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Earth Life Forms: क्या कभी बैंगनी थी हमारी धरती? 2.4 अरब साल पुरानी खोज ने बदल दी पृथ्वी के इतिहास की पूरी कहानी

Earth Life Forms: वैज्ञानिकों के अनुसार, करीब 2.4 अरब साल पहले पृथ्वी का रंग हरा नहीं बल्कि बैंगनी हो सकता था. उस समय शुरुआती सूक्ष्म जीव क्लोरोफिल की जगह रेटिनल नामक पिगमेंट से सूरज की रोशनी से ऊर्जा लेते थे. आइए जानते हैं पुरी बात विस्तार से.

Earth Life Forms: वैज्ञानिक मानते हैं कि 2.4 अरब साल पहले पृथ्वी हरी नहीं बल्कि बैंगनी दिखती थी. उस समय शुरुआती जीव क्लोरोफिल की जगह रेटिनल पिगमेंट से सूर्य की रोशनी से ऊर्जा लेते थे. बाद में ऑक्सीजन बढ़ने के साथ क्लोरोफिल वाला जीवन हावी हुआ और धरती हरी नजर आने लगी. यह खोज पृथ्वी के पुराने जीवन और भविष्य में दूसरे ग्रहों पर जीवन की पहचान को समझने में मदद करती है. 

 बाद में Great Oxygenation Event के दौरान क्लोरोफिल-आधारित जीवन बढ़ा, ऑक्सीजन का स्तर बढ़ा और धरती का रंग हरा दिखाई देने लगा. यह खोज न सिर्फ पृथ्वी के प्राचीन इतिहास को समझने में मदद करती है, बल्कि दूसरे ग्रहों पर जीवन की पहचान के नए संकेत भी देती है.

क्या सच में कभी बैंगनी थी हमारी धरती? वैज्ञानिकों की चौंकाने वाली खोज

आज हम पृथ्वी को हरे-भरे जंगलों, नीले समंदर और साफ आसमान के रूप में देखते हैं, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि करीब 2.4 अरब साल पहले धरती का रंग हरा नहीं, बल्कि बैंगनी (Purple) हो सकता था. यह बात सुनने में भले अजीब लगे, लेकिन इसके पीछे मजबूत वैज्ञानिक कारण मौजूद हैं.
NASA Astrobiology और कई रिसर्च रिपोर्ट्स के मुताबिक, शुरुआती धरती का वातावरण आज जैसा बिल्कुल नहीं था. उस समय हवा में ऑक्सीजन बहुत कम थी, जबकि ‘कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन’ जैसी गैसें ज्यादा मात्रा में मौजूद थीं. ऐसे माहौल में जीवन ने सूरज की रोशनी से ऊर्जा लेने का एक बिल्कुल अलग तरीका अपनाया.

क्लोरोफिल नहीं, रेटिनल से मिलती थी ऊर्जा

आज के पौधे जिस ‘क्लोरोफिल’ से फोटोसिंथेसिस करते हैं, वह शुरुआती धरती पर शायद मौजूद ही नहीं था. वैज्ञानिकों का मानना है कि उस दौर के सूक्ष्म जीव एक खास पिगमेंट ‘रेटिनल (Retinal)’ का इस्तेमाल करते थे.रेटिनल हरे रंग की रोशनी को सोखता है, जबकि क्लोरोफिल लाल और नीली रोशनी को absorb करता है. यही वजह है कि अगर धरती पर रेटिनल वाले जीव ज्यादा थे, तो ग्रह की सतह ‘बैंगनी रंग की दिखाई देती होगी’.यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के प्रोफेसर शिलादित्य दाससरमा और कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के एस्ट्रोबायोलॉजिस्ट डॉ. एडवर्ड श्विटरमैन के अनुसार,रेटिनल-आधारित जीव आज भी समुद्रों में पाए जाते हैं और ये पृथ्वी के सबसे पुराने ऊर्जा सिस्टम्स में से एक माने जाते हैं. Dead Sea में मिलने वाले कुछ बैक्टीरिया आज भी बैंगनी रंग के दिखाई देते हैं, जो इस थ्योरी को और मजबूत करते हैं.

बैंगनी धरती से हरी धरती बनने की कहानी

करीब 2.4 अरब साल पहल, पृथ्वी पर एक बड़ा बदलाव आया जिसे Great Oxygenation Event कहा जाता है. इस दौरान सायनोबैक्टीरिया जैसे जीवों ने क्लोरोफिल के जरिए फोटोसिंथेसिस शुरू किया, जिससे वातावरण में धीरे-धीरे ऑक्सीजन बढ़ने लगी.क्लोरोफिल ज्यादा प्रभावी था, इसलिए समय के साथ वही जीवन का मुख्य आधार बन गया और धरती का रंग हरा दिखाई देने लगा.हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि रेटिनल वाले जीव खत्म हो गए. वे आज भी मौजूद हैं, लेकिन अब धरती की सतह के रंग को नियंत्रित नहीं करते.वैज्ञानिकों का मानना है कि इस खोज से हमें न सिर्फ पृथ्वी के अतीत को समझने में मदद मिलती है, बल्कि दूसरे ग्रहों पर जीवन की पहचान करने के नए संकेत भी मिल सकते हैं. अगर किसी ग्रह पर हरे की बजाय बैंगनी रंग ज्यादा दिखे, तो वहां जीवन होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.

Shivashakti narayan singh

मूल रूप से चन्दौली जनपद के निवासी शिवशक्ति नारायण सिंह ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की है. वर्तमान में वे इंडिया न्यूज़ के साथ कार्यरत हैं. एस्ट्रो (ज्योतिष) और लाइफ़स्टाइल विषयों पर लेखन में उन्हें विशेष रुचि और अनुभव है. इसके अलावा हेल्थ और पॉलिटिकल कवरेज से जुड़े मुद्दों पर भी वे नियमित रूप से लेखन करते हैं.तथ्यपरक, सरल और पाठकों को जागरूक करने वाला कंटेंट तैयार करना उनकी लेखन शैली की प्रमुख विशेषता है.डिजिटल मीडिया में विश्वसनीय और प्रभावी पत्रकारिता को लेकर वे निरंतर अभ्यासरत हैं.

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