Racing The Journey Of India Most Iconic Attire: भारत में साड़ी को सिर्फ एक कपड़ा नहीं बल्कि यह एक भावना, एक परंपरा और जीवित इतिहास का एक हिस्सा माना जाता है. सदियों से यह छह से नौ गज का कपड़ा ग्रेस, एलिगेंस और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक रहा है. भारत की प्राचीन मूर्तियों से लेकर आज के रेड कार्पेट तक साड़ी ने समय, भूगोल और संस्कृतियों की यात्रा की हैं.
साड़ी का इतिहास 5,000 साल से भी पहले सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ा है. प्राचीन मूर्तियों, भित्ति चित्रों और ग्रंथों में महिलाओं को बिना सिले कपड़े के एक ही टुकड़े में लिपटा हुआ दिखाया गया है. जो आज की साड़ी का शुरुआती रूप था. मूल रूप से कपास से बनी साड़ियां हाथ से बुनी जाती थीं और अक्सर प्राकृतिक रंगों से रंगी जाती थीं, जो भारत के क्षेत्रों की जीवंत सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती थीं.
भारतीय राज्यों में साड़ी
भारत के हर राज्य की साड़ी की अपनी अलग पहचान है. उत्तर प्रदेश की बनारसी सिल्क – शाही और सजी-धजी, सोने और चांदी के धागों से बुनी हुई साड़ी पूरी दुनिया में फेमस है. वहीं, तमिलनाडु की कांजीवरम मंदिर से प्रेरित डिज़ाइन वाली रिच सिल्क को कोई कैसे भूल सकता है. साथ ही गुजरात और राजस्थान की बांधनी टाई-डाई पैटर्न जो कहानियां कहते हैं. केरल की कसावु पारंपरिक मौकों के लिए आइवरी और सोने की एलिगेंस अलग ही वाइव देता है.
सरहदों के पार साड़ी
साड़ी सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि अन्य देशों में भी काफी पहनी जाती है. भारत से प्रेरणा लेकर विदेशी महिलाओं ने भी इसे खूब सराहा है. श्रीलंका में साड़ी (जिसे कैंडीयन कहा जाता है) को खास मौकों पर अनोखे तरीके से पहना जाता है. बांग्लादेश में जामदानी साड़ी हथकरघा कला का एक मास्टरपीस है. नेपाल में शादियों और त्योहारों में साड़ी को क्षेत्रीय गहनों के साथ पहना जाता है. यहां तक कि यूके, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे पश्चिमी देशों में भी दिवाली, शादियों और सांस्कृतिक त्योहारों के दौरान साड़ी को सेलिब्रेट किया जाता है, जो एक ग्लोबल स्टाइल स्टेटमेंट बन गई है.
आधुनिक फैशन में साड़ी
आज, साड़ियां सिर्फ़ पारंपरिक पहनावे तक सीमित नहीं हैं. डिज़ाइनरों और ब्रांडों ने उन्हें शिफॉन, ऑर्गेंज़ा, जॉर्जेट और यहां तक कि डेनिम में भी फिर से बनाया है. जो ड्रेपिंग स्टाइल हैं जो युवा पीढ़ी को पसंद आते हैं. बॉलीवुड सेलिब्रिटी, फैशन इन्फ्लुएंसर और ग्लोबल आइकन अंतरराष्ट्रीय रनवे पर साड़ियों को ट्रेंड बना रहे हैं.
‘साड़ी’ शब्द का विकास
‘साड़ी’ शब्द प्राचीन संस्कृत शब्द ‘सत्तिका‘ से आया है, जिसका अर्थ है महिलाओं द्वारा पहना जाने वाला कपड़े का एक टुकड़ा. समय के साथ यह प्राकृत और पाली भाषाओं से होते हुए ‘सती’ बना और अंत में ‘साड़ी’ हो गया. ऋग्वेद (3000 ईसा पूर्व) जैसे ग्रंथों में साड़ियों का उल्लेख है, जो उनके प्राचीन सांस्कृतिक महत्व को दर्शाता है. शुरुआती मूर्तियों और कला में, साड़ियों को अनोखे तरीकों से लपेटा जाता था, जिसमें ओडिसी फिशटेल ड्रेपिंग भी शामिल थी, जिससे नाचने या अनुष्ठानों जैसी गतिविधियों में आसानी से घूमने-फिरने में मदद मिलती थी.
मुगल काल: जटिल सजावट का आगमन
मुगल काल (16वीं से 18वीं शताब्दी) ने साड़ी फैशन में महत्वपूर्ण बदलाव लाए. शुरुआत में पहले की साड़ी शैलियों में शरीर के ज़्यादा दिखने से असहज होने के कारण मुगलों ने ऐसे डिज़ाइनों को बढ़ावा दिया जो ब्लाउज या चोली से ऊपरी शरीर को ढकते थे. इस दौर में इन चीज़ों का आगमन हुआ:
विस्तृत कढ़ाई
ज़री का काम (सोने और चांदी के धागे)
फारसी और मध्य एशियाई प्रभावों से प्रेरित समृद्ध सजावट और मोटिफ
ब्रिटिश काल: आधुनिक साड़ी का जन्म
ब्रिटिश शासन (18वीं से 20वीं शताब्दी) के तहत नई रंगाई, छपाई और बुनाई के तरीके बदले गए. कपड़ों का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया गया और भारतीय साड़ियों का वैश्विक निर्यात संभव हुआ. इस अवधि के दौरान साड़ियां राष्ट्रीय पहचान और आधुनिक फैशन दोनों का प्रतीक बन गईं. प्रसिध्दि के तौर पर वाराणसी (उत्तर प्रदेश) की बनारसी साड़ी काफी फेमस है. इसके साथ बारीक रेशम, सोना/चांदी की ज़री, विस्तृत ब्रोकेड वाली तमिलनाडु की कांचीवरम साड़ी बहुत पसंद किया जाता है. इसमें समृद्ध रेशम, मंदिर के बॉर्डर, जीवंत रंग बने होते हैं. वहीं, केरल की कसावु साड़ी में सुनहरे बॉर्डर वाली ऑफ-व्हाइट सूती, महाराष्ट्र में पैठणी साड़ी पर मोर, कमल के मोटिफ, हाथ से बुना हुआ रेशम यूज होता है.
मध्य प्रदेश की चंदेरी अपनी हल्की बनावट (Sheer texture) के लिए भी विश्वभर में जानी जाती है. तो वहीं, दूसरी तरफ सूती और रेशम के मिश्रण से बनी यह साड़ी गर्मियों के लिए बेहतरीन और दिखने में राजसी होती है. बंगाल में टांट साड़ी को हल्की सूती, बोल्ड बॉर्डर और ओडिशा की संबलपुरी साड़ी भी बहुत फेमस है. अन्य राज्यों में तेलंगाना की पोचमपल्ली साड़ी पर ज्यामितीय इकत डिजाइन, चमकीले रंग, राजस्थान की कोटा डोरिया साड़ी पर चेक वाले पैटर्न, हल्का सूती-रेशम मिश्रण से तैयार होती है.