Model Code of Conduct: चुनाव आयोग ने पांच राज्यों में ‘आदर्श आचार संहिता’ लागू करने का ऐलान कर दिया है. अब पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है. भारत में जैसे ही चुनावों का बिगुल बजता है, ‘आदर्श आचार संहिता’ लागू हो जाती है. अब सवाल यह उठता है कि आचार संहिता लागू होने के बाद राज्यों में क्या बदलाव आते हैं? इस दौरान किन कामों की अनुमति होती है और किन पर रोक लग जाती है?
ये चुनाव आयोग द्वारा बनाए गए कुछ दिशा-निर्देश हैं, जिनका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि चुनाव निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी तरीके से संपन्न हों. जैसे ही चुनाव आयोग चुनावों की तारीखों की घोषणा करता है, आचार संहिता प्रभावी हो जाती है और चुनाव परिणाम घोषित होने तक लागू रहती है. इस दौरान सरकार और राजनीतिक दलों दोनों पर ही कई तरह की पाबंदियां लगा दी जाती हैं. आइए इससे जुड़े हर पहलू को विस्तार से समझते हैं.
सत्ताधारी दल के लिए कड़े नियम
आचार संहिता का मुख्य उद्देश्य सत्ताधारी दल को अपनी शक्ति का दुरुपयोग करके मतदाताओं को अनुचित रूप से प्रभावित करने से रोकना है. इन दिशा-निर्देशों के तहत नई घोषणाओं पर रोक लगा दी जाती है. सरकार को किसी भी नई योजना, परियोजना या लोक लुभावन उपाय की घोषणा करने की मनाही होती है. शिलान्यास करने और नई सुविधाओं का उद्घाटन करने पर भी रोक लगा दी जाती है. इसका मतलब है कि इस दौरान न तो किसी नई सड़क, पुल या इमारत का शिलान्यास समारोह आयोजित किया जा सकता है और न ही उसका उद्घाटन किया जा सकता है.
आचार संहिता लागू रहने के दौरान राज्य की ‘कार्यकारी शक्ति’यानी कामकाज से जुड़ी सत्ता सरकार के हाथों से निकलकर नौकरशाही और चुनाव आयोग के हाथों में चली जाती है. यह कदम इसलिए उठाया जाता है ताकि चुनावी मैदान में उतरे सभी प्रतिभागियों को आगे बढ़ने का समान अवसर मिल सके. सरकारी तंत्र के इस्तेमाल पर भी कड़ी निगरानी रखी जाती है. मंत्रियों और राजनीतिक नेताओं को चुनाव प्रचार के लिए सरकारी वाहनों, विमानों या सरकारी बंगलों का इस्तेमाल करने की मनाही होती है. विज्ञापनों पर भी पाबंदियां लगाई जाती हैं. किसी खास राजनीतिक दल या मौजूदा सरकार की उपलब्धियों का बखान करने वाले विज्ञापनों का खर्च सरकारी खजाने से नहीं उठाया जा सकता.
तबादलों और नियुक्तियों पर रोक
चुनावों की घोषणा होने के बाद पूरा प्रशासनिक तंत्र चुनाव आयोग के पूर्ण नियंत्रण में आ जाता है. राज्य सरकार अपनी मर्जी से किसी भी अधिकारी चाहे वह IAS या IPS अधिकारी हो या फिर पुलिसकर्मी का तबादला नहीं कर सकती. यदि किसी तबादले को जरूरी माना जाता है, तो चुनाव आयोग से लिखित अनुमति लेना अनिवार्य है. सरकारी विभागों में नई भर्तियों या नियुक्तियों पर भी रोक लगा दी जाती है.
राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए नियम
धार्मिक स्थलों का उपयोग प्रतिबंधित हो जाता है. मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों, या किसी भी अन्य पूजा स्थल का उपयोग चुनाव प्रचार के लिए नहीं किया जा सकता. किसी भी उम्मीदवार को ऐसी भाषा का उपयोग करने की अनुमति नहीं है जिससे जाति, धर्म या भाषा के आधार पर तनाव भड़क सके. मालिक की पूर्व अनुमति के बिना किसी भी निजी दीवार या संपत्ति पर पोस्टर या झंडे नहीं लगाए जा सकते. किसी भी सार्वजनिक सभा या रैली आयोजित करने के लिए स्थानीय पुलिस प्रशासन से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है. जैसे ही आदर्श आचार संहिता लागू होती है, संबंधित राज्य की प्रशासनिक संरचना में पूरी तरह से बदलाव आ जाता है. मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों की शक्तियां काफी हद तक कम हो जाती हैं और वास्तविक कमान चुनाव आयोग के हाथों में चली जाती है. पुलिस और जिला कलेक्टर की भूमिकाओं और शक्तियों में भी काफी बदलाव आते हैं.
कलेक्टर और प्रशासन की भूमिका
सामान्य परिस्थितियों में जिला कलेक्टर (DM) राज्य सरकार के अधिकार के तहत काम करते हैं. हालांकि, जिस क्षण आदर्श आचार संहिता लागू होती है, वे जिला निर्वाचन अधिकारी की भूमिका निभाना शुरू कर देते हैं. उनकी रिपोर्टिंग व्यवस्था बदल जाती है. वे अब मुख्यमंत्री या मुख्य सचिव को रिपोर्ट नहीं करते, बल्कि सीधे चुनाव आयोग को रिपोर्ट करते हैं. उनकी मुख्य जिम्मेदारियों में जिले के भीतर शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करना, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVMs) की सुरक्षा करना, और चुनाव से संबंधित खर्च की निगरानी करना शामिल है. यदि कोई राजनीतिक नेता या मंत्री आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करता है, तो कलेक्टर के पास कारण बताओ नोटिस जारी करने और सार्वजनिक सभा या जमावड़े को रोकने का अधिकार होता है.