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Harish Rana: वो एक पल… जब दिल पर पत्थर रख हरीश की मां ने किया साइन,  AIIMS ने न्यूट्रिशनल सपोर्ट भी हटाया

Harish RanaIccha Mrityu Case: सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में पैसिव यूथेनेशिया (इच्छा-मृत्यु) को मंज़ूरी दिए जाने के बाद, हरीश को AIIMS लाया गया, जहां उन्हें अब लगभग एक हफ़्ते से भर्ती किया गया है. ऐसे में चलिए जानें उनके दर्दनाक कहानी और कैसे उनकी मां ने इस फैसले को मुहर लगाई.

Written By: Shristi S
Last Updated: 2026-03-21 17:14:48

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Harish Rana Euthanasia Case: उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा की कहानी सिर्फ एक मरीज की हालत का ब्योरा नहीं, बल्कि इसके पीछे उनके 13 साल के दर्द और उनके परिवार खासतौर पर उनकी मां द्वारा लिये गए ऐसे फैसले की कहानी है, जो उन्होंने अपने दिल पर पत्थर रख कर लिया है. 
 
सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में पैसिव यूथेनेशिया (इच्छा-मृत्यु) को मंज़ूरी दिए जाने के बाद, हरीश को AIIMS लाया गया, जहां उन्हें अब लगभग एक हफ़्ते से भर्ती किया गया है. ऐसे में चलिए जानें उनके दर्दनाक कहानी और कैसे उनकी मां ने इस फैसले को मुहर लगाई.
 

14 मार्च को हरीश को AIIMS में भर्ती किया गया

हरीश को 14 मार्च को AIIMS में भर्ती किया गया था. फ़िलहाल, अस्पताल में 10 डॉक्टरों की एक टीम उनके इलाज और निगरानी में लगी हुई है; हालांकि, इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू सिर्फ़ उनकी मेडिकल देखभाल नहीं है, बल्कि वह फ़ैसला है जो उनके परिवार ने भारी मन से लिया.
 

13 साल में हरीश को ठीक करवाने के लिए हर मुमकिन कोशिश की

दरअसल, हरीश राणा पिछले 13 सालों से बिस्तर पर पड़े हैं. चंडीगढ़ में पढ़ाई के दौरान उनके साथ एक भयानक हादसा हुआ था, जब वह अपने पेइंग गेस्ट (PG) आवास की चौथी मंज़िल से गिर गए थे. उस दुखद घटना के बाद से उनकी ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई है. उनके परिवार ने उनकी सेहत ठीक करने के लिए हर मुमकिन कोशिश की अलग-अलग अस्पतालों में गए, अलग-अलग इलाज आज़माए, और कई डॉक्टरों से सलाह ली फिर भी, उनकी हालत में कोई खास सुधार नहीं हुआ.
 

हरीश की मां ने दिल पर पत्थर रख कागजों पर किये दस्तखत

लगभग 11 साल के लगातार मेडिकल इलाज के बाद, जब सारी उम्मीदें खत्म होती दिखीं, तो परिवार ने एक बेहद मुश्किल फ़ैसला लिया. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और हरीश के लिए पैसिव यूथेनेशिया की इजाज़त मांगी. इस फ़ैसले को लेने में हरीश की माँ ने सबसे ज़्यादा हिम्मत दिखाई. एक मां के लिए अपने ही बेटे के बारे में ऐसा कदम उठाना कभी आसान नहीं होता; फिर भी, उन्होंने जरूरी कागज़ों पर दस्तखत किए ताकि उनके बेटे को आखिरकार उसकी लंबी तकलीफ से छुटकारा मिल सके.
 

AIIMS में हरीश को न्यूट्रिशनल सपोर्ट से हटा दिया गया

सुप्रीम कोर्ट की मंज़ूरी के बाद, हरीश को AIIMS लाया गया, जहां डॉक्टरों की एक टीम अब तय प्रोटोकॉल के मुताबिक जरूरी कदम उठा रही है. हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, हरीश को अब न्यूट्रिशनल सपोर्ट (पोषक आहार) से हटा दिया गया है. इसके अलावा, उनके वाइटल पैरामीटर्स (शारीरिक संकेतों) की अब निगरानी नहीं की जा रही है यह एक आम प्रक्रिया है जो आमतौर पर अस्पताल के प्रोटोकॉल का एक मानक हिस्सा होती है. उनकी अंदरूनी शारीरिक हालत का पता लगाने के लिए अब खून के सैंपल भी नहीं लिए जा रहे हैं.
 
 हालांकि, सूत्रों के मुताबिक, उन्हें एक न्यूरोलॉजिकल (तंत्रिका-संबंधी) बीमारी के लिए दवा दी जा रही है, और अलग-अलग विभागों के डॉक्टर इस मामले पर पैनी नज़र रखे हुए हैं. मेडिकल टीम परिवार के साथ लगातार संपर्क में है. परिवार के सदस्य, जिनमें उनके माता-पिता, छोटा भाई और बहन शामिल हैं, हर अपडेट पर बारीकी से नज़र रखे हुए हैं; फिर भी, इस पूरी अवधि के दौरान, हरीश की मां ही सबसे ज़्यादा लगातार उनके साथ बनी हुई हैं. उनके चेहरे पर भावनाओं का एक दोहरापन झलकता है: अपने बेटे को खोने की आशंका से उपजी पीड़ा, और इस बात से मिलने वाली तसल्ली कि वह उसके कष्टों को कम करने में मदद कर रही हैं.

