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Home > देश > प्रेग्नेंसी में मोटापा… तुरंत हो जाएं सावधान, वरना ये बीमारी बना लेगी शिकार, शिशु की सेहत पर भी आ सकती आंच!

प्रेग्नेंसी में मोटापा… तुरंत हो जाएं सावधान, वरना ये बीमारी बना लेगी शिकार, शिशु की सेहत पर भी आ सकती आंच!

Gestational Diabetes In Pregnency: प्रेग्नेंसी का समय जितना सुखद, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी होता है. इस दौरान कई बीमारियों के चपेट में आने का जोखिम बढ़ता है. डायबिटीज ऐसी ही गंभीर बीमारियों में से एक है. इसे जेस्‍टेशनल डायबिटीज कहते हैं. आइए डॉ. मीरा पाठक से जानते हैं कि आखिर कितनी गंभीर है यह बीमारी, कैसे करें इससे बचाव?

Written By: Lalit Kumar
Last Updated: January 11, 2026 12:42:36 IST

Gestational Diabetes In Pregnency: प्रेग्नेंसी हर महिला के लिए बेहद सुखद पलों में से एक है. लेकिन, यह समय जितना सुखद, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी होता है. इसलिए बेबी प्लान करने से पहले कुछ समझदारी दिखाना बेहद जरूरी है. दरअसल, कुछ महिलाएं 9 महीने पूरी तरह स्‍वस्‍थ रहती हैं, तो कुछ में बीमारियों के चपेट में आने का जोखिम बढ़ता है. डायबिटीज ऐसी ही गंभीर बीमारियों में से एक है. इसे जेस्‍टेशनल डायबिटीज कहते हैं. वैसे तो इस बीमारी के कई कारण हैं, लेकिन शरीर का बढ़ा वजन सबसे बड़ा दोषी है. डॉक्टर बताती हैं कि, प्लेसेंटा एक हार्मोन बनाता है. यह हार्मोन शरीर को इंसुलिन का प्रभावी ढंग से उपयोग करने से रोकता है. इसलिए जब हमारे शरीर में गर्भावस्‍था के दौरान इंसुलिन का सही उत्पादन नहीं कर पाता, तो गर्भवती महिला डायबिटीज का शिकार हो जाती है. आजकल की अनहेल्दी लाइफस्टाइल के चलते गर्भावस्था के दौरान ज्यादातर महिलाओं में यह गंभीर समस्या देखी जा रही है. 

India News को नोएडा की सीनियर मेडिकल ऑफिसर एवं गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. मीरा पाठक बताती हैं कि, कई मामलों में जेस्‍टेशनल डायबिटीज उन महिलाओं को भी हो जाती है, जिन्‍हें पहले कभी यह समस्‍या नहीं थी. इसके बाद भी अगर कोई महिला इस बीमारी का शिकार हो जाती है, तो लापरवाही बिल्कुल नहीं करनी चाहिए. क्योंकि, इस बीमारी की अनदेखी गर्भवती के साथ-साथ गर्भ में पल रहे बच्‍चे के लिए भी खतरनाक है. ऐसे में मां की समझदारी ही काम आ सकती है. अब सवाल है कि प्रेग्नेंसी में किन महिलाओं को ज्यादा जेस्टेशनल डायबिटीज का खतरा? गर्भावस्था में डायबिटीज का कितने दिन में पता चलता है? इस गंभीर बीमारी से बचने के लिए क्या करें? जेस्टेशनल डायबिटीज से बचने के लिए क्या खाएं क्या नहीं? आइए जानते हैं इस बारे में-

गर्भावस्था में डायबिटीज का कितने दिन में पता चलता है?

