देवरानी हमेशा गणेश जी का पूजन और व्रत करती थी और जेठानी के घर पर काम भी करती थी और वहा से जो कुछ खाने के लिए बचता था, वो घर लेकर जाती थी. देवरानी का पति जंगल से लकड़ी काट कर बेचता था. वही माघ महीने में सकट चौथ गणेश जी का व्रत आया, जिसे देवरानी ने विधि विधान के साख रखा, उसके पास धन नहीं था. इसलिए उसने तिल और गुड़ को तिलकुट्टा बनाया. पूजा करके सकट चौथ की कथा भी सुनी और फिर जेठानी के यहां काम करने चली गई, वहा जाकर सोचे लगी की रात में को चंद्र को अर्घ्य देकर जेठानी के घर से बचा हुआ खाना लाखर और तिलकुट्टा खाएगी. शाम को जब जेठानी के घर वो खाना बनाने लगी तो, उसके व्रत होने के कारण सभी ने खाना खाने से मना कर दिया. देवरानी ने जेठानी से कहा, आप मुझे थोड़ा सा खाना दे दो, जिससे मैं घर ले जाऊं. इस पर जेठानी ने मना करते हुए कहा कि किसी ने भी अभी तक खाना नहीं खाया तुम्हें कैसे दे दूं ? तुम सवेरे ही बचा हुआ ले जाना. देवरानी उदास हुई और  घर चली आई. वहा पर उसके पर पति, बच्चे सब खाने का इंतजार कर रहे थे, आस में बैठे थे की आज कुछ पकवान खाने को मिलेगा, लेकिन जब बच्चो को पता चला कि आज तो रोटी भी नहीं मिलेगी तो उसके बच्चे रोने लगे. पति भी बहुत क्रोधित हो गया और कहने लगा कि दिन भर काम करने के बाद भी वह दो रोटियां नहीं ला सकी. देवरानी रोने लगी और गणेश जी को याद करते हुए रोते रोते पानी पीकर सो गई. उस दिन सकट माता बुढ़िया माता का रुप धरकर देवरानी के सपने में आई और कहने लगीं कि जाग रही हैं क्या? इस पर देवरानी ने कहा कुछ सो रहे हैं, कुछ जाग रहे हैं. बुढ़िया बोली भूख लग रही हैं, कुछ खाने में है तो दें दें देवरानी बोली कि क्या दूं, मेरे घर में अन्न नहीं हैं,  आज जेठानी के यहां से बचा हुआ कुछ भी नहीं मिला. पूजा में बचा हुआ तिलकुटा रखा हैं, वही खा लो. सकट माता ने तिलकुट खाया और उसके बाद कहने लगी की शौच लगी है! कहां निमटे. देवरानी ने कहा कि यह मेरी खाली झोंपड़ी है आप कहीं भी जा सकती हो, जहां इच्छा हो वहां निमट लो. शौच करने के बाद सकट माता बोलीं कहां पोंछू अब देवरानी बोली कि मेरी साड़ी से पोछ लो. देवरानी जब सुबह उठी तो हैरान रह गई कि पूरा घर हीरों और मोतियों से जगमगा रहा. उस दिन वो देवरानी अपनी जेठानी के काम करने नहीं गई. जेठानी ने कुछ देर इंतजार किया और फिर बच्चो को देवरानी को बुलाने के लिए भेज दिया. जेठानी ने सोचा की कल खाना नहीं दिया था, इसीलिए देवरानी बुरा मान गई होगी. बच्चे बुलाने गए, तो देवरानी ने बोला कि बेटा बहुत दिन तेरी मां के यहां काम कर लिया. बच्चो ने घर जाकर मां से कहा कि चाची का पूरा घर हीरों और मोतियों से जगमगा रहा है. जेठानी दौड़कर देवरानी के पास आई और पूछा कि यह सब कैसे हुआ? देवरानी ने उसके साथ जो हुआ वो सब कह डाला. जेठानी ने भी वैसा ही करने की सोची. उसने भी सकट चौथ के दिन तिलकुटा बनाया. रात को सकट माता उसके भी सपने में आईं और बोली भूख लगी है कि मैं क्या खाऊं. जेठानी ने कहा कि आपके लिए छींके में रखा हैं, फल और मेवे भी रखे है जो चाहें खा लो, सकट माता बोली कि अब निपटे कहां? जेठानी बोली मेरे इस महल में आप कहीं भी निपट लें, फिर उन्होंने बोला कि अब पोंछू कहां, जेठानी बोली कि कहीं भी पोछ लो. सुबह जब जेठानी उठी, तो घर में बदबू, गंदगी के अलावा कुछ नहीं थी. हे सकट माता जैसे आपने देवरानी पर कृपा की वैसी सब पर करना.

