Netaji Subhash Chandra Bose Birthday 23rd January: आज के दिन भारत में पराक्रम दिवस मनाया जा रहा है. यह दिवस उस नेता के लिए मनाया जा रहा है, जिसने आजादी की लड़ाई को सिर्फ नारे नहीं दिए बल्कि शक्ति, साहस, अनुसाशन और आत्मसम्मान की ताकत भी दी है. तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा, की गूंज ने सबको हिला के रख दिया था.
आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 129वीं जयंती है. पिछले साल 2025 में इस बात पर बहस छिड़ी थी कि क्या भारतीय युवाओं को सप्ताह के 70-90 घंटे के कार्य सप्ताह का पालन व्यवहारिक है.
जब इन्होंने 70-90 घंटे काम का किया समर्थन
इसका समर्थन इंफोसिस के को-फाउंडर NR नारायण मूर्ति ने 2025 की शुरुआत में किया था और इसके बाद में L&T के चेयरमैन SN सुब्रमण्यन ने भी समर्थन किया साथ ही उन्होंने रविवार को भी काम करने की वकालत की. इसके बाद ओला के संस्थापक भाविश अग्रवाल जैसे लोगों ने भी वर्क-कल्चर का समर्थन किया.
अमरा की चाह
लेकिन इससे ठीक 100 साल पहले, सन1924 में, जब सुभाष चंद्र बोस जेल से छूटे थे और ICS से इस्तीफा देकर एक युवा क्रांतिकारी के रूप में आगे आए थे. तब उन्होंने अपने लेख ‘अमरा की चाह?’ में एक बिल्कुल अलग नजरिए से पेश किया, जिसका बंगला में अनुवाद है “हम क्या चाहते हैं?”
6 घंटे से अधिक काम करने की नहीं है आवश्यकता
इसके लेख में उन्होंने यह घोषण की, कि “जीवित रहने के लिए किसी भी मनुष्य को दिन में 4 घंटे से अधिक – अधिकतम 6 घंटे से अधिक काम करने की आवश्यकता नहीं होती है. क्योंकि न केवल अपने शरीर में, बल्कि अपने विचारों, विचारधाराओं, आकांक्षाओं, सौंदर्य, प्रेम और सृजन में भी उन्हें जीवित रहना आवश्यक है. अपने जीवन के अंत तक हर पल जीवित रहना है.
उन्हें अपनी आत्मा में भी जीवित रहना आवश्यक है, और इसीलिए उन्हें अमृत की प्राप्ति करनी चाहिए। क्योंकि वे अमृत से उत्पन्न हुए हैं, अमृत के पुत्र हैं, और उनके भीतर उस अमृत की अमर इच्छा निरंतर उन्हें ‘ येनाहं नामृत स्यां किं अहं तेन कुर्याम्!’ का आह्वान करती रहती है. हम चाहते हैं कि सभी को उस अमृत का अधिकार मिले”
मतलब 100 साल पहले ही नेता जी ने इस विवाद का हल निकाल दिया था, जो आज चर्चा का विषय बना हुआ है.