डॉ. पाठक कहती हैं कि, जेस्टेशनल डायबिटीज वह स्थिति होती है, जिसमें किसी महिला को प्रेग्रेसी के दौरान पहली बार ब्लड शुगर बढ़ने की समस्या होती है. आमतौर पर यह समस्या प्रेग्नेसी के 24 से 26 हफ्ते यानी छठे या सातवें महीने में सामने आती है. अच्छी बात यह है कि ज्यादातर मामलों में डिलीवरी के बाद और पीरियड पूरा होने पर ब्लड शुगर लेवल अपने आप नॉर्मल हो जाता है. जेस्टेशनल डायबिटीज होने का मुख्य कारण प्लेसेंटा से निकलने वाले कुछ हार्मोन होते हैं. ये हार्मोन शरीर की कोशिकाओं को इंसुलिन के बना देते हैं. इसके चलते शरीर में शुगर लेवल बढ़ जाता है. यही हार्मोन जब ज्यादा मात्रा में बनते हैं तो वे मां के साथ-साथ बच्चे पर भी असर डालते हैं. 

स्क्रीनिंग और एंटीनेटल चेकअप क्यों जरूरी?

इस बीमारी से बचने के लिए सबसे जरूरी है समय पर स्क्रीनिंग. जब भी कोई महिला पहली बार एंटीनेटल चेकअप के लिए जाती है. उसे रेंडम ब्लड शुगर की जांच जरूर करानी चाहिए. इसके अलावा, कुछ महिलाएं हाई रिस्क केटेगरी में आती हैं, जैसे ज्यादा वजन होना, 35 साल के बाद पहली प्रेग्नेसी, परिवार में डायबिटीज की हिस्ट्री, प्रेग्नेंसी में हाई ब्लड प्रेशर, पहले बार-बार मिसकैरेज होना, पेट में बच्चे की मौत होना, पिछली प्रेग्नेसी में जेस्टेशनल डायबिटीज रहना या पहले चार किलो से ज्यादा का बच्चा पैदा होना. ऐसी महिलाओं के लिए 24 से 26 हफ्ते के बीच ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट कराना बेहद जरूरी होता है.

मां लापरवाही से किन परेशानियों का खतरा?

अगर इस दौरान लापरवाही बरती जाए तो इसका असर मां और बच्चे दोनों पर पड़ सकता है. मां को बार-बार इंफेक्शन हो सकता है, पानी ज्यादा बनने की समस्या हो सकती है. मिसकेरेज या प्री टर्म डिलीवरी का खतरा बढ़ जाता है. वहीं बच्चे पर इसका असर यह हो सकता है कि बच्चा या तो बहुत कमजोर पैदा हो या फिर जरूरत से ज्यादा वजन का यानी चार किलो से ऊपर का हो. डिलीवरी के तुरंत बाद भी खतरा खत्म नहीं होता. ऐसे बच्चों में जन्म के बाद ब्लड शुगर कम होने की संभावना रहती है और पीलिया का खतरा भी ज्यादा होता है. इसलिए डॉक्टर से लगातार मॉनिटरिंग की सलाह देते हैं. 

जेस्टेशनल डायबिटीज से बचने के लिए क्या करें?

डॉक्टर कहती हैं कि जेस्टेशनल डायबिटीज से बचने का सबसे आसान और असरदार तरीका है स्मार्ट लाइफस्टाइल अपनाना. इसका मतलब है संतुलित आहार लेना. दिन में तीन बड़े खाने की बजाय छोटे छोटे और बार-बार खाने की आदत डालें. हर दो से तीन घंटे में थोड़ा थोड़ा खाना बेहतर रहता है. प्लेट का आधा हिस्सा सब्जियों और सलाद से भरें. दाल, दही, लस्सी, पनीर और अंडा जैसी बीजों को डाइट में शामित करें. 

हिडन शुगर क्या, जिसे प्रेग्नेंसी में लेने के लिए मना करते डॉक्टर?

प्रेग्नेंसी में दूसरी सबसे जरूरी बात है हिडन शुगर से बचना चाहिए. हिडन शुगर वे चीजें होती हैं जो स्वाद में ज्यादा मीठी नहीं लगतीं, लेकिन उनमें शुगर की मात्रा बहुत ज्यादा होती है. जैसे पैकेट वाला नारियल पानी, पैकेज्ड फूट जूस, फ्लेवर्ड दूध, फ्लेवर्त दही, ब्राउन ब्रेड, व्हाइट ब्रेड, पाव, बन, सैंडविच स्प्रेड, मेयोनीज, बिस्किट, रस्क, के और मफिन इन चीजों में दूरी बनाना बेहद जरूरी है.

