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छोटी-सी मछली का कठिन जीवन-चक्र, सैकड़ों मीटर ऊंचे झरनों और चट्टानों को करना होता है पार, अद्भुत शारीरिक संरचना करती है मदद

हवाई की नदियों में पाई जाने वाली गॉबी मछली सैकड़ों मीटर ऊंचे झरनों और चट्टानों पर ऐसे चढ़ जाती है, मानो किसी नदी में तैर रही हो. इनका शरीर आमतौर पर 20 सेंटीमीटर से भी छोटा होता है, जिससे इनकी ये अनोखी क्षमता किसी चमत्कार से कम नहीं लगती.

Written By: Shivangi Shukla
Last Updated: March 7, 2026 11:45:23 IST

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हवाई की नदियों में पाई जाने वाली एक छोटी-सी मछली सैकड़ों मीटर ऊंचे झरनों और चट्टानों पर ऐसे चढ़ जाती है, मानो किसी नदी में तैर रही हो. इन छोटी गॉबी मछलियों का ये अद्भुत कारनामा लोगों को अचंभित कर रहा है. 

इनका शरीर आमतौर पर 20 सेंटीमीटर से भी छोटा होता है, जिससे इनकी ये अनोखी क्षमता किसी चमत्कार से कम नहीं लगती. इस तरह की चढ़ाई के लिए इनकी शारीरिक बनावट भी विशिष्ट होती है. 

गॉबी मछलियों का जीवन‑चक्र  

हवाई की ये गॉबी प्रजाति अम्फिड्रोमस जीवन‑चक्र रखती हैं, यानी इनके अंडे मीठे पानी में फूटते हैं, लेकिन लार्वा समुद्र की ओर बहकर वहीं बढ़ते हैं. कुछ समय बाद परिपक्व मछलियां फिर से ऊपर की ओर, नदियों व झरनों के रास्ते, पहाड़ी क्षेत्रों में लौटती हैं जहां वे वयस्क जीवन बिताती और प्रजनन करती हैं. चूंकि ऊपर के हिस्सों में शिकारियों की संख्या कम और भोजन (खासकर शैवाल) अधिक होता है, इसलिए वहां पहुंचना उनके जीवित रहने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. 

झरने की चट्टानों पर चढ़ने की अनोखी क्षमता  

अपने जीवन-चक्र को पूरा करने के लिए इन मछलियों को झरने के रास्ते नदियों पर लौटना जरूरी होता है, इस वजह से इनके शरीर में भी कुछ खास तरीके के अनुकूलन हुए हैं. सभी गॉबी मछलियों के पेट की ओर जुड़े हुए पेल्विक पंखों से बना एक चूषक (पेल्विक सकर) होता है, जो उन्हें तेज धारा और फिसलन भरी चट्टानों पर चिपके रहने में मदद करता है. कुछ प्रजातियों, जैसे Sicyopterus stimpsoni (नोपिली रॉक‑क्लाइम्बिंग गॉबी), के मुंह भी धीरे‑धीरे नीचे की ओर खिसक कर दूसरा सकर बन जाता है. 

यह मछली अपने मुंह और पेट के सकर को बारी‑बारी से चट्टान पर चिपकाती है और फिर शरीर को थोड़ा‑थोड़ा खींचकर ऊपर बढ़ती है, जैसे कोई इंसान चारों अंगों से रेंगते हुए चढ़ाई करे. इसी तरह इस मछली की दूसरी प्रजातियाँ, जैसे लेंटीपस कंकॉलर (Lentipes concolor) और अवॉयस गुआमेंसिस (Awaous guamensis), तेज पूंछ‑झटकों और पेक्टोरल पंखों की मदद से झटकेदार, उछलती हुई चाल से ऊपर बढ़ती हैं.

भोजन और चढ़ाई एक ही काम 

वैज्ञानिकों ने अध्ययन में पाया कि जो जबड़े की हरकतें ये गॉबी शैवाल खाने के लिए उपयोग करती हैं, लगभग वही हरकतें वे चढ़ाई के दौरान भी दोहराती हैं. इसे “एक्सैप्टेशन” कहा जाता है, जब किसी पुराने गुण या संरचना को विकास की प्रक्रिया में एक नए काम के लिए इस्तेमाल किया जाने लगे. शोधकर्ताओं ने इन मछलियों को खाते और चढ़ते दोनों समय फिल्माया और पाया कि जबड़े के कोण और उनकी गति लगभग समान हैं. यह दिखाता है कि कैसे विकास प्रक्रिया ने इस मछली के भोजन तंत्र को ही एक चढ़ाई उपकरण में बदल दिया.

इनकी यह यात्रा बेहद कठिन है और हर मछली इसमें सफल नहीं हो पाती. अनुमान है कि केवल लगभग 10 प्रतिशत या उससे भी कम juveniles ही पूरी चढ़ाई पार कर ऊपर तक पहुंच पाते हैं. जो मछलियां सफल हो जाती हैं, वे पहाड़ी झरनों‑नालों की आबादी को बनाए रखती हैं और ये क्षेत्र जैव‑विविधता के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं. इन गॉबी मछलियों की मौजूदगी अक्सर इस बात का संकेत मानी जाती है कि नदी‑प्रणाली अभी भी अपेक्षाकृत स्वस्थ और कम प्रदूषित हैं.

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Last Updated: March 7, 2026 11:45:23 IST

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हवाई की नदियों में पाई जाने वाली एक छोटी-सी मछली सैकड़ों मीटर ऊंचे झरनों और चट्टानों पर ऐसे चढ़ जाती है, मानो किसी नदी में तैर रही हो. इन छोटी गॉबी मछलियों का ये अद्भुत कारनामा लोगों को अचंभित कर रहा है. 

इनका शरीर आमतौर पर 20 सेंटीमीटर से भी छोटा होता है, जिससे इनकी ये अनोखी क्षमता किसी चमत्कार से कम नहीं लगती. इस तरह की चढ़ाई के लिए इनकी शारीरिक बनावट भी विशिष्ट होती है. 

गॉबी मछलियों का जीवन‑चक्र  

हवाई की ये गॉबी प्रजाति अम्फिड्रोमस जीवन‑चक्र रखती हैं, यानी इनके अंडे मीठे पानी में फूटते हैं, लेकिन लार्वा समुद्र की ओर बहकर वहीं बढ़ते हैं. कुछ समय बाद परिपक्व मछलियां फिर से ऊपर की ओर, नदियों व झरनों के रास्ते, पहाड़ी क्षेत्रों में लौटती हैं जहां वे वयस्क जीवन बिताती और प्रजनन करती हैं. चूंकि ऊपर के हिस्सों में शिकारियों की संख्या कम और भोजन (खासकर शैवाल) अधिक होता है, इसलिए वहां पहुंचना उनके जीवित रहने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. 

झरने की चट्टानों पर चढ़ने की अनोखी क्षमता  

अपने जीवन-चक्र को पूरा करने के लिए इन मछलियों को झरने के रास्ते नदियों पर लौटना जरूरी होता है, इस वजह से इनके शरीर में भी कुछ खास तरीके के अनुकूलन हुए हैं. सभी गॉबी मछलियों के पेट की ओर जुड़े हुए पेल्विक पंखों से बना एक चूषक (पेल्विक सकर) होता है, जो उन्हें तेज धारा और फिसलन भरी चट्टानों पर चिपके रहने में मदद करता है. कुछ प्रजातियों, जैसे Sicyopterus stimpsoni (नोपिली रॉक‑क्लाइम्बिंग गॉबी), के मुंह भी धीरे‑धीरे नीचे की ओर खिसक कर दूसरा सकर बन जाता है. 

यह मछली अपने मुंह और पेट के सकर को बारी‑बारी से चट्टान पर चिपकाती है और फिर शरीर को थोड़ा‑थोड़ा खींचकर ऊपर बढ़ती है, जैसे कोई इंसान चारों अंगों से रेंगते हुए चढ़ाई करे. इसी तरह इस मछली की दूसरी प्रजातियाँ, जैसे लेंटीपस कंकॉलर (Lentipes concolor) और अवॉयस गुआमेंसिस (Awaous guamensis), तेज पूंछ‑झटकों और पेक्टोरल पंखों की मदद से झटकेदार, उछलती हुई चाल से ऊपर बढ़ती हैं.

भोजन और चढ़ाई एक ही काम 

वैज्ञानिकों ने अध्ययन में पाया कि जो जबड़े की हरकतें ये गॉबी शैवाल खाने के लिए उपयोग करती हैं, लगभग वही हरकतें वे चढ़ाई के दौरान भी दोहराती हैं. इसे “एक्सैप्टेशन” कहा जाता है, जब किसी पुराने गुण या संरचना को विकास की प्रक्रिया में एक नए काम के लिए इस्तेमाल किया जाने लगे. शोधकर्ताओं ने इन मछलियों को खाते और चढ़ते दोनों समय फिल्माया और पाया कि जबड़े के कोण और उनकी गति लगभग समान हैं. यह दिखाता है कि कैसे विकास प्रक्रिया ने इस मछली के भोजन तंत्र को ही एक चढ़ाई उपकरण में बदल दिया.

इनकी यह यात्रा बेहद कठिन है और हर मछली इसमें सफल नहीं हो पाती. अनुमान है कि केवल लगभग 10 प्रतिशत या उससे भी कम juveniles ही पूरी चढ़ाई पार कर ऊपर तक पहुंच पाते हैं. जो मछलियां सफल हो जाती हैं, वे पहाड़ी झरनों‑नालों की आबादी को बनाए रखती हैं और ये क्षेत्र जैव‑विविधता के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं. इन गॉबी मछलियों की मौजूदगी अक्सर इस बात का संकेत मानी जाती है कि नदी‑प्रणाली अभी भी अपेक्षाकृत स्वस्थ और कम प्रदूषित हैं.

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