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Home > अजब गजब न्यूज > द्रौपदी की अग्नि परीक्षा! क्यों तेज आग पर नंगे पांव चलते हैं लोग, क्यों बनाई गई ये अनोखी परंपरा?

द्रौपदी की अग्नि परीक्षा! क्यों तेज आग पर नंगे पांव चलते हैं लोग, क्यों बनाई गई ये अनोखी परंपरा?

महाभारत काल में द्रौपदी को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी थी. इसके कारण दक्षिण भारत में एक अनोखी परंपरा शुरू हुई, जो इसी अग्नि परीक्षा पर आधारित है. इसके तहत पुरुष नंगे पांव जलते कोयले पर चलते हैं.

Written By: Deepika Pandey
Last Updated: January 11, 2026 15:59:07 IST

Unique Tradition of India: महाभारत काल में पांडवों की पत्नी द्रौपदी को लेकर कहा जाता है कि उनका जन्म राजा द्रुपद के यज्ञ कुंड से हुआ था. इतना ही नहीं उनके जीवन में कई कठिनाइयां झेलनी पड़ीं. महाभारत युद्ध के बाद कुरुक्षेत्र में उन्हें अपनी पवित्रता साबित करने के लिए भी अग्नि में प्रवेश करना पड़ा, जैसे सतयुग में माता सीता को करना पड़ा था. कहा जाता है कि उनका जन्म ही एक यज्ञ की अग्नि से हुआ था और उन्हें जीवन में अनेक अपमान न चुनौतियों का सामना करना पड़ा. इसमें पांडवों के साथ विवाह और चीरहरण जैसी परिस्थितियां शामिल थीं. हालांकि उन्होंने धर्म और साहस के साथ हर अग्नि परीक्षा को पार किया. इसके कारण उन्हें यज्ञसेनी और अग्निजा भी कहा जाता है.

द्रौपदी की अग्नि परीक्षा

द्रौपदी की अग्नि परीक्षा परीक्षा से प्रेरित होकर कई जगहों पर ये प्रथा शुरू हुई. ये अग्नि परीक्षा से प्रेरित एक अनोखी प्रथा है, जो अक्टूबर-नवंबर में दक्षिण भारत के कुछ गांवों में की जाती है. इस प्रथा के तहत भक्त नंगे पांव जलते कोयलों पर चलकर आस्था, पवित्रता और दिव्य न्याय का प्रदर्शन करते हैं. इस प्रथा को ‘द्रौपदी की अग्नि परीक्षा’ भी कहा जाता है. मान्यता है कि इच्छा-पूर्ति और आशीर्वाद से जुड़ी है और देश-विदेश में फैली है.

कहां होती है ये प्रथा?

कहा जाता है कि ये प्रथा उन जगहों पर फैली हुई है, जहां द्रौपदी को गांव की देवी या कुलदेवी माना जाता है. जिन जगहों पर द्रौपदी को कुलदेवी के रूप में माना जाता है, वहां पर ये प्रथा आज भी प्रचलित है. इस प्रथा के तहत भक्तगण एक जगह पर इकट्ठे होते हैं. वहां पर कोयले की आग जलती है. भक्त अपने सिर पर दूध या पानी से भरा एक बर्तन रखते हैं, ताकि माता द्रौपदी का आशीर्वाद मिल सके. 

दुनिया भर में हो रही प्रचलित

मान्यता है कि ये प्रथा अधिकतर दक्षिण में प्रचलित है लेकिन अपनी मान्यताओं के अनुसार ये प्रथा अब दक्षिण भारतीय समुदायों के साथ ही भारत से बाहर भी फैल चुकी है. मान्यता है कि जो लोग कोयले पर चलते हैं. उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. साथ ही ये प्रथा शुद्धता, आस्था व दिव्य न्याय का प्रतीक मानी जाती है. 

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द्रौपदी की अग्नि परीक्षा! क्यों तेज आग पर नंगे पांव चलते हैं लोग, क्यों बनाई गई ये अनोखी परंपरा?

महाभारत काल में द्रौपदी को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी थी. इसके कारण दक्षिण भारत में एक अनोखी परंपरा शुरू हुई, जो इसी अग्नि परीक्षा पर आधारित है. इसके तहत पुरुष नंगे पांव जलते कोयले पर चलते हैं.

Written By: Deepika Pandey
Last Updated: January 11, 2026 15:59:07 IST

Unique Tradition of India: महाभारत काल में पांडवों की पत्नी द्रौपदी को लेकर कहा जाता है कि उनका जन्म राजा द्रुपद के यज्ञ कुंड से हुआ था. इतना ही नहीं उनके जीवन में कई कठिनाइयां झेलनी पड़ीं. महाभारत युद्ध के बाद कुरुक्षेत्र में उन्हें अपनी पवित्रता साबित करने के लिए भी अग्नि में प्रवेश करना पड़ा, जैसे सतयुग में माता सीता को करना पड़ा था. कहा जाता है कि उनका जन्म ही एक यज्ञ की अग्नि से हुआ था और उन्हें जीवन में अनेक अपमान न चुनौतियों का सामना करना पड़ा. इसमें पांडवों के साथ विवाह और चीरहरण जैसी परिस्थितियां शामिल थीं. हालांकि उन्होंने धर्म और साहस के साथ हर अग्नि परीक्षा को पार किया. इसके कारण उन्हें यज्ञसेनी और अग्निजा भी कहा जाता है.

द्रौपदी की अग्नि परीक्षा

द्रौपदी की अग्नि परीक्षा परीक्षा से प्रेरित होकर कई जगहों पर ये प्रथा शुरू हुई. ये अग्नि परीक्षा से प्रेरित एक अनोखी प्रथा है, जो अक्टूबर-नवंबर में दक्षिण भारत के कुछ गांवों में की जाती है. इस प्रथा के तहत भक्त नंगे पांव जलते कोयलों पर चलकर आस्था, पवित्रता और दिव्य न्याय का प्रदर्शन करते हैं. इस प्रथा को ‘द्रौपदी की अग्नि परीक्षा’ भी कहा जाता है. मान्यता है कि इच्छा-पूर्ति और आशीर्वाद से जुड़ी है और देश-विदेश में फैली है.

कहां होती है ये प्रथा?

कहा जाता है कि ये प्रथा उन जगहों पर फैली हुई है, जहां द्रौपदी को गांव की देवी या कुलदेवी माना जाता है. जिन जगहों पर द्रौपदी को कुलदेवी के रूप में माना जाता है, वहां पर ये प्रथा आज भी प्रचलित है. इस प्रथा के तहत भक्तगण एक जगह पर इकट्ठे होते हैं. वहां पर कोयले की आग जलती है. भक्त अपने सिर पर दूध या पानी से भरा एक बर्तन रखते हैं, ताकि माता द्रौपदी का आशीर्वाद मिल सके. 

दुनिया भर में हो रही प्रचलित

मान्यता है कि ये प्रथा अधिकतर दक्षिण में प्रचलित है लेकिन अपनी मान्यताओं के अनुसार ये प्रथा अब दक्षिण भारतीय समुदायों के साथ ही भारत से बाहर भी फैल चुकी है. मान्यता है कि जो लोग कोयले पर चलते हैं. उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. साथ ही ये प्रथा शुद्धता, आस्था व दिव्य न्याय का प्रतीक मानी जाती है. 

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