96 year old grandmother: अगर मन में सीखने की लगन हो, तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती. उन्होंने यह साबित कर दिया कि शिक्षा सिर्फ युवाओं का अधिकार नहीं, बल्कि हर इंसान का अधिकार है, चाहे उम्र कोई भी हो. ऐसी ही कहानी केरल की 96 वर्षीय महिला कार्त्यायनी अम्मा (Karthyayani Amma) की है, जिनकी कहानी यह साबित करती है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती. यह सिर्फ एक परीक्षा पास करने की कहानी नहीं, बल्कि उस सपने की जीत है जिसे उन्होंने दशकों तक अपने भीतर संजोकर रखा.
वर्ष 1922 में केरल के अलाप्पुझा जिले के एक छोटे से गांव में जन्मीं कार्त्यायनी अम्मा का बचपन संघर्षों से भरा था. उस दौर में लड़कियों की शिक्षा को प्राथमिकता नहीं दी जाती थी. गरीबी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते उन्हें कभी स्कूल जाने का मौका ही नहीं मिला. छोटी उम्र से ही कामकाज में जुट गईं और आगे चलकर शादी, बच्चों की परवरिश और घर चलाने में ही उनकी पूरी जिंदगी बीत गई.
90 की उम्र में जागी सीखने की चाह
जहां अधिकांश लोग उम्र के इस पड़ाव पर आराम करते हैं, वहीं अम्मा के भीतर सीखने की नई इच्छा जागी. उनकी बेटी, जिन्होंने 60 साल की उम्र में साक्षरता हासिल की, उनकी प्रेरणा बनीं. यही वह पल था जिसने अम्मा को भी आगे बढ़ने का हौसला दिया. अम्मा ने केरल सरकार के साक्षरता अभियान में दाखिला लिया. परिवार ने उनका पूरा साथ दिया. पोते-पोतियों ने उन्हें अक्षर, शब्द और गिनती सिखाई. धीरे-धीरे उन्होंने पढ़ना-लिखना सीख लिया. यह सफर आसान नहीं था, लेकिन उनका धैर्य और समर्पण अटूट रहा.
96 साल की उम्र में शानदार परीक्षा परिणाम
वर्ष 2018 में अम्मा ने पहली बार परीक्षा दी. परिणाम आया तो हर कोई हैरान रह गया. उन्होंने 100 में से 98 अंक हासिल किए. पढ़ने और गणित में पूरे अंक और लेखन में भी लगभग बढ़िया परफॉर्म रहा. यह सिर्फ अंक नहीं थे, बल्कि उनकी मेहनत और इच्छाशक्ति का प्रमाण थे. उनकी इस उपलब्धि ने उन्हें राज्य ही नहीं, बल्कि देशभर में प्रसिद्ध बना दिया. उन्हें “पोस्टर दादी” के रूप में पहचाना जाने लगा. आगे चलकर उन्हें ‘नारी शक्ति पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली.