Elephantiasis Disease: इस बीमारी में सबसे ज्यादा असर ‘पैरों’ पर देखने को मिलता है. समय के साथ पैर इतने ज्यादा फूल सकते हैं कि वे हाथी के पैर जैसे मोटे, भारी और सख्त दिखाई देने लगते हैं. हालांकि केवल पैर ही नहीं, बल्कि हाथ, छाती और यहां तक कि जननांगों में भी सूजन हो सकती है, जिससे मरीज को शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की परेशानी झेलनी पड़ती है.
इस बीमारी को हाथी पांव कहे जाने की वजह इसके लक्षण हैं. जब यह बीमारी बढ़ती है, तो पैरों की त्वचा मोटी, खुरदरी और सख्त हो जाती है. पैर सामान्य आकार से कई गुना बड़े दिखने लगते हैं और उनकी बनावट हाथी के पैर से मिलती-जुलती हो जाती है. इसी कारण आम लोगों के बीच इसे हाथी पांव के नाम से जाना जाता है.
मच्छरों के काटने से फैलती है
यह बीमारी ‘संक्रमित मच्छरों के काटने’ से फैलती है. जब मच्छर किसी संक्रमित व्यक्ति को काटता है और फिर किसी स्वस्थ व्यक्ति को काट लेता है, तो परजीवी कीड़े उसके शरीर में पहुंच जाते हैं. ये कीड़े शरीर की ‘लसीका प्रणाली (Lymphatic System)’ में जाकर उसे धीरे-धीरे बाधित कर देते हैं. नतीजतन, शरीर में तरल पदार्थ जमा होने लगता है और सूजन बढ़ती जाती है.
शुरुआत में क्यों नहीं दिखते लक्षण?
हाथी पांव की बीमारी की सबसे खतरनाक बात यह है कि इसके लक्षण तुरंत सामने नहीं आते. कई मामलों में व्यक्ति को संक्रमण होने के बाद सालों तक कोई खास परेशानी महसूस नहीं होती, यही कारण है कि लोग समय रहते इलाज नहीं करा पाते.जैसे-जैसे बीमारी आगे बढ़ती है, शरीर में बुखार, दर्द, थकान और सूजन जैसे लक्षण नजर आने लगते हैं. सूजन वाले हिस्से में भारीपन, जलन और दर्द हो सकता है. कुछ मरीजों को बार-बार बैक्टीरियल संक्रमण का सामना भी करना पड़ता है, जिससे स्थिति और गंभीर हो सकती है. लंबे समय तक इलाज न मिलने पर चलने-फिरने, काम करने और रोजमर्रा की जिंदगी पर गहरा असर पड़ता है.
कितनी गंभीर है यह बीमारी?
दुनियाभर में करीब 12 करोड़ से ज्यादा लोग इस बीमारी से प्रभावित माने जाते हैं. यह बीमारी खासकर उन इलाकों में ज्यादा पाई जाती है, जहां साफ-सफाई की कमी होती है और मच्छरों की संख्या अधिक होती है. भारत के कुछ हिस्सों में अब भी हाथी पांव एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या बनी हुई है.हालांकि इस बीमारी का फिलहाल कोई स्थायी इलाज या वैक्सीन उपलब्ध नहीं है, लेकिन सही समय पर इलाज से इसके प्रभाव को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है. एंटी-पैरासिटिक दवाएं शरीर में मौजूद परजीवी कीड़ों को खत्म करने में मदद करती हैं और संक्रमण को आगे बढ़ने से रोकती हैं. कुछ गंभीर मामलों में सूजन कम करने या हाइड्रोसील जैसी जटिलताओं के लिए सर्जरी का सहारा भी लिया जाता है.
कैसे किया जा सकता है बचाव?
मच्छरों से बचाव इस बीमारी से बचने का सबसे अहम तरीका है. साफ-सफाई बनाए रखना, मच्छरदानी का इस्तेमाल करना और आसपास पानी जमा न होने देना बेहद जरूरी है. साथ ही, अगर किसी क्षेत्र में यह बीमारी ज्यादा फैली हुई है, तो सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों के तहत दी जाने वाली दवाओं का सेवन करना भी फायदेमंद साबित हो सकता है.