सुप्रीम कोर्ट ने WhatsApp को लगाई फटकार
क्या है WhatsApp की ओर से दलील?
बेंच ने कहा कि आप इस देश के संवैधानिक मूल्यों का मज़ाक उड़ा रहे हैं. हम इसे तुरंत खारिज कर देंगे. आप इस तरह लोगों की प्राइवेसी के अधिकार के साथ कैसे खेल सकते हैं? WhatsApp की ओर से पेश हुए सीनियर वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि यूज़र्स को ऑप्ट आउट करने या प्लेटफॉर्म को मेटा कंपनियों के साथ अपना पर्सनल डेटा शेयर करने से रोकने का विकल्प दिया गया था. हालांकि, कोर्ट ने बताया कि ऑप्ट-आउट पॉलिसी बहुत तकनीकी और ज़्यादातर नागरिकों के लिए समझना मुश्किल है और उपभोक्ताओं को असल में अपना पर्सनल डेटा शेयर करने के लिए मजबूर किया जा रहा था.
सुप्रीम कोर्ट ने पूछ ग्राहक के पास क्या विकल्प है?
कोर्ट ने मेटा के इस दावे को भी खारिज कर दिया कि WhatsApp एक मुफ्त सेवा है, और इसके बजाय कहा कि यूज़र्स अपने डेटा से भुगतान करते हैं. इसमें कहा गया था कि हमारा डेटा आपके प्रोडक्ट के लिए छिपा हुआ चार्ज है. सुप्रीम कोर्ट ने मेटा को यह तक कह दिया की अगर तुम अपनी पॉलिसी नहीं बदल सकते, तो भारत से निकल जाओं.
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने क्या कहा?
जबकि मेटा और WhatsApp ने NCLAT के सामने इस ऑर्डर को चुनौती दी, अपीलेट ट्रिब्यूनल ने जनवरी 2025 में पेनल्टी और CCI के डेटा शेयरिंग पर पांच साल के बैन दोनों पर रोक लगा दी, यह कहते हुए कि बैन से WhatsApp के फ्री-टू-यूज़ बिज़नेस मॉडल में दिक्कत आ सकती है. नवंबर 2025 में दिए गए अपने फ़ाइनल फ़ैसले में, NCLAT ने WhatsApp के पक्ष में आंशिक फ़ैसला सुनाया और CCI की इस बात को खारिज कर दिया कि मेटा ने मैसेजिंग में अपने दबदबे का इस्तेमाल अपने ऑनलाइन एडवरटाइजिंग बिज़नेस को बचाने के लिए किया था, लेकिन उसने ₹213.14 करोड़ की पेनल्टी को बरकरार रखा. CCI की एक स्पष्टीकरण याचिका पर, NCLAT ने बाद में रेगुलेटर के यूज़र-चॉइस सेफ़गार्ड्स को बहाल कर दिया और WhatsApp को सुधारात्मक निर्देशों का पालन करने के लिए तीन महीने का समय दिया.