Assam Election 2026: आज एक चौराहे पर खड़ी कांग्रेस पार्टी यकीनन उन सभी कद्दावर क्षेत्रीय नेताओं को याद कर रही होगी, जिन्होंने अपनी जबरदस्त ताकत के दम पर न सिर्फ़ राज्यों में पार्टी के सत्ता के गढ़ों को सुरक्षित रखा, बल्कि केंद्र में भी पार्टी की सबसे बड़ी पूंजी माने जाते थे. समय बीतने के साथ एक-एक करके ये सभी दिग्गज या तो पार्टी से दूर हो गए या फिर इस दुनिया को अलविदा कह गए. ऐसा ही एक नाम था तरुण गोगोई.
असम में कांग्रेस सदस्यों के लिए यह दिन उनके नेतृत्व, उनकी बेबाकी और उनके राजनीतिक संकल्प को याद करने का एक अवसर है. खासकर ऐसे समय में जब राज्य चुनाव बस कुछ ही दिनों दूर हैं और कांग्रेस राष्ट्रवादी विमर्श और धार्मिक ध्रुवीकरण के सामने घिरी हुई नजर आ रही है.
तरुण गोगोई ने कांग्रेस को दिलाई पहचान
असम एक ऐसा राज्य जिसने वर्षों तक उग्रवाद का दंश झेला. राज्य में तरुण गोगोई ने मुख्यमंत्री के तौर पर एक असाधारण रूप से लंबी पारी खेली जो लगभग 15 वर्षों तक चली और सफलतापूर्वक राज्य को वापस सामान्य स्थिति में ले आए. वह इस क्षेत्र में पार्टी के आखिरी सच्चे सेनापति बने रहे. एक ऐसी हस्ती जिन पर स्थानीय मतदाताओं का अटूट विश्वास था. गोगोई वह चेहरा थे जिन्होंने असम में क्रांतिकारी बदलाव की अगुवाई की. वह ऐसे नेता थे जिन्होंने 2001 और 2016 के बीच कांग्रेस को लगातार तीन चुनावी जीत दिलाईं. दुख की बात है कि उनका निधन ऐसे समय में हुआ, जब पार्टी के लिए नेतृत्व की एक नई पीढ़ी तैयार करने में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकती थी.
राजनीतिक प्रबंधन के माहिर
गोगोई 1976 में राजनीतिक क्षेत्र में तब सुर्खियों में आए, जब उन्हें भारतीय युवा कांग्रेस में एक पदाधिकारी नियुक्त किया गया. कहा जाता है कि इंदिरा के छोटे बेटे संजय गांधी ने तत्कालीन AICC प्रमुख देव कांत बरुआ से युवा गोगोई पर विशेष ध्यान देने को कहा था. बरुआ ही थे जिन्होंने गोगोई को गुवाहाटी में AICC सत्र आयोजित करने की अहम जिम्मेदारी सौंपी थी. गोगोई ने इस काम को इतनी शानदार ढंग से अंजाम दिया कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी यह कहने से खुद को रोक नहीं पाईं कि युवा अब सचमुच हमारी असली ताकत बन गए हैं.
उस समय स्तंभकार सुनील सेठी ने एक राष्ट्रीय पत्रिका के लिए उस सत्र के बारे में लिखा था. गुवाहाटी ने इससे पहले कभी ऐसा नज़ारा नहीं देखा था. उस समय चल रही उथल-पुथल के बीच, उन पांच दिनों का दृश्य बिल्कुल अलग ही लग रहा था. देश के दूर-दराज के कोनों से भी लोग बड़ी संख्या में या तो देखने के लिए या फिर उसमें हिस्सा लेने के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सत्र में उमड़ पड़े थे. इसका आयोजन बहुत ही भव्य पैमाने पर किया गया था. शहर से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित एक समतल मैदान पर कभी घने जंगलों से घिरा हुआ क्षेत्र था. ऐसा लग रहा था मानो किसी ने कोई जादू की छड़ी घुमा दी हो और उस जगह को एक जगमगाती ‘जवाहरनगर टाउनशिप’ में बदल दिया हो. यहां, कांग्रेस का तिरंगा बैज ही प्रवेश के लिए एकमात्र टिकट का काम करता था.