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है. पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. India News इसकी सत्यता का दावा नहीं करता है.

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Sakat Chauth Vrat Kahani In Hindi: संकष्टी चतुर्थी व्रत पर कहानी जरूर पढ़नी चाहिए, क्योकि इसके बिना व्रत अधूरा माना जाता है और उपवास का पूरा फल भी नहीं मिलता हैं. आइये पढ़ते हैं यहां संकष्टी चतुर्थी व्रत से जुड़ी बुढ़िया और गणेश जी की कहानी

Written By: Chhaya Sharma
Last Updated: January 5, 2026 22:37:26 IST

Sakat Chauth Vrat Ki Kahani: संकष्टी चतुर्थी को सकट चौथ और तिलकुट चौथ के नाम से भी जाना जाता हैं, इस दिन मताएं अपने बच्चों के खुशहाल जीवन की कामना के लिए व्रत करती है और कुछ महिलाएं संतान सुख की प्राप्ति की कामना से यह व्रत रखती हैं. सकट चौथ के दिन भगवान गणेश जी की पूजा की जाती है और रात में चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है. इसके अलावा आज के दिन गणेश की पूजा के साथ-साथ संकष्टी चतुर्थी व्रत की कहानी जरूर पढ़नी चाहिए क्योकि इसके बिना व्रत अधूरा माना जाता है और उपवास का पूरा फल भी नहीं मिलता हैं. आइये पढ़ते हैं यहां सकट चौथ से जुड़ी बुढ़िया और गणेश जी की व्रत कथा

सकट चौथ व्रत की कहानी (Sakat Chauth Vrat Ki Katha)

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार बाल रूप के दौरान भगवान गणेश हाथ में चुटकी भर चावल और चम्मच में दूध लेकर पृथ्वी लोक की तरफ निकले. वह सबको अपने लिए खीर बनाने के लिए कहते जा रहे थे, लेकिन किसी ने भी उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया. लेकिन एक गरीब बुढ़िया उनकी खीर बनाने के लिए मान गई. बुढ़िया ने चूल्हे पर एक भिगोना रख लिया, लेकिन गणेश जी ने  बुढ़िया से घर का सबसे बड़ा बर्तन चूल्हे पर चढ़ाने को कहा. बुढ़िया ने गणेश जी की बाल लीला समझते हुए घर का सबसे बड़ा भगोना चूल्हे पर चढ़ा दिया. गणेश जी के दिए हुए चावल और दूध बढ़ गए और पूरा भगोना खीर से भर गया, लेकिन इसी दौरान गणेश जी वहां से चले गए और बुढ़िया से बोले कि जब खीर बन जाए तो बुला लेना. वहीं गणेश जी के जाने के बाद बुढ़िया के बेटे की बहू ने एक कटोरा खीर खा ली और एक कटोरा खीर छिपा दी. वहींं जब खीर बनकर तैयार हो गई तो बुढिया गणेश जी को आवाज लगाई-आजा रे गणेशा खीर खा ले और फिर बोली, आजा रे गणेस्या खीर खा ले. तभी गणेश जी वहां पहुंच गए और कहा की मैंने तो खीर पहले ही खा ली है. तब बुढ़िया ने पूछा कि कब खाई तो गणेश जी बोले कि जब तेरी बहू ने खाई, तभी मेरा पेट भी भर गया. बुढ़िया ने अपने बहू की हरकत के लिए भगवान गणेश से माफी मांगी. वहीं जब बुढ़िया ने बाकी बची खीर के इस्तेमाल के बारे में पूछा तो गणेश जी कहा कि बाकी खीर को बुढ़िया तू नगर में बांट दो और जो बचें उसे अपने घर की जमीन के नीचे दबा दें. अगले दिन जब बुढ़िया उठी तो उसकी झोपड़ी महल में बदली हुई और खीर का बर्तन भी सोने- जवाहरातों से भरा मिले. गणेश जी की कृपा देखकर बुढ़िया बेहद खुश हुई. हे गणेश जी महाराज ! आपने जैसा फल बुढ़िया को दिया, वैसा सबको देना.

