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Home > जनरल नॉलेज > रेलवे ट्रैक के किनारे क्यों लगे होते हैं बॉक्स? यात्रियों की सुरक्षा का ‘गुप्त पहरेदार’ है ये एल्यूमिनियम का बक्सा

रेलवे ट्रैक के किनारे क्यों लगे होते हैं बॉक्स? यात्रियों की सुरक्षा का ‘गुप्त पहरेदार’ है ये एल्यूमिनियम का बक्सा

ट्रेन से सफर करते हुए आप लोगों ने रेल पटरियों के किनारे लगे छोटे‑छोटे एल्यूमिनियम के बॉक्स देखे होंगे, लेकिन शायद थोड़े ही यात्री जानते हों कि ये बॉक्स असल में क्या काम करते हैं. ये बॉक्स रेलवे यात्रा की सुरक्षा में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. आइये जानते हैं ये साधारण से दिखने वाले बॉक्स कितने काम के होते हैं.

Written By: Shivangi Shukla
Last Updated: April 8, 2026 10:32:49 IST

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ट्रेन से सफर करते हुए आप लोगों ने रेल पटरियों के किनारे लगे छोटे‑छोटे एल्यूमिनियम के बॉक्स देखे होंगे, लेकिन शायद थोड़े ही यात्री जानते हों कि ये बॉक्स असल में क्या काम करते हैं. 

रेलवे के इन बॉक्स को तकनीकी भाषा में “एक्सल काउंटर बॉक्स” कहा जाता है और ये रेलवे यात्रा की सुरक्षा में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इनमें एक स्टोरेज डिवाइस और सेंसर लगा होता है. आइये जानते हैं ये साधारण से दिखने वाले बॉक्स कितने काम के होते हैं.

एल्यूमिनियम बॉक्स का महत्त्व 

ये बॉक्स रेलवे ट्रैक के किनारे लगभग हर 3 से 5 किलोमीटर पर लगे होते हैं, चाहे वह स्टेशन पर हो या खुले मैदान में. इनमें एक स्टोरेज डिवाइस और सेंसर लगा होता है, जो सीधे ट्रैक से जुड़ा रहता है. जब भी ट्रेन इन बॉक्सों के पास से गुजरती है, तो इस सिस्टम के जरिए उसके पहियों को जोड़ने वाले एक्सल की गिनती की जाती है. बता दें कि ट्रेन की हर बोगी में पहियों के जोड़े को एक्सल कहते हैं, जो ट्रेन का पूरा भार संभालता है.

एक्सल काउंटर बॉक्स की सबसे बड़ी भूमिका ये है कि ये यह जांच लेता है कि ट्रेन की सारी बोगियां अभी भी पटरी पर जुड़ी हुई हैं या नहीं. अगर किसी बोगी का एक्सल ट्रैक से उतर जाता है या कोई हादसा होता है, तो यह सिस्टम तुरंत चेतावनी दे देता है कि कितने एक्सल और बोगियां बाकी रह गई हैं और दुर्घटना कहां घटी है. इससे रेलवे ऑपरेशन टीम को तुरंत पता लग जाता है कि किस जगह पर इमरजेंसी रूटीन शुरू करना है, जिससे बचाव और राहत कार्य तेज़ी से शुरू किया जा सकता है.

स्पीड और दिशा की भी जानकारी देते हैं ये एल्यूमिनियम बॉक्स

इन बॉक्सों का एक और फायदा यह है कि वे ट्रेन की स्पीड और दिशा की जानकारी भी दर्ज करते हैं. यह डेटा सिग्नल सिस्टम और इंटरलॉकिंग सिस्टम को भेजा जाता है, जिससे अगले स्टेशन या जंक्शन पर सही सिग्नल ऑटोमेटिक रूप से बदल जाते हैं. इससे दो ट्रेनों के आमने‑सामने आने जैसी गंभीर गलतियां कम होती हैं. इस तरह ये छोटे‑छोटे बॉक्स सिर्फ ट्रैक के किनारे सजावट नहीं होते, बल्कि ये रेलवे नेटवर्क की एक चुपचाप चलती हुई सुरक्षा प्रणाली हैं.