तीन बार सीएम बने
इसके बाद गोगोई ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. संजय गांधी के निधन और राजीव गांधी के उदय के बाद भी एक ऐसा दौर जब कांग्रेस के कई युवा नेताओं को किनारे कर दिया गया था फिर भी गोगोई अपनी जगह बनाए रखने में कामयाब रहे. वह अहमद पटेल, दिग्विजय सिंह और तारिक अनवर जैसे नेताओं की कतार में बने रहे. उन्होंने कई बार केंद्रीय मंत्री के तौर पर काम किया और आखिरकार, 2001 से 2016 तक असम के मुख्यमंत्री के तौर पर लगातार तीन कार्यकाल पूरे किए.
शर्मा को ‘शनि’ कहा
गांधी परिवार का गोगोई पर भरोसा हमेशा कायम रहा. एक ऐसी बात जो कुछ लोगों को बहुत खली. यही वजह है कि हिमंत बिस्वा शर्मा जैसे महत्वाकांक्षी नेता आखिरकार कांग्रेस छोड़कर BJP में चले गए. मार्च 2016 में असम में स्थानीय मीडिया से बातचीत करते हुए गोगोई ने शर्मा को ‘शनि’यानी एक अशुभ या बाधा डालने वाला प्रभाव बताया था. शर्मा मई 2021 से असम के मुख्यमंत्री के पद पर हैं, कभी गोगोई के सबसे भरोसेमंद सहयोगी हुआ करते थे. तंज कसते हुए गोगोई ने कहा कि हां, मैं कई सालों तक शनि ग्रह के प्रभाव में रहा.
बेटे को राजनीति सीखने की नसीहत
जब गौरव गोगोई अमेरिका में अपनी पढ़ाई पूरी करके लौटे थे, तब उन्होंने राजनीति में आने की इच्छा ज़ाहिर की. उनके पिता ने उनसे कहा कि वे 1970 के दशक के अपने पुराने साथियों के साथ कुछ समय बिताएं, ताकि वे राजनीतिक क्षेत्र की बारीकियों, चुनौतियों और पेचीदगियों को समझ सकें. यह अनुभव गौरव के व्यक्तित्व और नेतृत्व शैली को गढ़ने में बेहद अहम साबित हुआ. 38 साल की उम्र में वे लोकसभा में कांग्रेस पार्टी के उप-नेता बन गए. वे पार्टी के भीतर एक ऐसे नेता के तौर पर उभरे, जिन्हें युवा और अनुभवी, दोनों ही समान रूप से स्वीकार करते हैं और सम्मान देते हैं. आज वे असम कांग्रेस का सबसे जाना-पहचाना चेहरा हैं.
क्या गौरव पिता की विरासत को आगे बढ़ा पाएंगे?
इसमें कोई शक नहीं कि गौरव गोगोई को अपना राजनीतिक करियर विरासत में मिला है. उन्हें उस कठिन संघर्ष से नहीं गुज़रना पड़ा, जिससे उनके पिता गुज़रे थे. हालांकि, अब उनके सामने जो चुनौती है, वह कहीं ज़्यादा बड़ी है. हिंदू राष्ट्रवाद की बढ़ती लहर के बीच तेजी से ध्रुवीकृत और बंटे हुए असम में कांग्रेस पार्टी को दोबारा सत्ता में लाना. इस लक्ष्य को पाने के लिए आज कांग्रेस पार्टी के पास उनसे बेहतर कोई चेहरा नहीं है. खबर है कि गौरव गोगोई की नियुक्ति के बाद असम कांग्रेस के कुछ नेता नाराज़ थे. पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं को एकजुट रखने के लिए ही प्रियंका गांधी वाड्रा को असम कांग्रेस की राज्य स्क्रीनिंग कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था.
इस कदम से यह संदेश गया कि, भले ही राज्य कांग्रेस की कमान गौरव गोगोई के हाथों में हो, लेकिन सभी फैसले गांधी परिवार को विश्वास में लेने के बाद ही लिए जाएंगे. उनकी नियुक्ति से पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा. इस बीच भूपेश बघेल और डी.के. शिवकुमार को चुनाव प्रभारी और सह-प्रभारी नियुक्त किया गया है.