इस गलतफहमी को दिमाग से कर दें दूर

एक आम गलतफहमी यह भी है कि, प्रेग्नेंसी में दो लोगों के लिए एक खाना चाहिए. डॉक्टर साफ कहते हैं कि ऐसा बिल्कुल नहीं करना चाहिए. पहले तीन महीने उतना ही खाएं जितना पहले खाती थीं. दूसरे और तीसरे ट्राइमेस्टर में अतिरिक्त मील जोड़ सकती हैं.

प्रेग्नेंसी में हल्की एक्सरसाइज क्यों जरूरी?

डॉक्टर की सलाह से रोजाना आधा घंटे हल्की एक्सरसाइज जरूर करें. हल्की वॉक, प्रेगेंसी योगा या हर मील के बाद 10-15 मिनट टहलना भी काफी फायदेमंद होता है. जरूरत से ज्यादा वजन बढ़ने से रोकें. पूरी प्रेग्नेंसी में करीब 10-11 किलो वजन बढ़ना सामान्य माना जाता है. खाना न छोड़ें, पूरी नींद लें, कम से कम 7-8 घंटे सोने की कोशिश करें और तनाव लेने से बचें. ये सभी बातें मिलकर जेस्टेशनल डायबिटीज को रोकने में मदद करती हैं.

लक्षण दिखें तो क्या करना चाहिए?

कुछ ऐसे लक्षण भी होते हैं जिन पर गर्भवती महिलाओं को खास ध्यान देना चाहिए, जैसे- बार-बार ज्यादा भूख लगना, ज्यादा प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, बार-बार इफेक्शन होना, बार-बार फंगल इंफेक्शन औरर बीपी बढ़ना. अल्ट्रासाउंड में अगर एम्नियोटिक फ्लूड दिखे, बच्चे का वजन तेजी से बढ़े या बच्चा कमजोर लगे, तो तुरंत ब्लड शुगर की जांच करानी चाहिए.

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प्रेग्नेंसी में मोटापा… तुरंत हो जाएं सावधान, वरना ये बीमारी बना लेगी शिकार, शिशु की सेहत पर भी आ सकती आंच!

Gestational Diabetes In Pregnency: प्रेग्नेंसी का समय जितना सुखद, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी होता है. इस दौरान कई बीमारियों के चपेट में आने का जोखिम बढ़ता है. डायबिटीज ऐसी ही गंभीर बीमारियों में से एक है. इसे जेस्‍टेशनल डायबिटीज कहते हैं. आइए डॉ. मीरा पाठक से जानते हैं कि आखिर कितनी गंभीर है यह बीमारी, कैसे करें इससे बचाव?

Written By: Lalit Kumar
Last Updated: January 11, 2026 12:42:36 IST

Gestational Diabetes In Pregnency: प्रेग्नेंसी हर महिला के लिए बेहद सुखद पलों में से एक है. लेकिन, यह समय जितना सुखद, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी होता है. इसलिए बेबी प्लान करने से पहले कुछ समझदारी दिखाना बेहद जरूरी है. दरअसल, कुछ महिलाएं 9 महीने पूरी तरह स्‍वस्‍थ रहती हैं, तो कुछ में बीमारियों के चपेट में आने का जोखिम बढ़ता है. डायबिटीज ऐसी ही गंभीर बीमारियों में से एक है. इसे जेस्‍टेशनल डायबिटीज कहते हैं. वैसे तो इस बीमारी के कई कारण हैं, लेकिन शरीर का बढ़ा वजन सबसे बड़ा दोषी है. डॉक्टर बताती हैं कि, प्लेसेंटा एक हार्मोन बनाता है. यह हार्मोन शरीर को इंसुलिन का प्रभावी ढंग से उपयोग करने से रोकता है. इसलिए जब हमारे शरीर में गर्भावस्‍था के दौरान इंसुलिन का सही उत्पादन नहीं कर पाता, तो गर्भवती महिला डायबिटीज का शिकार हो जाती है. आजकल की अनहेल्दी लाइफस्टाइल के चलते गर्भावस्था के दौरान ज्यादातर महिलाओं में यह गंभीर समस्या देखी जा रही है. 

