Mumbai politics analysis: मुंबई को देश की आर्थिक राजधानी कहा जाता है. मुंबई में मराठियों के संघर्ष और संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन में शहीद हुए 106 वीरों के बलिदान को कोई कैसे भूल सकता है. आज की मुंबई उन्हीं बलिदानों की देन हैं. समय के साथ मुंबई में कई बदलाव हुए लेकिन सबसे बड़ा सवला यही है कि वहां के मराठी समुदाय का वर्तमान अस्तित्व क्या है. आज उन्हीं मराठियों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. उनके अस्तित्व जैसे भीड़ में कहीं खोता जा रहा है. आज महाराष्ट्र का आम नागरिक भी यह जानना चाहता है कि जिस धरती पर करीब 25-30 वर्षों तक मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) पर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने शासन किया, फिर भी उसी समुदाय की कंडीशन बदतर कैसे हुई? आज यह सवाल मराठी मानुष खुलकर पूछ रहा है.
कैसे बदला मुंबई का नक्शा?
एक वक्त था जब मुंबई के लालबाग, परेल, शिवड़ी, दादर और गिरगांव को यहां के ‘हृदय’ के तौर पर पहचाना जाता था. यह इलाके तभी विकसित हो पाए जब स्थानीय मजदूरों के पसीने और मराठी संस्कृति की जड़ों ने इन्हें सींचा. लेकिन, बीते ढाई दशकों में यहां पर इतना तेजी से शहरीकरण हुआ जिसमें मिलों की चिमनियां हमेशा के लिए खामोश गईं और उनकी जगह कांच के विशाल टॉवरों ने ले ली. यह कोई ऐसा परिवर्तन नहीं जिसे आसानी से भुला दिया जाए. बल्कि, इसका खामियाजा मराठी समुदाय को आज तक भुगतना पड़ रहा है. मराठियों के उस दर्द की आवाज को सुनने वाला आज कोई नहीं है, जिसे उस वक्त उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली तत्कालीन पालिका सरकार ने इन टॉवरों के निर्माण की परमिशन देकर “मराठी लोगों को वहीं घर मिलेंगे।” का वादा किया था.
मुख्य शहर से हुआ विस्थापन
लेकिन, कहते हैं ना कि राजनीति किसी की सगी नहीं होती. ऐसा ही कुछ उन स्थानीय मराठियों के साथ भी हुआ. हकीकत कुछ और ही निकली. चाहे मिल कामगारों के आवास का सवाल हो या पुनर्विकास का, मराठी लोगों को साउथ और मध्य मुंबई को छोड़कर विरार, कर्जत, कसारा और बदलापुर जैसे शहर के बाहरी इलाकों में बसने पर मजबूर होना पड़ा. यह कढ़वी हकीकत है कि जिन ‘मराठी मानुष’ के दम पर राजनीति की गई, वही चमकती राजधानी में कहीं ओझल होता जा रहा है.
मराठी ठेकेदारों ने क्या किया?
जब तक आर्थिक सशक्तिकरण नहीं हो तब तक किसी भी समाज का ग्रोथ नहीं हो सकता. अगर बात मुंबई महानगरपालिका के सालाना बजट की हो तो यह 50,000 करोड़ रुपए से ज्यादा है. अब प्रश्न यह है कि इतने बड़े बजट होने के बाद कितने मराठी उद्यमी या ठेकेदार वास्तव में उभर पाए? यह भी स्थानीय लोगों का आरोप है कि जरूरी और बेसिक जरूरतों को पूरा करने के बदले में बड़े पूंजीपतियों को साधने में ही नेता लगे रहे. अगर महानगरपालिका की सत्ता मराठी हितों के काम के लिए बनाई गई थी तो उनके नाम कहीं खोजने से भी नहीं मिलता. मराठी समाज के जानकारों का मत है कि उद्धव ठाकरे के कार्यकाल में मराठी समुदाय को मात्र ‘वड़ापाव’ और ‘भजी’ जैसे व्यवसाय तक ही सीमित कर दिया गया. बड़े आर्थिक नियंत्रण प्रभावशाली लोगों ने अपने पास रखकर मनमर्जी से काम किया.
मराठियों की भावनाओं को किया दरकिनार
शिवसेना ने राजनीतिक खेल में भावनात्मक नारे “‘मराठी मानुष’, “मराठी अस्मिता” और “मुंबई पर हमला” जैसी बातों से स्थानीय मराठियों को अपने पाले में रखा. सत्ता में रहने के बाद भी ‘मराठी अस्मिता’ पर कोई ठोस काम नहीं हुआ. अब एक नया विवाद भी उभरकर सामने आ रहा है कि मराठी शिक्षा में स्थानीय भाषा की स्थिति को दरकिनार किया जा रहा है. इसके बदले में अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ता जा रहा है. कभी जिन मराठियों का यह मुंबई हुआ करता था, वही अब इससे दूर होते जा रहे हैं. एक बार फिर से महानगरपालिका चुनाव में मराठी मानुष का नारा जोर पकड़ने लगा है. क्या इस बार फिर से वोटर्स को प्रभावित किया जा सकेगा. जिन मराठी लोगों ने पीढ़ियों तक शिवसेना पर भरोसा जताया और उसे राजनीति के सिंहासन पर विराजमान करती रही वही लोग अपने बच्चों के भविष्य, रोज़गार और अपने हक के घर का हिसाब मांग रहे हैं. देखना होगा कि आगे क्या-क्या बदलने वाला है.