Nirav Modi Case: लंदन में हाई कोर्ट ऑफ जस्टिस ने बुधवार को भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी के प्रत्यर्पण मामले को फिर से खोलने से इन्कार कर दिया. इस फैसले से यूनाइटेड किंगडम में उनके सभी कानूनी रास्ते बंद होते दिख रहे हैं और सात साल से ज्यादा समय तक ब्रिटिश हिरासत में रहने के बाद उनके भारत लौटने का रास्ता साफ हो सकता है.
यह फैसला भारत सरकार के उन आश्वासनों पर आधारित था, जो सितंबर 2025, दिसंबर 2025 और फरवरी 2026 मेेें लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग के एक ‘नोट वर्बेल’ (आधिकारिक पत्र) के जरिए दिए गए थे.
अदालत ने क्या कहा?
इस पूरे मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि अगर सरकार के ये वादे नहीं होते, तो वह अपील को फिर से खोलने पर विचार कर सकती थी. लॉर्ड जस्टिस जेरेमी स्टुअर्ट-स्मिथ और जस्टिस रॉबर्ट जे की पीठ ने इन आश्वासनों को विशिष्ट न कि सामान्य या अस्पष्ट पाया. ये आश्वासन गृह मंत्रालय के एक ऐसे अधिकारी द्वारा दिए गए थे, जो भारत सरकार, महाराष्ट्र राज्य और सभी पांच एजेंसियों को इन आश्वासनों से बांधने के लिए सक्षम था. जजों ने कहा कि ये आश्वासन सद्भावना के साथ और इस इरादे से दिए गए थे कि वे बाध्यकारी होंगे और उन्होंने यह भी जोड़ा कि ये आश्वासन उनसे बचने के इरादे से नहीं दिए गए थे.
लेकिन इस फैसले से यह साफ हो गया कि नतीजा कितना करीबी था. अदालत ने माना कि भंडारी मामले का फ़ैसला, गुनाह कबूल करवाने के लिए प्रतिबंधित तरीकों के इस्तेमाल की एक चिंताजनक तस्वीर पेश करता है, जिसे अदालत ने आम और व्यापक बताया.
सीबीआई ने क्या कहा?
2018 से नीरव मोदी के प्रत्यर्पण की कोशिश कर रही सीबीआई ने कहा कि उसके जांच अधिकारी लंदन गए थे ताकि ‘क्राउन प्रॉसिक्यूशन सर्विस’ को नीरव मोदी की अर्जी का विरोध करने में मदद कर सकें. इस पूरे मामले पर बुधवार को सीबीआई का बयान सामने आया. जिसमें कहा गया कि भंडारी मामले के फैसले से खड़ी हुई चुनौती को लगातार और समन्वित प्रयासों के ज़रिए सफलतापूर्वक पार पा लिया गया है.
लंदन की अदालत में पेश हुए नीरव मोदी
बुधवार को एक अलग घटनाक्रम में नीरव मोदी लंदन की एक अदालत में पेश हुए. यह अदालत ‘बैंक ऑफ़ इंडिया’ द्वारा दायर एक अर्जी पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें बैंक ने भगोड़े कारोबारी द्वारा दी गई एक निजी गारंटी को भुनाने की मांग की थी. यह गारंटी करोड़ों डॉलर की एक ऋण सुविधा से जुड़ी हुई थी. अदालत ने अपने आदेश में यह बात नोट की कि भारत ने इस बात पर कोई आपत्ति नहीं जताई कि भंडारी के निष्कर्ष नीरव मोदी पर भी लागू होते हैं. भारत ने अपना पूरा मामला केवल दी गई आश्वासनों की गुणवत्ता पर ही आधारित रखा और अदालत ने इस दृष्टिकोण को स्वीकार कर लिया.
अदालत ने कहा कि यूके और भारत के बीच द्विपक्षीय संबंध, इस मामले की हाई-प्रोफाइल प्रकृति और पिछले आश्वासनों के तहत नीरव मोदी को वकीलों और मेडिकल टीम तक रोजाना पहुंच की गारंटी, ये सभी बातें भारत के पक्ष में जाती हैं. भले ही नए आश्वासनों की औपचारिक रूप से निगरानी न की जाए. अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि हालांकि भारत ‘यातना के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन’ (UN Convention Against Torture) का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, फिर भी अदालत इस बात से संतुष्ट थी कि भारतीय कानून के तहत यातना की अनुमति नहीं है.