National Girl Child Day 2026: आज राष्ट्रीय बालिका दिवस है, जिसका उद्देश्य समाज में लड़कियों के साथ होने वाली असमानताओं के प्रति जन जागरूकता पैदा करना है. यह दिन बालिकाओं के अधिकारों, उनके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण के महत्व के बारे में जागरूकता को बढ़ावा देता है. इसलिए बेटियों को सक्षम, समृद्ध और सशक्त बनाने की शुरुआत उन्हें उनके अधिकारों के बारे में बताकर करनी चाहिए. हर लड़की को पता होना चाहिए कि शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और शादी से जुड़े क्या अधिकार उनके पास हैं. क्योंकि, जब बेटियां खुद अपने अधिकारों के बारे में जानेंगी तो वह कभी किसी दबाव, किसी दूसरे पर निर्भर और आत्म संश्रय में नहीं रहेंगी. हालांकि, आज हमारे देश की बेटियां हर क्षेत्र में पुरुषों से कंधा से कंधा मिलाकर कर्तव्य की ओर अग्रसर हो रही हैं.
इन सब के बीच बेटियों की सेहत का ध्यान रखना हर पैरेट्स की जिम्मेदारी है. क्योंकि, जब वे बचपन से निकलकर किशोरावस्था में आती हैं तो उन्हें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है. इस दौरान उनमें कई हार्मोनल बदलाव आते हैं. इस वक्त अगर उनकी सेहत का ख्याल न रखा गया तो भविष्य में कई परेशानियों को जोखिम बढ़ सकता है. अब सवाल है कि आखिर क्यों मनाया जाता है राष्ट्रीय बालिका दिवस? इस दिन की कब से हुई शुरुआत? किशोरावस्था में बेटियों को क्या-क्या हो सकती परेशानियां? पैरेंट्स बच्चियों की सेहत का कैसे रखें ख्याल? इन सभी सवालों के बारे में India News को बता रही हैं नोएडा की सीनियर मेडिकल ऑफिसर एवं गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. मीरा पाठक-
राष्ट्रीय बालिका दिवस की शुरुआत कब हुई?
भारत सरकार ने वर्ष 2008 में 24 जनवरी को ‘राष्ट्रीय बालिका दिवस’ के रूप में घोषित किया था. इसी का परिणाम है कि, आज की बेटी केवल चूल्हा-चौका तक सीमित नहीं है. वे हर क्षेत्र में खुद को साबित करके दिखा रही हैं. वर्ष 2026 में प्रवेश के साथ यह दिन अब केवल कैलेंडर की एक तारीख भर नहीं रह गया है, बल्कि देश की करोड़ों बालिकाओं के सपनों, आत्मविश्वास और संभावनाओं के उत्सव का प्रतीक बन चुका है.
क्यों मनाया जाता है राष्ट्रीय बालिका दिवस?
24 जनवरी 1966 का दिन आज भी इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों से दर्ज है. उस दिन दिल्ली के रायसीना हिल्स पर राजनीतिक हलचल अपने चरम पर थी. दृढ़ संकल्प और अटूट आत्मविश्वास से भरी एक महिला भारत के सर्वोच्च पद की शपथ लेने जा रही थी. यह थीं इंदिरा गांधी उस दिन दुनिया ने देखा कि भारत की एक बेटी न केवल घर संभाल सकती है, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का नेतृत्व भी कर सकती है. इसी ऐतिहासिक उपलब्धि को सम्मान देने के उद्देश्य से भारत सरकार ने वर्ष 2008 में 24 जनवरी को ‘राष्ट्रीय बालिका दिवस’ के रूप में घोषित किया.
बेटियों को होने वाली परेशानियां और बचाव?
पीरियड्स प्रॉब्लम्स: डॉ. पाठक कहती हैं कि, समय पर पीरियड्स आना हर महिला के अच्छे स्वास्थ्य का संकेत है. लेकिन, बच्चियों में शुरुआत के पीरियड्स (मासिक धर्म) पर खास ध्यान देना चाहिए. बता दें कि, बच्चियों में पीरियड्स आमतौर पर 10-11 साल में शुरू हो जाते हैं. अगर किसी लड़की को 15 साल के बाद तक भी नहीं आते हैं तो डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए. इस दौरान पैरेंट्स को बिना किसी झिझक के बच्ची से बात करनी चाहिए. बेहतर तो यह होगा कि, बच्ची को महावारी से पहले उसे पीरियड्स किट बनाकर दें. इस किट में आप सैनेट्री पैड, लाइनर, टैम्पोन, पीरियड अंडरवियर और हैंड सैनिटाइज़र रख सकते हैं.
एनीमिनया: अधिकांश बच्चियों में एनीमिया की शिकायत देखी जाती है. क्योंकि, इस वक्त बच्चियों में प्यूबर्टी के साथ तेजी से ग्रोथ हो रही होती है. बता दें कि, एनीमिया का अर्थ है शरीर में आयरन की कमी से हीमोग्लोबिन या लाल रक्त कोशिकाओं का कम होना. ऐसा होने से थकान, कमजोरी और त्वचा में पीलापन आने लगता है. आमतौर पर यह समस्या पोषक तत्वों की कमी, अनहेल्दी फूड्स के कारण हो सकती है. इससे बचने के लिए आयरन युक्त फूड और आयरन सप्लीमेंट का सेवन फायदेमंद साबित होगा.
पीसीओडी: कई बच्चियों में पीसीओडी (Polycystic Ovarian Disease) की समस्या भी देखी जाती है. बता दें कि, पीसीओडी एक हार्मोनल और मेटाबॉलिक विकार है, जो ओवरी में सिस्ट बनने और पुरुष हार्मोन (एंड्रोजन) के स्तर में वृद्धि के कारण होता है. यह इंसुलिन प्रतिरोध से जुड़ा है, जिससे वजन बढ़ना, अनियमित पीरियड्स, मुंहासे और बालों के झड़ने जैसी समस्याएं हो सकती हैं. ये परेशानी किसी लड़की को प्यूबर्टी के 2 साल तक हो तो तुरंत डॉक्टर से मिलें. हालांकि, इससे बचने के लिए हेल्दी लाइफस्टाइल, अच्छा खानपान और नियमित व्यायाम जरूर करें.
सेहतमंद रहने के लिए बच्चियां क्या करें, क्या नहीं?
डॉ. मीरा पाठक कहती हैं कि, बच्चियों को सेहतमंद रखने के लिए उन्हें हेल्दी डाइट (हरी सब्जियां, फल, प्रोटीन) दें. उनको रोज कम से कम 50 से 60 मिनट की कोई शारीरिक गतिविधि कराएं. आप स्विमिंग, योगा या फिर साइकिंग कोई भी एक करा सकते हैं. इसके अलावा, स्क्रीन टाइम में कमी और पर्याप्त नींद लें. जंक फूड से परहेज करें, खूब पानी पीएं. सबसे जरूरी बात कि, बच्चे को मेंटल सपोर्ट कीजिए, उनके साथ बातें कीजिए. क्योंकि, इस दौरान हार्मोन्स चेंजेस के साथ मूड स्विंग की समस्या बढ़ती है.