Super El Nino kya hai: प्रशांत महासागर में अभी जो एल नीनो बन रहा है, वह इस साल दुनिया के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह एल नीनो बहुत ज़्यादा शक्तिशाली हो सकता है, जिससे मौसम के पैटर्न बदल सकते हैं और कई देशों में सूखा, बाढ़ और लू चल सकती है. वैज्ञानिकों के अनुसार, प्रशांत महासागर में तापमान तेज़ी से बढ़ रहा है, जो एल नीनो की शुरुआत का संकेत है.
यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट्स (ECMWF) के ताज़ा अनुमानों के मुताबिक, इस साल ‘सुपर एल नीनो’ बनने की बहुत ज़्यादा संभावना है.
मौसम में होगा बड़ा बदलाव
अगर ऐसा होता है तो यह सिर्फ मौसम में एक छोटा-मोटा बदलाव नहीं होगा. बल्कि इसके असर कई सालों तक रह सकते हैं. इस पूरे मामले पर विशेषज्ञों का कहना है कि इसका असर 2027 तक वैश्विक तापमान को बढ़ा सकता है. एल नीनो तब बनता है जब प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों का पानी सामान्य से ज़्यादा गर्म हो जाता है. भले ही यह बदलाव छोटा सा लगे, लेकिन यह हवा की दिशा, बारिश के पैटर्न और पूरे वैश्विक मौसम तंत्र में बड़े बदलाव लाता है.
क्या होता है एल नीनो?
जब समुद्र का तापमान सामान्य स्तर से लगभग 2 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा बढ़ जाता है तो इस घटना को सुपर एल नीनो कहा जाता है. ऐसी तेज एल नीनो की घटनाएं लगभग हर 10 से 15 साल में एक बार होती हैं. लेकिन जब वे आती हैं तो उनका असर कहीं ज्यादा गहरा और लंबे समय तक रहने वाला होता है. मौजूदा जलवायु मॉडल बताते हैं कि तापमान उन स्तरों तक पहुंच सकता है, जो 1997-98 और 2015-16 जैसी बड़ी एल नीनो घटनाओं के दौरान देखे गए थे.
इसके अलावा, कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि यह पिछली सदी की सबसे शक्तिशाली एल नीनो घटनाओं में से एक साबित हो सकती है. हालांकि, कोई भी दो एल नीनो की घटनाएं एक जैसी नहीं होतीं और उनके असर अलग-अलग क्षेत्रों में एलग-एलग तरह से दिखते हैं.
भारत और दुनिया पर क्या असर पड़ेगा?
भारत के लिए मुख्य चिंता मॉनसून के मौसम को लेकर है. एक मज़बूत एल नीनो के दौरान बारिश अक्सर कम या अनियमित होती है. खासकर उत्तरी और मध्य भारत में कम बारिश हो सकती है. जिससे खेती की पैदावार पर असर पड़ सकता है. इसके अलावा, इन क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ सकता है.
इसके अलावा, अगर दुनिया की बात करें तो दक्षिण-पूर्व एशिया और कैरिबियन के कुछ हिस्सों में सूखा और बहुत ज़्यादा गर्मी पड़ सकती है. इसके विपरीत दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर पेरू और इक्वाडोर जैसे देशों में भारी बारिश और बाढ़ का खतरा काफ़ी बढ़ जाता है. इसके अलावा, प्रशांत महासागर में चक्रवात और तूफ़ान बढ़ सकते हैं, जबकि अटलांटिक महासागर में तूफ़ानों की संख्या कम हो सकती है.