Metabolic Syndrome: आजकल हार्ट अटैक, स्ट्रोक और टाइप 2 डायबिटीज जैसी बीमारियां बहुत तेजी से बढ़ रही हैं. इन सबके पीछे एक बड़ी और अक्सर अनदेखी वजह होती है – ‘मेटाबॉलिक सिंड्रोम’. यह कोई एक बीमारी नहीं है, बल्कि कई स्वास्थ्य समस्याओं का एक समूह है जो साथ में मिलकर गंभीर बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ा देता है.
मेटाबॉलिक सिंड्रोम तब माना जाता है जब किसी व्यक्ति को पांच में से कम से कम तीन समस्याएं हों- पेट के आसपास ज्यादा चर्बी, हाई ब्लड प्रेशर, बढ़ा हुआ ब्लड शुगर, ट्राइग्लिसराइड्स का उच्च स्तर और अच्छे कोलेस्ट्रॉल (HDL) का कम होना. ये सभी स्थितियाँ अलग-अलग भी नुकसानदायक हैं, लेकिन जब ये एक साथ मौजूद होती हैं तो शरीर के लिए खतरा और बढ़ जाता है.अमेरिका जैसे देशों में हर तीन में से एक वयस्क इस समस्या से प्रभावित है. भारत में भी शहरी जीवनशैली, गलत खान-पान और कम शारीरिक गतिविधि के कारण यह तेजी से बढ़ रही है.
मेटाबॉलिक सिंड्रोम के लक्षण क्यों नहीं दिखते साफ-साफ?
इस सिंड्रोम की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसके ज्यादातर हिस्से चुपचाप शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं. हाई ब्लड प्रेशर या हाई ट्राइग्लिसराइड्स अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण नहीं देते. इसलिए कई लोगों को तब तक पता नहीं चलता जब तक कोई बड़ी समस्या सामने न आ जाए.हालांकि, अगर ब्लड शुगर बढ़ने लगे तो कुछ संकेत दिख सकते हैं. जैसे बार-बार प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, खासकर रात में, थकान महसूस होना या बगल और गर्दन के पीछे की त्वचा का काला पड़ जाना. इन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
इसके पीछे की असली वजह
मेटाबॉलिक सिंड्रोम की जड़ में अक्सर एक ही बड़ी समस्या होती है ‘इंसुलिन रेजिस्टेंस’. इंसुलिन एक हार्मोन है जो हमारे शरीर में ब्लड शुगर को नियंत्रित करता है. जब शरीर की कोशिकाएँ इंसुलिन को सही तरीके से पहचानना बंद कर देती हैं, तो ब्लड शुगर बढ़ने लगता है.इस स्थिति में अग्न्याशय (पैंक्रियास) ज्यादा इंसुलिन बनाने की कोशिश करता है, जिससे शरीर में इंसुलिन का स्तर बढ़ जाता है. अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे, तो प्रीडायबिटीज और बाद में टाइप 2 डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है.इंसुलिन रेजिस्टेंस केवल शुगर तक सीमित नहीं है. यह हाई ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल असंतुलन और दिल की बीमारियों के खतरे को भी बढ़ाता है.
पेट की चर्बी क्यों है सबसे बड़ा खतरा?
पेट के आसपास जमा चर्बी, खासकर अंदरूनी अंगों के आसपास की चर्बी (विसरल फैट), मेटाबॉलिक सिंड्रोम में बड़ी भूमिका निभाती है. यह चर्बी ऐसे केमिकल छोड़ती है जो शरीर में सूजन बढ़ाते हैं और इंसुलिन के असर को कम कर देते हैं.जितनी ज्यादा पेट की चर्बी होगी, उतना ज्यादा इंसुलिन रेजिस्टेंस का खतरा बढ़ेगा. इसलिए सिर्फ वजन कम करना ही काफी नहीं, बल्कि पेट की चर्बी कम करना ज्यादा जरूरी है.
लाइफस्टाइल की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है?
कम शारीरिक गतिविधि भी इस समस्या को बढ़ाती है. जब हम नियमित व्यायाम नहीं करते, तो हमारी मांसपेशियाँ ब्लड शुगर को सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पातीं. इसके उलट, नियमित एक्सरसाइज शरीर को इंसुलिन के प्रति ज्यादा संवेदनशील बनाती है.इसके अलावा, कुछ दवाइयां, जैसे स्टेरॉयड या कुछ मानसिक स्वास्थ्य की दवाएं, इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ा सकती हैं. आनुवंशिक कारण भी भूमिका निभाते हैं. अगर परिवार में डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या मोटापा है, तो जोखिम और बढ़ जाता है.
क्यों समझना जरूरी है मेटाबॉलिक सिंड्रोम को?
मेटाबॉलिक सिंड्रोम को एक चेतावनी संकेत की तरह देखना चाहिए. यह बताता है कि शरीर अंदर से संतुलन खो रहा है. अच्छी बात यह है कि इसे शुरुआती स्तर पर ही लाइफस्टाइल बदलाव से काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है.संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, वजन नियंत्रण, तनाव कम करना और समय-समय पर हेल्थ चेकअप – ये सब मिलकर मेटाबॉलिक सिंड्रोम के खतरे को कम कर सकते हैं.