Mahatirtharaj pachnad: भारत की धरती प्राचीन काल से ही ‘तपोभूमि’ रही है. यहां बड़े-बड़े ऋषि-मुनि हुए, जिन्होंने अपने तप, ज्ञान और सिद्धांतों के दम पर भारतीय संस्कृति के आध्यात्मिक और नैतिक ताने-बाने को संवारा. इसीलिए हमारे देश को ‘पुण्य भूमि’ और ‘देव भूमि’ के रूप में भी जाना जाता है. यहां की प्राचीन सभ्यता अपनी ज्ञान-आधारित गुरु-शिष्य परंपरा, शांतिप्रियता और विविधता के लिए जानी जाती है. भौगोलिक रूप से हिमालय से समुद्र तक फैली यह भूमि ज्ञान, अध्यात्म और सहिष्णुता का बोध कराती है. भारत नदियों के मामले में भी समृद्ध है. यहां गंगा और यमुना जैसी कई पवित्र नदियां बहती हैं. कुल मिलाकर यहां तमाम ऐसी जगहें हैं, जिनका प्रमाण देने की जरूरत नहीं है. फिर चाहे वो देवप्रयाग हो या फिर तीर्थराज प्रयागराज का संगम. लेकिन, क्या आप जानते हैं महा तीर्थराज का दर्जा किसको प्राप्त है? उत्तर प्रदेश वो कौन सी जगह है जहां 5 नदियों का संगम है? जानिए क्या है उसका पौराणिक इतिहास-
उत्तर प्रदेश में कहा होता है 5 नदियों का मिलन?
उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में 1, 2 या फिर 3 नहीं, 5 नदियों का संगम है. इसलिए इसे ‘पचनद’ के नाम से जाना जाता है. बता दें कि, विश्व में दो नदियों का संगम कई स्थानों पर देखा जा सकता है. तीन नदियों का दुर्लभ संगम प्रयागराज (इलाहाबाद) में है, जिसे धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है. लेकिन, इटावा का पंचनदा ऐसा अनोखा स्थान है, जहां 5 नदियां- यमुना, चंबल, क्वारी, सिंधु और पहुज का संगम होता है. इसीलिए इस स्थान को महा तीर्थराज का दर्जा मिला है.
महाभारत में पचनद का क्या इतिहास है?
जालौन और इटावा की सीमा पर पचनद का स्थान प्रकृति का अनूठा उपहार है और हिंदू धर्म से जुड़े लोगों के लिए यह आस्था का केंद्र है. वैसे तो सालभर में यहां सिर्फ एक बार मेला लगता है, लेकिन खास स्नानों के मौके पर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है. पंचनदा का महत्व सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक भी है. माना जाता है कि यह स्थान महाभारतकालीन सभ्यता से जुड़ा हुआ है और पांडवों ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय यहां बिताया था. यही नहीं, भगवान विष्णु ने भी यहां महेश्वरी की पूजा करके सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था, ऐसी मान्यता है.
पचनद कहां और कैसे पहुंचें यहां
इटावा जिला मुख्यालय से लगभग 70 किलोमीटर दूर बिठौली गांव के पास पंचनद है. आम बोलचाल में इसे पचनदा कहा जाता है. इस संगम पर स्थित महाकालेश्वर मंदिर एक प्राचीन धार्मिक स्थल है, जहां साधु-संतों का जमावड़ा लगा रहता है. इस मंदिर का इतिहास लगभग 800 ईसा पूर्व तक जाता है. इसीलिए हरिद्वार, बनारस, और प्रयागराज से साधु-संत यहां दर्शन के लिए आते हैं. बता दें कि, पंचनदा पर अथाह जल प्रवाह होता है और यहां विभिन्न प्रकार के दुर्लभ वन्यजीवों को देखा जा सकता है.
प्राचीन तपस्थली के भी साक्ष्य
इटावा के इतिहासकार रहे आलोक कुमार बताते हैं कि, इस पवित्र स्थल को अब तक अन्य तीर्थस्थलों जैसी प्रसिद्धि नहीं मिल पाई है, जिसका मुख्य कारण यहां का कठिन भौगोलिक क्षेत्र है. पंचनदा का एक और प्राचीन मंदिर बाबा मुकुंदवन की तपस्थली के रूप में जाना जाता है. कहा जाता है कि संवत 1636 के आसपास, गोस्वामी तुलसीदास यहां पहुंचे थे और बाबा मुकुंदवन ने उन्हें यमुना की तेज धार पर चलकर पानी पिलाया था.