India News को नोएडा की सीनियर मेडिकल ऑफिसर एवं गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. मीरा पाठक बताती हैं कि, कई मामलों में जेस्‍टेशनल डायबिटीज उन महिलाओं को भी हो जाती है, जिन्‍हें पहले कभी यह समस्‍या नहीं थी. इसके बाद भी अगर कोई महिला इस बीमारी का शिकार हो जाती है, तो लापरवाही बिल्कुल नहीं करनी चाहिए. क्योंकि, इस बीमारी की अनदेखी गर्भवती के साथ-साथ गर्भ में पल रहे बच्‍चे के लिए भी खतरनाक है. ऐसे में मां की समझदारी ही काम आ सकती है. अब सवाल है कि प्रेग्नेंसी में किन महिलाओं को ज्यादा जेस्टेशनल डायबिटीज का खतरा? गर्भावस्था में डायबिटीज का कितने दिन में पता चलता है? इस गंभीर बीमारी से बचने के लिए क्या करें? जेस्टेशनल डायबिटीज से बचने के लिए क्या खाएं क्या नहीं? आइए जानते हैं इस बारे में-

गर्भावस्था में डायबिटीज का कितने दिन में पता चलता है?

डॉ. पाठक कहती हैं कि, जेस्टेशनल डायबिटीज वह स्थिति होती है, जिसमें किसी महिला को प्रेग्रेसी के दौरान पहली बार ब्लड शुगर बढ़ने की समस्या होती है. आमतौर पर यह समस्या प्रेग्नेसी के 24 से 26 हफ्ते यानी छठे या सातवें महीने में सामने आती है. अच्छी बात यह है कि ज्यादातर मामलों में डिलीवरी के बाद और पीरियड पूरा होने पर ब्लड शुगर लेवल अपने आप नॉर्मल हो जाता है. जेस्टेशनल डायबिटीज होने का मुख्य कारण प्लेसेंटा से निकलने वाले कुछ हार्मोन होते हैं. ये हार्मोन शरीर की कोशिकाओं को इंसुलिन के बना देते हैं. इसके चलते शरीर में शुगर लेवल बढ़ जाता है. यही हार्मोन जब ज्यादा मात्रा में बनते हैं तो वे मां के साथ-साथ बच्चे पर भी असर डालते हैं. 

स्क्रीनिंग और एंटीनेटल चेकअप क्यों जरूरी?

इस बीमारी से बचने के लिए सबसे जरूरी है समय पर स्क्रीनिंग. जब भी कोई महिला पहली बार एंटीनेटल चेकअप के लिए जाती है. उसे रेंडम ब्लड शुगर की जांच जरूर करानी चाहिए. इसके अलावा, कुछ महिलाएं हाई रिस्क केटेगरी में आती हैं, जैसे ज्यादा वजन होना, 35 साल के बाद पहली प्रेग्नेसी, परिवार में डायबिटीज की हिस्ट्री, प्रेग्नेंसी में हाई ब्लड प्रेशर, पहले बार-बार मिसकैरेज होना, पेट में बच्चे की मौत होना, पिछली प्रेग्नेसी में जेस्टेशनल डायबिटीज रहना या पहले चार किलो से ज्यादा का बच्चा पैदा होना. ऐसी महिलाओं के लिए 24 से 26 हफ्ते के बीच ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट कराना बेहद जरूरी होता है.

मां लापरवाही से किन परेशानियों का खतरा?