बहुत से यात्री इन्हें बस साधारण डिब्बे या बिजली‑केबल बॉक्स ही समझते रहते हैं, लेकिन असल में ये एक तरह से रेलवे की निगरानी निगाहें या यूं कहें कि CCTV हैं, जो ट्रेन की हर गति पर नजर रखती हैं. अगली बार जब आप ट्रेन में बैठकर खिड़की से बाहर देखेंं और ये छोटे‑छोटे बॉक्स दिखें, तो याद रखिए कि ये सिर्फ रेलवे के लिए नहीं, बल्कि आपकी सुरक्षा के लिए भी काम कर रहे हैं.

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Last Updated: April 8, 2026 10:32:49 IST

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ट्रेन से सफर करते हुए आप लोगों ने रेल पटरियों के किनारे लगे छोटे‑छोटे एल्यूमिनियम के बॉक्स देखे होंगे, लेकिन शायद थोड़े ही यात्री जानते हों कि ये बॉक्स असल में क्या काम करते हैं. 

रेलवे के इन बॉक्स को तकनीकी भाषा में “एक्सल काउंटर बॉक्स” कहा जाता है और ये रेलवे यात्रा की सुरक्षा में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इनमें एक स्टोरेज डिवाइस और सेंसर लगा होता है. आइये जानते हैं ये साधारण से दिखने वाले बॉक्स कितने काम के होते हैं.

एल्यूमिनियम बॉक्स का महत्त्व 

ये बॉक्स रेलवे ट्रैक के किनारे लगभग हर 3 से 5 किलोमीटर पर लगे होते हैं, चाहे वह स्टेशन पर हो या खुले मैदान में. इनमें एक स्टोरेज डिवाइस और सेंसर लगा होता है, जो सीधे ट्रैक से जुड़ा रहता है. जब भी ट्रेन इन बॉक्सों के पास से गुजरती है, तो इस सिस्टम के जरिए उसके पहियों को जोड़ने वाले एक्सल की गिनती की जाती है. बता दें कि ट्रेन की हर बोगी में पहियों के जोड़े को एक्सल कहते हैं, जो ट्रेन का पूरा भार संभालता है.

एक्सल काउंटर बॉक्स की सबसे बड़ी भूमिका ये है कि ये यह जांच लेता है कि ट्रेन की सारी बोगियां अभी भी पटरी पर जुड़ी हुई हैं या नहीं. अगर किसी बोगी का एक्सल ट्रैक से उतर जाता है या कोई हादसा होता है, तो यह सिस्टम तुरंत चेतावनी दे देता है कि कितने एक्सल और बोगियां बाकी रह गई हैं और दुर्घटना कहां घटी है. इससे रेलवे ऑपरेशन टीम को तुरंत पता लग जाता है कि किस जगह पर इमरजेंसी रूटीन शुरू करना है, जिससे बचाव और राहत कार्य तेज़ी से शुरू किया जा सकता है.

स्पीड और दिशा की भी जानकारी देते हैं ये एल्यूमिनियम बॉक्स

इन बॉक्सों का एक और फायदा यह है कि वे ट्रेन की स्पीड और दिशा की जानकारी भी दर्ज करते हैं. यह डेटा सिग्नल सिस्टम और इंटरलॉकिंग सिस्टम को भेजा जाता है, जिससे अगले स्टेशन या जंक्शन पर सही सिग्नल ऑटोमेटिक रूप से बदल जाते हैं. इससे दो ट्रेनों के आमने‑सामने आने जैसी गंभीर गलतियां कम होती हैं. इस तरह ये छोटे‑छोटे बॉक्स सिर्फ ट्रैक के किनारे सजावट नहीं होते, बल्कि ये रेलवे नेटवर्क की एक चुपचाप चलती हुई सुरक्षा प्रणाली हैं.

बहुत से यात्री इन्हें बस साधारण डिब्बे या बिजली‑केबल बॉक्स ही समझते रहते हैं, लेकिन असल में ये एक तरह से रेलवे की निगरानी निगाहें या यूं कहें कि CCTV हैं, जो ट्रेन की हर गति पर नजर रखती हैं. अगली बार जब आप ट्रेन में बैठकर खिड़की से बाहर देखेंं और ये छोटे‑छोटे बॉक्स दिखें, तो याद रखिए कि ये सिर्फ रेलवे के लिए नहीं, बल्कि आपकी सुरक्षा के लिए भी काम कर रहे हैं.

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