सकट चौथ की कथा (Sakat Chauth katha)

पौराणिक कथा के अनुसार, एक शहर में देवरानी-जेठानी रहती थी. देवरानी गरीब थी लेकिन जेठानी अमीर थी. देवरानी हमेशा गणेश जी का पूजन और व्रत करती थी और जेठानी के घर पर काम भी करती थी और वहा से जो कुछ खाने के लिए बचता था, वो घर लेकर जाती थी. देवरानी का पति जंगल से लकड़ी काट कर बेचता था. वही माघ महीने में सकट चौथ गणेश जी का व्रत आया, जिसे देवरानी ने विधि विधान के साख रखा, उसके पास धन नहीं था. इसलिए उसने तिल और गुड़ को तिलकुट्टा बनाया. पूजा करके सकट चौथ की कथा भी सुनी और फिर जेठानी के यहां काम करने चली गई, वहा जाकर सोचे लगी की रात में को चंद्र को अर्घ्य देकर जेठानी के घर से बचा हुआ खाना लाखर और तिलकुट्टा खाएगी. शाम को जब जेठानी के घर वो खाना बनाने लगी तो, उसके व्रत होने के कारण सभी ने खाना खाने से मना कर दिया. देवरानी ने जेठानी से कहा, आप मुझे थोड़ा सा खाना दे दो, जिससे मैं घर ले जाऊं. इस पर जेठानी ने मना करते हुए कहा कि किसी ने भी अभी तक खाना नहीं खाया तुम्हें कैसे दे दूं ? तुम सवेरे ही बचा हुआ ले जाना. देवरानी उदास हुई और  घर चली आई. वहा पर उसके पर पति, बच्चे सब खाने का इंतजार कर रहे थे, आस में बैठे थे की आज कुछ पकवान खाने को मिलेगा, लेकिन जब बच्चो को पता चला कि आज तो रोटी भी नहीं मिलेगी तो उसके बच्चे रोने लगे. पति भी बहुत क्रोधित हो गया और कहने लगा कि दिन भर काम करने के बाद भी वह दो रोटियां नहीं ला सकी. देवरानी रोने लगी और गणेश जी को याद करते हुए रोते रोते पानी पीकर सो गई. उस दिन सकट माता बुढ़िया माता का रुप धरकर देवरानी के सपने में आई और कहने लगीं कि जाग रही हैं क्या? इस पर देवरानी ने कहा कुछ सो रहे हैं, कुछ जाग रहे हैं. बुढ़िया बोली भूख लग रही हैं, कुछ खाने में है तो दें दें देवरानी बोली कि क्या दूं, मेरे घर में अन्न नहीं हैं,  आज जेठानी के यहां से बचा हुआ कुछ भी नहीं मिला. पूजा में बचा हुआ तिलकुटा रखा हैं, वही खा लो. सकट माता ने तिलकुट खाया और उसके बाद कहने लगी की शौच लगी है! कहां निमटे. देवरानी ने कहा कि यह मेरी खाली झोंपड़ी है आप कहीं भी जा सकती हो, जहां इच्छा हो वहां निमट लो. शौच करने के बाद सकट माता बोलीं कहां पोंछू अब देवरानी बोली कि मेरी साड़ी से पोछ लो. देवरानी जब सुबह उठी तो हैरान रह गई कि पूरा घर हीरों और मोतियों से जगमगा रहा. उस दिन वो देवरानी अपनी जेठानी के काम करने नहीं गई. जेठानी ने कुछ देर इंतजार किया और फिर बच्चो को देवरानी को बुलाने के लिए भेज दिया. जेठानी ने सोचा की कल खाना नहीं दिया था, इसीलिए देवरानी बुरा मान गई होगी. बच्चे बुलाने गए, तो देवरानी ने बोला कि बेटा बहुत दिन तेरी मां के यहां काम कर लिया. बच्चो ने घर जाकर मां से कहा कि चाची का पूरा घर हीरों और मोतियों से जगमगा रहा है. जेठानी दौड़कर देवरानी के पास आई और पूछा कि यह सब कैसे हुआ? देवरानी ने उसके साथ जो हुआ वो सब कह डाला. जेठानी ने भी वैसा ही करने की सोची. उसने भी सकट चौथ के दिन तिलकुटा बनाया. रात को सकट माता उसके भी सपने में आईं और बोली भूख लगी है कि मैं क्या खाऊं. जेठानी ने कहा कि आपके लिए छींके में रखा हैं, फल और मेवे भी रखे है जो चाहें खा लो, सकट माता बोली कि अब निपटे कहां? जेठानी बोली मेरे इस महल में आप कहीं भी निपट लें, फिर उन्होंने बोला कि अब पोंछू कहां, जेठानी बोली कि कहीं भी पोछ लो. सुबह जब जेठानी उठी, तो घर में बदबू, गंदगी के अलावा कुछ नहीं थी. हे सकट माता जैसे आपने देवरानी पर कृपा की वैसी सब पर करना.

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है. पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. India News इसकी सत्यता का दावा नहीं करता है.

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