Republic Day 2026: भारत में 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ. तब से इसी दिन को गणतंत्र दिवस के तौर पर मनाने का फैसला लिया गया. देश के पहले राष्ट्रपति बने डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भारत को पूर्ण गणतंत्र राष्ट्र घोषित किया था. इस साल हम अपना 77वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं. इस मौके पर हर साल की तरह कर्तव्य पथ (पहले राजपथ) पर परेड का आयोजन हो रहा है. यहां आपको जानकारी के लिए बता दें कि, परेड शुरुआत से राजपथ पर नहीं होती थी. ऐसे में सवाल होता है कि, राजपथ नहीं तो फिर पहले कहां होती थी गणतंत्र दिवस पर परेड? परेड में राज्यों की ओर से झांकियों को कब शामिल किया गया? परेड का रास्ता कितना लंबा है? पहले गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि कौन थे? अगर आप भी इन सभी रोचक जानकारियों से दूर हैं तो हम बताएंगे गणतंत्र दिवस से जुड़ी दिलचस्प जानकारियां.
गणतंत्र दिवस पर यहां हुई थी पहली परेड
देश में संविधान लागू होने के बाद देश को पहले राष्ट्रपति मिले. डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद दिल्ली के पुराना किला के सामने मौजूद इरविन स्टेडियम में पहली बार गणतंत्र दिवस के मौके पर तिरंगा झंडा फहाया और परेड की सलामी ली थी. इसके बाद गणतंत्र दिवस के मौके पर सार्वजनिक अवकाश का भी ऐलान किया. इस परेड सलामी के दौरान देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू और गवर्नर जनरल सी राजगोपालाचारी भी मौजूद थे.
पहले गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि कौन थे?
भारत में संविधान लागू होने के बाद से गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि को बुलाने की परंपरा रही है. यह आज भी बदस्तूर जारी है. आपको बता दें कि, पहले गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो को आमंत्रित किया गया था. बता दें कि, इरविन स्टेडियम को पहले नेशनल स्टेडियम और फिर मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम नाम दिया गया.
5वीं बार में तय हुई परेड की स्थायी जगह
पहला गणतंत्र दिवस समारोह इरविन स्टेडियम में आयोजित हुआ, लेकिन यह कोई जगह नहीं थी. फिर गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम लाल किला, किंग्सवे कैंप, रामलीला मैदान में आयोजित होता रहा. आखिर में साल 1955 में पहली बार राजपथ पर परेड का आयोजन हुआ. तब से अब तक इसी जगह पर गणतंत्र दिवस परेड होती है.
परेड का रास्ता कितना लंबा है?
पांचवीं बार में तय हुआ गणतंत्र दिवस परेड का रास्ता 5 किलोमीटर से भी ज्यादा लंबा होता है. बता दें कि, यह रास्ता राष्ट्रपति भवन के पास रायसीना हिल से शुरू होती है. इसके बाद इंडिया गेट से होते हुए लाल किले पर जाकर पूरी होती है. इसी पथ पर सभी राज्यों की झांकियां शामिल होती हैं.
पहले 30 अब 21 तोपों की सलामी
देश के प्रथम राष्ट्रपति ने जब 26 जनवरी 1950 को इरविन स्टेडियम में गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराया तो उन्हें 30 तोपों की सलामी दी गई थी. हालांकि, बाद में गणतंत्र दिवस पर 21 तोपों की सलामी दी जाने लगी. बता दें कि, ये सलामी भारतीय सेना की 7 खास तोपों से दी जाती है. इन तोपों को पॉन्डर्स कहते हैं. पॉन्डर्स तोपें 1941 में बनी थीं. इन्हें सेना के सभी औपचारिक कार्यक्रमों में शामिल करने की परंपरा है.
गणंत्र दिवस पर परेड क्यों होती है?
हर साल गणतंत्र दिवस की परेड में देश के राष्ट्रपति ध्वजारोहण करते हैं. फिर उन्हें 21 तोपों की सलामी दी जाती है. इस कार्यक्रम में देश ही नहीं, बल्कि दुनियाभर से कुछ खास मेहमान मौजूद रहते हैं. ऐसे में देश के शक्ति, साहस, शौर्य, पराक्रम, विकास, विविध रंग का प्रदर्शन करने के लिए परेड का आयोजन होता है. इस दौरान तीनों सेनाओं के अलावा एनसीसी और विभिन्न बलों के जवान परेड में हिस्सा लेते हैं.
परेड में झांकियां कब हुईं शामिल?
गणतंत्र दिवस के पहले आयोजन में परेड के साथ झांकियां शामिल नहीं की गई थीं. सबसे पहली बार 26 जनवरी 1953 को सेना और अन्य बलों के साथ राज्यों की झांकियों को भी परेड में शामिल किया गया. इन झांकियों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ ही आदिवासी लोकनृत्यों का भी लोगों ने आनंद लिया. इसके बाद से लगातार राज्यों की झांकियों को चुनकर परेड में शामिल किया जाता है. परेड में शामिल सभी झांकियां 5 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से चलती हैं. इससे सभी झांकियों के बीच निश्चित दूरी बनी रहती है.