अगर इस दौरान लापरवाही बरती जाए तो इसका असर मां और बच्चे दोनों पर पड़ सकता है. मां को बार-बार इंफेक्शन हो सकता है, पानी ज्यादा बनने की समस्या हो सकती है. मिसकेरेज या प्री टर्म डिलीवरी का खतरा बढ़ जाता है. वहीं बच्चे पर इसका असर यह हो सकता है कि बच्चा या तो बहुत कमजोर पैदा हो या फिर जरूरत से ज्यादा वजन का यानी चार किलो से ऊपर का हो. डिलीवरी के तुरंत बाद भी खतरा खत्म नहीं होता. ऐसे बच्चों में जन्म के बाद ब्लड शुगर कम होने की संभावना रहती है और पीलिया का खतरा भी ज्यादा होता है. इसलिए डॉक्टर से लगातार मॉनिटरिंग की सलाह देते हैं. 

जेस्टेशनल डायबिटीज से बचने के लिए क्या करें?

डॉक्टर कहती हैं कि जेस्टेशनल डायबिटीज से बचने का सबसे आसान और असरदार तरीका है स्मार्ट लाइफस्टाइल अपनाना. इसका मतलब है संतुलित आहार लेना. दिन में तीन बड़े खाने की बजाय छोटे छोटे और बार-बार खाने की आदत डालें. हर दो से तीन घंटे में थोड़ा थोड़ा खाना बेहतर रहता है. प्लेट का आधा हिस्सा सब्जियों और सलाद से भरें. दाल, दही, लस्सी, पनीर और अंडा जैसी बीजों को डाइट में शामित करें. 

हिडन शुगर क्या, जिसे प्रेग्नेंसी में लेने के लिए मना करते डॉक्टर?

प्रेग्नेंसी में दूसरी सबसे जरूरी बात है हिडन शुगर से बचना चाहिए. हिडन शुगर वे चीजें होती हैं जो स्वाद में ज्यादा मीठी नहीं लगतीं, लेकिन उनमें शुगर की मात्रा बहुत ज्यादा होती है. जैसे पैकेट वाला नारियल पानी, पैकेज्ड फूट जूस, फ्लेवर्ड दूध, फ्लेवर्त दही, ब्राउन ब्रेड, व्हाइट ब्रेड, पाव, बन, सैंडविच स्प्रेड, मेयोनीज, बिस्किट, रस्क, के और मफिन इन चीजों में दूरी बनाना बेहद जरूरी है.

इस गलतफहमी को दिमाग से कर दें दूर

एक आम गलतफहमी यह भी है कि, प्रेग्नेंसी में दो लोगों के लिए एक खाना चाहिए. डॉक्टर साफ कहते हैं कि ऐसा बिल्कुल नहीं करना चाहिए. पहले तीन महीने उतना ही खाएं जितना पहले खाती थीं. दूसरे और तीसरे ट्राइमेस्टर में अतिरिक्त मील जोड़ सकती हैं.

प्रेग्नेंसी में हल्की एक्सरसाइज क्यों जरूरी?

डॉक्टर की सलाह से रोजाना आधा घंटे हल्की एक्सरसाइज जरूर करें. हल्की वॉक, प्रेगेंसी योगा या हर मील के बाद 10-15 मिनट टहलना भी काफी फायदेमंद होता है. जरूरत से ज्यादा वजन बढ़ने से रोकें. पूरी प्रेग्नेंसी में करीब 10-11 किलो वजन बढ़ना सामान्य माना जाता है. खाना न छोड़ें, पूरी नींद लें, कम से कम 7-8 घंटे सोने की कोशिश करें और तनाव लेने से बचें. ये सभी बातें मिलकर जेस्टेशनल डायबिटीज को रोकने में मदद करती हैं.

लक्षण दिखें तो क्या करना चाहिए?

कुछ ऐसे लक्षण भी होते हैं जिन पर गर्भवती महिलाओं को खास ध्यान देना चाहिए, जैसे- बार-बार ज्यादा भूख लगना, ज्यादा प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, बार-बार इफेक्शन होना, बार-बार फंगल इंफेक्शन औरर बीपी बढ़ना. अल्ट्रासाउंड में अगर एम्नियोटिक फ्लूड दिखे, बच्चे का वजन तेजी से बढ़े या बच्चा कमजोर लगे, तो तुरंत ब्लड शुगर की जांच करानी चाहिए.

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