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Braj Holi 2026: मथुरा-वृंदावन की लड्डूमार और लठमार होली क्या है? जानिए अनोखी परंपरा और इस साल कब मनाया जाएगा यह खास उत्सव

Lathmar Holi Kab Hai: मथुरा-वृंदावन की लड्डूमार और लठमार होली ब्रज की एक अनोखी परंपरा है, जिसमें मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं पर लड्डू और लाठियां  बरसाए जाते हैं. यह उत्सव नंदगांव और बरसाना की पारंपरिक होली से जुड़ा है. आइए जानते हैं इस बार यह उत्सव कब मनाया जाएगा और इसके पीछे की परंपरा क्या है.

Written By: Shivashakti narayan singh
Last Updated: February 11, 2026 19:04:16 IST

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Lathmar and Laddumar Holi 2026: ब्रजमंडल की होली सिर्फ एक दिन का त्योहार नहीं, बल्कि भक्ति, प्रेम और परंपरा का ऐसा उत्सव है जो बसंत पंचमी से शुरू होकर रंग पंचमी तक चलता है. मथुरा, वृंदावन, बरसाना, नंदगांव, गोकुल और बलदेव-हर स्थान की होली का अपना अलग अंदाज, अलग कथा और अलग आध्यात्मिक महत्व है. साल 2026 में भी ब्रज की गलियां राधा-कृष्ण के जयकारों, गुलाल की खुशबू और ढोल-मंजीरों की थाप से गूंज उठेंगी. आइए विस्तार से जानते हैं लड्डूमार और लठमार होली के बारे में.

ब्रज में होली का शुभारंभ बसंत पंचमी से ही मान लिया जाता है. इसी दिन से मंदिरों में गुलाल चढ़ना शुरू हो जाता है और फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की रंगभरनी एकादशी से सड़कों पर रंगोत्सव की असली रौनक दिखाई देने लगती है. राधा-कृष्ण की शोभायात्राएं, भजन-कीर्तन और अबीर-गुलाल के बीच पूरा ब्रज भक्तिरस में डूब जाता है.

कब है लड्डूमार और लठमार होली

 25 फरवरी 2026, बुधवार- लड्डू होली (बरसाना)

बरसाना की लड्डू होली में श्रद्धालुओं पर प्रसाद के रूप में लड्डू बरसाए जाते हैं. यह आयोजन राधारानी के गांव में उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है.

 26 फरवरी 2026, गुरुवार -लट्ठमार होली (बरसाना)

बरसाना की प्रसिद्ध लट्ठमार होली में महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में पुरुषों पर प्रतीकात्मक रूप से लाठियां बरसाती हैं. यह आयोजन राधा-कृष्ण की प्रेम लीला से जुड़ा माना जाता है.

 27 फरवरी 2026, शुक्रवार- लट्ठमार होली (नंदगांव)

बरसाना के बाद नंदगांव में लट्ठमार होली खेली जाती है. यहां नंदबाबा की नगरी में रंग और परंपरा का अनोखा संगम देखने को मिलता है.

लड्डू मार होली 24 फरवरी 2026 बरसाना (श्रीजी मंदिर)

बरसाना के श्रीजी मंदिर में खेली जाने वाली लड्डू मार होली की कहानी बहुत दिलचस्प है. भक्तजन इन लड्डुओं को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं.

 ब्रज की होली का धार्मिक महत्व

ब्रज को भगवान श्रीकृष्ण की लीलास्थली माना जाता है. यहां का हर वन, उपवन, कुंड और मंदिर किसी न किसी कथा से जुड़ा है.रंगभरनी एकादशी पर निकलने वाली शोभायात्रा, मंदिरों में विशेष आरती और भजनों की गूंज इस पर्व को आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान करती है.ब्रज की होली में सिर्फ रंगों का खेल नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम की अनुभूति होती है. टेसू के प्राकृतिक रंग, फूलों की वर्षा और हुरंगे की परंपरा इस उत्सव को अनोखा बनाती है. देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु इस अवसर पर ब्रज पहुंचते हैं और स्वयं को भक्ति के रंग में रंग लेते हैं.

 कैसे शुरू हुई लट्ठमार होली की अनोखी परंपरा?