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Written By: Shristi S
Last Updated: 2026-03-21 17:14:48

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Harish Rana Euthanasia Case: उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा की कहानी सिर्फ एक मरीज की हालत का ब्योरा नहीं, बल्कि इसके पीछे उनके 13 साल के दर्द और उनके परिवार खासतौर पर उनकी मां द्वारा लिये गए ऐसे फैसले की कहानी है, जो उन्होंने अपने दिल पर पत्थर रख कर लिया है. 
 
सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में पैसिव यूथेनेशिया (इच्छा-मृत्यु) को मंज़ूरी दिए जाने के बाद, हरीश को AIIMS लाया गया, जहां उन्हें अब लगभग एक हफ़्ते से भर्ती किया गया है. ऐसे में चलिए जानें उनके दर्दनाक कहानी और कैसे उनकी मां ने इस फैसले को मुहर लगाई.
 

14 मार्च को हरीश को AIIMS में भर्ती किया गया

हरीश को 14 मार्च को AIIMS में भर्ती किया गया था. फ़िलहाल, अस्पताल में 10 डॉक्टरों की एक टीम उनके इलाज और निगरानी में लगी हुई है; हालांकि, इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू सिर्फ़ उनकी मेडिकल देखभाल नहीं है, बल्कि वह फ़ैसला है जो उनके परिवार ने भारी मन से लिया.
 

13 साल में हरीश को ठीक करवाने के लिए हर मुमकिन कोशिश की

दरअसल, हरीश राणा पिछले 13 सालों से बिस्तर पर पड़े हैं. चंडीगढ़ में पढ़ाई के दौरान उनके साथ एक भयानक हादसा हुआ था, जब वह अपने पेइंग गेस्ट (PG) आवास की चौथी मंज़िल से गिर गए थे. उस दुखद घटना के बाद से उनकी ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई है. उनके परिवार ने उनकी सेहत ठीक करने के लिए हर मुमकिन कोशिश की अलग-अलग अस्पतालों में गए, अलग-अलग इलाज आज़माए, और कई डॉक्टरों से सलाह ली फिर भी, उनकी हालत में कोई खास सुधार नहीं हुआ.
 

हरीश की मां ने दिल पर पत्थर रख कागजों पर किये दस्तखत

लगभग 11 साल के लगातार मेडिकल इलाज के बाद, जब सारी उम्मीदें खत्म होती दिखीं, तो परिवार ने एक बेहद मुश्किल फ़ैसला लिया. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और हरीश के लिए पैसिव यूथेनेशिया की इजाज़त मांगी. इस फ़ैसले को लेने में हरीश की माँ ने सबसे ज़्यादा हिम्मत दिखाई. एक मां के लिए अपने ही बेटे के बारे में ऐसा कदम उठाना कभी आसान नहीं होता; फिर भी, उन्होंने जरूरी कागज़ों पर दस्तखत किए ताकि उनके बेटे को आखिरकार उसकी लंबी तकलीफ से छुटकारा मिल सके.
 

AIIMS में हरीश को न्यूट्रिशनल सपोर्ट से हटा दिया गया

सुप्रीम कोर्ट की मंज़ूरी के बाद, हरीश को AIIMS लाया गया, जहां डॉक्टरों की एक टीम अब तय प्रोटोकॉल के मुताबिक जरूरी कदम उठा रही है. हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, हरीश को अब न्यूट्रिशनल सपोर्ट (पोषक आहार) से हटा दिया गया है. इसके अलावा, उनके वाइटल पैरामीटर्स (शारीरिक संकेतों) की अब निगरानी नहीं की जा रही है यह एक आम प्रक्रिया है जो आमतौर पर अस्पताल के प्रोटोकॉल का एक मानक हिस्सा होती है. उनकी अंदरूनी शारीरिक हालत का पता लगाने के लिए अब खून के सैंपल भी नहीं लिए जा रहे हैं.
 
 हालांकि, सूत्रों के मुताबिक, उन्हें एक न्यूरोलॉजिकल (तंत्रिका-संबंधी) बीमारी के लिए दवा दी जा रही है, और अलग-अलग विभागों के डॉक्टर इस मामले पर पैनी नज़र रखे हुए हैं. मेडिकल टीम परिवार के साथ लगातार संपर्क में है. परिवार के सदस्य, जिनमें उनके माता-पिता, छोटा भाई और बहन शामिल हैं, हर अपडेट पर बारीकी से नज़र रखे हुए हैं; फिर भी, इस पूरी अवधि के दौरान, हरीश की मां ही सबसे ज़्यादा लगातार उनके साथ बनी हुई हैं. उनके चेहरे पर भावनाओं का एक दोहरापन झलकता है: अपने बेटे को खोने की आशंका से उपजी पीड़ा, और इस बात से मिलने वाली तसल्ली कि वह उसके कष्टों को कम करने में मदद कर रही हैं.

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