Birthday Anniversary : हिन्दी सिनेमा में जब भी ‘मां’ के किरदार की बात होता है, तो आंखों के सामने सफेद साड़ी में लिपटी एक ममतामयी और संघर्षशील छवि उभरती है वह छवि है निरूपा रॉय की 4 जनवरी को उनकी जयंती के अवसर पर, आइए जानते हैं उस अभिनेत्री की कहानी जिसे दुनिया ने ‘दुखियारी मां’ के रूप में देखा, लेकिन असल जिंदगी में उनका साहस और करियर का विस्तार किसी सुपरस्टार से कम नहीं था .
70 और 80 के दशक में अमिताभ बच्चन की मां बनने से पहले, निरूपा रॉय धार्मिक फिल्मों की निर्विवाद रानी थी 1950 में आई फिल्म ‘हर हर महादेव’ में उन्होंने माता पार्वती का किरदार निभाया था यह फिल्म इतनी सफल रही कि रातों-रात निरूपा रॉय की छवि एक पवित्र देवी की बन गई। आलम यह था कि लोग उन्हें सचमुच की देवी मानने लगे थे उनके घर के बाहर भक्तों की लंबी कतारें लगती थीं और लोग उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेना चाहते थे उन्होंने करीब 16 फिल्मों में अलग-अलग देवियों के किरदार निभाए .
बॉलीवुड की पहली फ्लाइंग सुपरहीरो
आज की पीढ़ी के लिए यह यकीन करना मुश्किल है, लेकिन निरूपा रॉय बॉलीवुड की पहली महिला सुपरहीरो थी 1960 में आई फिल्म ‘सुपरमैन’ में उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई थी जिस अभिनेत्री को हमने हमेशा पर्दे पर आंसू बहाते देखा, उन्होंने कभी केप पहनकर उड़ान भरी थी और अपराधियों से लोहा लिया था यह उस दौर के लिए बेहद साहसी और क्रांतिकारी कदम था .
14 साल की उम्र में शादी और कड़ा संघर्ष
निरूपा रॉय का असली नाम कोकिला किशोरचंद्र बुलसारा का निजी जीवन भी किसी फिल्म से कम नहीं था महज 14-15 साल की उम्र में उनकी शादी कमल रॉय से कर दी गई थी उनके पति को अभिनय का शौक था और वे ऑडिशन देने मुंबई आए थे एक विज्ञापन देखकर जब वे अपनी पत्नी को ऑडिशन दिलाने ले गए, तो पति रिजेक्ट हो गए लेकिन निरूपा को रोल मिल गया इस फैसले से उनके पिता इतने आहत हुए कि उन्होंने मरते दम तक अपनी बेटी का चेहरा नहीं देखा.
अमिताभ बच्चन की ‘परमानेंट’ मां
फिल्म ‘दीवार’ ने उन्हें हमेशा के लिए ‘अमिताभ की मां’ के रूप में स्थापित कर दिया अमिताभ बच्चन और निरूपा रॉय की केमिस्ट्री इतनी सजीव थी कि दर्शकों को लगता था कि वे असल जिंदगी में भी मां-बेटे हैं उन्होंने ‘अमर अकबर एंथनी’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’ और ‘मर्द’ जैसी कई ब्लॉकबस्टर फिल्मों में बिग बी की मां का रोल किया.
निरूपा रॉय ने अपने 50 साल के करियर में लगभग 450 फिल्मों में काम किया और 3 फिल्मफेयर पुरस्कार जीते भले ही वह आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन ‘मदर ऑफ ऑल हीरोज’ के रूप में उनकी विरासत हिन्दी सिनेमा के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है