लट्ठमार होली की जड़ें ब्रज की उस दिव्य प्रेम लीला में मिलती हैं, जिसका संबंध भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी से माना जाता है. मान्यता है कि द्वापर युग में  कान्हा नंदगांव से अपने सखाओं के साथ अक्सर बरसाना जाया करते थे. वहां वे राधारानी और उनकी सखियों के साथ हंसी-ठिठोली करते, रंग लगाते और उन्हें चिढ़ाते थे.कथा के अनुसार, जब यह शरारतें कुछ ज्यादा बढ़ जातीं, तो राधारानी और उनकी सखियां मिलकर श्रीकृष्ण और ग्वाल-बालों को प्रतीकात्मक रूप से लाठियों से खदेड़ती थीं. अपनी रक्षा के लिए कृष्ण और उनके सखा ढाल का सहारा लेते थे. इसी प्रेमपूर्ण नोकझोंक  को आगे चलकर ‘लट्ठमार होली’ के नाम से जाना गया.तभी से बरसाना और नंदगांव में यह अनोखी होली उत्साह के साथ निभाई जाती है. आज भी इस अवसर पर महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में लाठियां थामे नजर आती हैं, जबकि पुरुष ढाल लेकर उन्हें प्रतीकात्मक रूप से रोकते हैं. ढोल, मंजीरे और फाग के गीतों से पूरा ब्रज गूंज उठता है, और गलियों में भक्ति, परंपरा और उल्लास का अद्भुत संगम दिखाई देता है.

लट्ठमार होली के प्रमुख नियम और परंपराएं

लट्ठमार होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि ब्रज की एक सजीव सामाजिक और पारिवारिक परंपरा है. इसमें भाग लेने वालों के लिए कुछ खास रीति-रिवाजों का पालन करना आवश्यक माना जाता है.इस दिन नंदगांव के पुरुष पारंपरिक वेशभूषा धारण कर ‘सखा’ के रूप में बरसाना पहुंचते हैं. वहीं बरसाना की महिलाएं, जिन्हें राधारानी की सखियों का स्वरूप माना जाता है, प्रतीकात्मक रूप से उन पर लाठियां चलाती हैं. यह पूरी प्रक्रिया आनंद, हास्य और लोकपरंपरा से भरपूर होती है.उत्सव में शामिल पुरुषों को ‘हुरियारे’ कहा जाता है. वे अपने सिर पर पगड़ी बांधते हैं और हाथ में चमड़े की मजबूत ढाल रखते हैं, जिससे वे लाठियों की चोट से बचाव करते हैं.

बरसाने की लड्डूमार होली कैसे मनाई जाती है?

बरसाना की लड्डूमार होली ब्रज की सबसे अनोखी और आकर्षक परंपराओं में से एक मानी जाती है. यह उत्सव नंदगांव और बरसाना के पारंपरिक होली समारोह का अहम हिस्सा है. इस दिन मंदिर परिसर और गलियों में सैकड़ों किलो लड्डुओं की वर्षा की जाती है. भक्तजन इन लड्डुओं को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं और इसे अपने लिए सौभाग्य का प्रतीक मानते हैं.देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए बरसाना पहुंचते हैं. ढोल-नगाड़ों, भजन-कीर्तन और जयकारों के बीच जब लड्डुओं की बारिश होती है, तो पूरा वातावरण भक्ति और उल्लास से भर उठता है.

 लड्डूमार होली से जुड़ी प्राचीन कथा

इस परंपरा के पीछे एक रोचक पौराणिक प्रसंग बताया जाता है, जो द्वापर युग से जुड़ा है. मान्यता है कि राधारानी के पिता वृषभानु जी ने नंदगांव को होली खेलने का निमंत्रण भेजा था. नंद बाबा ने इस आमंत्रण को सहर्ष स्वीकार किया और अपने पुरोहित के माध्यम से स्वीकृति संदेश बरसाना भेजा.जब नंदगांव के पुरोहित बरसाना पहुंचे, तो उनका बड़े आदर के साथ स्वागत किया गया. उन्हें मिठाई के रूप में लड्डू परोसे गए. उसी दौरान बरसाना की गोपियों ने प्रेमपूर्वक उन पर गुलाल लगा दिया. चूंकि पुरोहित के पास रंग नहीं था, इसलिए उन्होंने थाल में रखे लड्डुओं को ही हंसी-ठिठोली में गोपियों की ओर उछालना शुरू कर दिया.कहा जाता है कि उसी घटना की स्मृति में लड्डूमार होली की परंपरा आरंभ हुई, जिसे आज भी बरसाना और नंदगांव में उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाया जाता है.

Disclaimer : प्रिय पाठक, हमारी यह खबर पढ़ने के लिए शुक्रिया. यह खबर आपको केवल जागरूक करने के मकसद से लिखी गई है. हमने इसको लिखने में सामान्य जानकारियों की मदद ली है. INDIA News इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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