Digital Addiction In Zen-Z: आज का डिजिटल नशा दृष्टि को धीरे-धीरे कमजोर बना रही है. इस परेशानी का नाम स्क्रीन-सिंड्रोम दिया गया. इसकी चपेट में आज की जनरेशन (Zen-Z) अधिक है. हाल ही में सामने आई कुछ रिसर्च ने इस आम धारणा पर सवाल खड़े कर दिए हैं. अब सवाल है कि आखिर, डिजिटल नशा कैसे घटा रहा आईक्यू लेबल? स्क्रीन-सिंड्रोम से बचने के उपाय क्या हैं?
जानिए, डिजिटल नशा कैसे घटा रहा आईक्यू लेबल. (Canva)
Digital Addiction In Zen-Z: आंखें मानव शरीर के सबसे अनमोल और नाजुक अंग हैं. यही तो हैं जिनके जरिए हम दुनिया की खूबसूरती को देखते हैं. लेकिन, आज का डिजिटल नशा दृष्टि को धीरे-धीरे कमजोर बना सकती है. इस परेशानी का नाम दिया गया स्क्रीन-सिंड्रोम. इसकी चपेट में आज की जनरेशन (Zen-Z) अधिक है. दरअसल, जब भी दो लोग नई जनरेशन की बात करते हैं तो आमतौर पर यही कहा जाता है कि अगली पीढ़ी पहले से ज्यादा स्मार्ट, तेज़ और एडवांस होती है. इसी सोच के चलते किसी भी अपडेटेड चीज़ को ‘न्यू जनरेशन’ का तमगा दे दिया जाता है. लेकिन, हाल ही में सामने आई कुछ रिसर्च ने इस आम धारणा पर सवाल खड़े कर दिए हैं. अब सवाल है कि आखिर, डिजिटल नशा कैसे घटा रहा आईक्यू लेवल? स्क्रीन-सिंड्रोम से बचने के उपाय क्या हैं? आइए जानते हैं इस बारे में-
wionews.com में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, जेन-जी यानी 15 से 27 साल के युवा अपने पहले वाली पीढ़ी की तुलना में कम इंटेलिजेंट पाए गए हैं. स्टडीज़ में दावा किया गया है कि जेन-जी का आईक्यू लेवल, याददाश्त (हिफ़्ज़ा), ध्यान केंद्रित करने की क्षमता (तवज्जो) और समस्या सुलझाने की समझ पिछली जनरेशन के मुकाबले कमजोर हुई है. विशेषज्ञों के अनुसार, इसकी एक बड़ी वजह डिजिटल टेक्नोलॉजी पर बढ़ती निर्भरता है. मोबाइल, टैबलेट और छोटे वीडियो कंटेंट ने पढ़ने-सोचने की गहराई को कम किया है. रिसर्चर्स इसे सिर्फ शैक्षणिक नहीं, बल्कि दिमागी सेहत से जुड़ा गंभीर मुद्दा बता रहे हैं, जिस पर वक्त रहते ध्यान देना जरूरी है.

न्यूरोसाइंस की दुनिया से आई एक चौंकाने वाली मेडिकल चेतावनी ने पूरी पीढ़ी को कटघरे में खड़ा कर दिया है. डॉ. हॉरवाथ के मुताबिक, यह गिरावट सिर्फ आईक्यू तक सीमित नहीं है, बल्कि मेमोरी (हिफ़्ज़ा), अटेंशन स्पैन (तवज्जो), रीडिंग कॉम्प्रिहेन्शन, मैथमैटिकल प्रोसेसिंग और प्रॉब्लम सॉल्विंग एबिलिटी सब पर असर पड़ा है. मेडिकल भाषा में कहें तो यह एक तरह का कॉग्निटिव डिक्लाइन है, जिसकी जड़ में है डिजिटल ओवरडिपेंडेंस.
डॉ. हॉरवाथ ने साफ कहा कि इंसानी दिमाग की न्यूरल आर्किटेक्चर छोटे वीडियो, रील्स और टूटी-फूटी लाइनों से सीखने के लिए नहीं बनी. डीप लर्निंग और लॉन्ग-टर्म मेमोरी कंसोलिडेशन आमने-सामने की बातचीत, किताबों की गहरी पढ़ाई और तसली से सोचने से होती है—स्क्रीन स्क्रॉल करने से नहीं. उन्होंने बताया कि 2010 के बाद बच्चों की बौद्धिक क्षमता में लगातार गिरावट दर्ज की गई.
इस खतरे को भांपते हुए स्वीडन ने स्कूलों से टैबलेट हटाकर फिर कागज-कलम और प्रिंटेड किताबों की वापसी की है. फ्रांस, नीदरलैंड्स, ब्रिटेन और फिनलैंड ने भी एडटेक (EdTech) पर लगाम कसी है. यूनेस्को की रिपोर्ट भी आगाह कर चुकी है कि जब तक तकनीक सीखने में मददगार न हो, उसका ज्यादा इस्तेमाल तालीम के लिए नुकसानदेह है.
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