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Andaman Basin Gas Discovery: मीडिल ईस्ट में तनाव का आज 32 दिन बीत चुके हैं, लेकिन जंग खत्म होने के आसार नजर नहीं आ रहें. इजराइल- अमेरिका और ईरान के जंग के बीच दुनिया भर में तेल की सप्लाई में रुकावट आ रही हैं. इस समस्या से राहत पाने के लिए भी भारत अब अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मज़बूत करने के लिए गहरे समुद्र और नए इलाकों की ओर देख रहा है.
वहीं कुछ दिन पहले ऐसी ही खोज इजिप्ट के साउथ कलाबशा क्षेत्र में हुई, और अब भारत को भी इसमें एक बड़ी सफलता हाथ लगी है. इस पूरी रणनीति के केंद्र में अंडमान-निकोबार बेसिन है, जहां गैस के बड़े भंडार होने के संकेत मिले हैं. हालाँकि, विशेषज्ञ आगाह करते हैं कि इस गैस का इस्तेमाल हमारे घरों या उद्योगों में होने में अभी काफी समय लगेगा.
अंडमान-निकोबार बेसिन इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
भारत अपनी तेल की 85% और गैस की 50% ज़रूरतें आयात से पूरी करता है. ईरान से जुड़े संघर्ष का मंडराता खतरा, और साथ ही होर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव, भारत की ऊर्जा सप्लाई के लिए एक बड़ा जोखिम पैदा करता है. इस संदर्भ में, अंडमान सागर एक बड़ा गेम-चेंजर साबित हो सकता है. अनुमानों के अनुसार, इस बेसिन में 371 मिलियन टन तेल और गैस के भंडार हो सकते हैं.
‘ओपन एकरेज लाइसेंसिंग पॉलिसी’ (OALP) के तहत, सरकार ने पहले से प्रतिबंधित इलाकों, जो लगभग एक मिलियन वर्ग किलोमीटर में फैले हैं, को खोज के लिए खोल दिया है. सरकारी कंपनियां ONGC और ऑयल इंडिया 2026 की शुरुआत से ही इस क्षेत्र में ड्रिलिंग और सर्वेक्षण के कामों में सक्रिय रूप से लगी हुई हैं.
गैस कहां मिली और प्रयास कहां कम पड़े?
अंडमान सागर में चल रहे ड्रिलिंग कार्यों से अब तक मिले नतीजे मिले-जुले रहे हैं. जिसमें विजयपुरम-1 में कुआं ‘सूखा’ निकला यानी वहां कोई भंडार नहीं मिला. वहीं, विजयपुरम-2 में, 2,212 से 2,250 मीटर की गहराई पर गैस की मौजूदगी की पुष्टि हुई है, जिसमें मीथेन की मात्रा 87 प्रतिशत है.
अल्ट्रा-डीपवाटर ड्रिलिंग में ONGC अभी इस जगह पर 6,000 मीटर तक की गहराई तक ड्रिलिंग करने की योजनाओं पर काम कर रहा है. हालांकि गैस के संकेत मिले हैं, लेकिन अभी तक ‘व्यावसायिक सफलता’ नहीं मिली है.
गैस का उत्पादन 2030 के बाद ही संभव
भले ही गैस की खोज हो गई हो, लेकिन इसे मुख्य भूमि तक पहुंचाना अभी भी एक बड़ी चुनौती है. आम तौर पर, गहरे समुद्र की किसी परियोजना को खोज के चरण से लेकर वास्तविक उत्पादन तक पहुंचने में 6 से 10 साल लगते हैं. इस प्रक्रिया में कई चरणों में मंज़ूरी लेना, भंडार का मूल्यांकन करना और ज़रूरी बुनियादी ढाँचा तैयार करना शामिल होता है. अभी अंडमान क्षेत्र में कोई पाइपलाइन या गैस प्रोसेसिंग प्लांट मौजूद नहीं है. विशेषज्ञों का मानना है कि, सबसे अनुकूल परिस्थितियों में भी, इस जगह से व्यावसायिक उत्पादन 2030 के दशक की शुरुआत से लेकर मध्य तक शुरू होने की संभावना नहीं है.
अल्पकालिक समाधान क्या है?
जब तक ये नए बेसिन चालू नहीं हो जाते, भारत को अपनी तत्काल ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने मौजूदा संसाधनों पर ध्यान देना चाहिए. मुंबई हाई, बाड़मेर और असम जैसे पुराने तेल क्षेत्रों में घटते उत्पादन को ‘एन्हांस्ड ऑयल रिकवरी’ (EOR) तकनीकों के इस्तेमाल से रोकना होगा. इसके अलावा, महानदी और कावेरी बेसिन पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए, और साथ ही कोयला खदानों से निकलने वाली गैस का इस्तेमाल करने की दिशा में भी काम किया जाना चाहिए.