Lala Lajpat Rai Lifestory: लाला लाजपत राय, जिन्हें पंजाब केसरी (पंजाब का शेर) के नाम से भी जाना जाता था. वे एक स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक थे. उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उग्रवादी विंग के कद्दावर नेताओं में शुमार थे. लाला लाजपत राय ने 63 साल की उम्र में साइमन कमीशन का पुरजोर विरोध करते हुए उसका नेतृत्व किया था. इसी दौरान उन पर अंग्रेजों ने लाठियां बरसाई थीं. लेकिन उनका हौसला चरम था. आज उनकी बर्थ एनिवर्सरी पर जानेंगे कुछ अहम बातें.
लाला लाजपत राय का जन्म
लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी 1865 को पंजाब के धुदिके गांव में हुआ था. उन्होंने लाहौर के सरकारी महाविद्यालय में कानून की पढ़ाई की. शिक्षा के दौरान आर्य समाज के संपर्क में आने से सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर उनके दृष्टिकोण पर गहरा प्रभाव पड़ा, जिससे उन्हें भारतीय समाज के उत्थान के लिए काम करने की प्रेरणा मिली.
लाल-बाल-पाल जोड़ी की तिकड़ी ने किया कमाल
अंग्रेजों से आजादी लेने के लिए भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने कई तरीकों से उनका विरोध प्रदर्शन किया. कुछ लोग जहां शांतिपूर्ण तरीके में विश्वास रखते थे, वहीं अन्य लोगों का क्रांति के प्रति अधिक प्रत्यक्ष और उग्र दृष्टिकोण था. लाल-बाल-पाल की तिकड़ी इसी उग्र समूह का हिस्सा थे. अविभाजित पंजाब के लाला लाजपत राय, महाराष्ट्र के बाल गंगाधर तिलक और तत्कालीन संयुक्त बंगाल के बिपिन चंद्र पाल स्वदेशी आंदोलन की वकालत करने के लिए एक साथ आए थे. इन्होंने ब्रिटिश सामानों को ना खरीदने का फैसला किया था और स्वदेशी को अपनाने की कवायद की थी.
कांग्रेस से था गहरा नाता
लाला लाजपत राय का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से गहरा संबंध था और यह उनके राजनीतिक जीवन का एक अहम हिस्सा रहा. साल 1920 में कलकत्ता में हुए कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में लाला लाजपत राय को कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया. उनका यह कार्यकाल कांग्रेस के लिए एक बदलाव का दौर था, क्योंकि इसी समय पार्टी असहयोग आंदोलन की तैयारी कर रही थी, जिसने आगे चलकर आजादी की लड़ाई को नई दिशा दी. स्वदेशी आंदोलन के दौरान इस तिकड़ी (लाल-बाल-पाल) ने लोगों को स्वराज की मांग करने, देशी वस्तुओं को अपनाने और विदेशी सामान के बहिष्कार के लिए प्रेरित किया.
कैसी हुए थे शहीद?
साल 1928 में ब्रिटिश सरकार ने भारत की राजनीतिक स्थिति की जांच के लिए सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में साइमन कमीशन बनाया. इस आयोग में कोई भी भारतीय सदस्य नहीं था, इसलिए देश के सभी बड़े राजनीतिक दलों ने इसका विरोध किया और इसका बहिष्कार किया.
30 अक्टूबर 1928 को जब साइमन कमीशन लाहौर पहुँचा, तब लाला लाजपत राय ने इसके विरोध में एक शांतिपूर्ण और मौन जुलूस का नेतृत्व किया. लेकिन पुलिस ने इस जुलूस पर लाठीचार्ज कर दिया. पुलिस अधिकारी स्कॉट के आदेश पर लाला लाजपत राय को बेरहमी से पीटा गया. इस लाठीचार्ज में आई गंभीर चोटों के कारण कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो गई.
भगत सिंह ने लिया था लाला लाजपत राय की मौत का बदला
लाला लाजपत राय को बेरहमी से पीटने की घटना को भगत सिंह ने अपनी आंखों से देखा था. लाला लाजपत राय की मौत से वे बहुत आहत हुए और उन्होंने बदला लेने का संकल्प लिया. इसके बाद भगत सिंह ने अपने साथियों शिवराम राजगुरु, सुखदेव थापर और जय गोपाल के साथ मिलकर पुलिस अधिकारी स्कॉट को मारने की योजना बनाई. गलती से उन्होंने पुलिस उप अधीक्षक जे.पी. सॉन्डर्स को पहचान लिया. इसी गलत पहचान के कारण राजगुरु ने स्कॉट की जगह सॉन्डर्स को गोली मार दी. घटना के बाद सभी क्रांतिकारी पुलिस से बचने के लिए लाहौर से फरार हो गए.