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West Bengal Election 2026: जब एक कम्युनिस्ट नेता के कदमों में थी दिल्ली की सत्ता, फिर क्यों पीछे हट गए ज्योति बसु?

West bengal election 2026: पीएम की कुर्सी सामने थी, पर उन्होंने पार्टी के आदर्शों को चुना. जानिए ज्योति बसु के उस एक फैसले की कहानी, जिसे उन्होंने खुद 'ऐतिहासिक भूल' करार दिया था.

Written By: Shivani Singh
Last Updated: 2026-03-31 21:51:52

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Jyoti Basu Biography: भारतीय राजनीति में कुछ कहानियां सत्ता के संघर्ष से नहीं, बल्कि सिद्धांतों के त्याग से बनती हैं. यह कहानी एक ऐसे नेता की है, जिसे देश की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठने का अवसर मिला लेकिन अपनी पार्टी के निर्देश के आगे उन्होंने उसे ठुकरा दिया. इसी निर्णय ने ज्योति बसु को राजनीति के नैतिक शिखर पर स्थापित कर दिया.

लंदन से लाल झंडे तक का सफर

8 जुलाई 1914 को कोलकाता के एक समृद्ध परिवार में जन्मे ज्योति बसु के पिता एक प्रतिष्ठित डॉक्टर थे. उच्च शिक्षा के लिए वे लंदन गए जहां उन्होंने मार्क्सवादी विचारधारा को करीब से समझा. 1940 में भारत लौटने पर उनके सामने एक सफल वकील बनने का रास्ता खुला था लेकिन उन्होंने अदालतों के बजाय मजदूर बस्तियों और खेतों का रुख किया. उन्होंने बैरिस्टर की आरामदायक जिंदगी त्याग कर अपना जीवन गरीबों और शोषितों के संघर्ष को समर्पित कर दिया.

संघर्ष और सत्ता का संगम

1964 में कम्युनिस्ट आंदोलन के विभाजन के समय उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का साथ चुना. आपातकाल के दौरान उन्होंने लोकतंत्र के पक्ष में मुखर होकर आवाज उठाई. 1977 में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सत्ता में आया और ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने. इसके बाद उन्होंने जो इतिहास रचा, वह बेमिसाल था. वे लगातार 23 साल तक इस पद पर बने रहे. उनके शासन की सबसे बड़ी पहचान ‘ऑपरेशन बर्गा’ (भूमि सुधार) थी जिसने लाखों गरीब किसानों को जमीन का अधिकार दिया. साथ ही उन्होंने पंचायत व्यवस्था को मजबूत कर लोकतंत्र को गांवों तक पहुंचाया.

वह एक ऐतिहासिक भूल

साल 1996 में भारतीय राजनीति एक अनिश्चित दौर से गुजर रही थी. आम चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला. भाजपा और कांग्रेस सत्ता से बाहर थीं और ‘संयुक्त मोर्चा’ सरकार बनाने की स्थिति में था. वी.पी. सिंह से लेकर हरकिशन सिंह सुरजीत तक सभी की पहली पसंद ज्योति बसु थे. ज्योति बसु इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए तैयार थे लेकिन उनकी पार्टी (CPM) की केंद्रीय समिति ने निर्णय लिया कि वे सरकार में शामिल नहीं होंगे. एक अनुशासित कार्यकर्ता की तरह ज्योति बसु ने बिना किसी विरोध के पार्टी के फैसले को स्वीकार कर लिया. बाद में उन्होंने स्वयं इस फैसले को ऐतिहासिक भूल कहा, क्योंकि उनका मानना था कि यह देश की सेवा का एक बड़ा अवसर था जिसे उन्होंने गंवा दिया गया.

एक व्यावहारिक और धर्मनिरपेक्ष छवि

ज्योति बसु केवल सिद्धांतवादी नहीं बल्कि व्यावहारिक नेता भी थे उन्होंने पश्चिम बंगाल में औद्योगिक निवेश को बढ़ावा दिया. 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जब देश के कई हिस्सों में दंगे भड़के तब उनके कड़े प्रशासन के कारण बंगाल में शांति बनी रही. उनका निजी जीवन अनुशासन और सादगी की मिसाल था. वे अपनी आय का बड़ा हिस्सा पार्टी को दे देते थे.  वर्ग-त्याग का वे जीवंत उदाहरण थे, एक उच्च वर्ग में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने खुद को पूरी तरह आम जनता के साथ मिला लिया था.

जब बाल-बाल बचे थे ज्योति बसु 

ज्योति बसु आज ही के दिन 31 मार्च 1970 को पटना रेलवे स्‍टेशन पर हुए एक हमले में वह बाल-बाल बचे थे. दिल्ली एक्सप्रेस से उतरते समय फायरिंग हुई थी. इस दौरान उन्हें बचाने में एक सीपीआई (एम) कार्यकर्ता अली इमाम गोली लगने से शहीद हो गए.  हमलावर ने बहुत करीब से देसी रिवॉल्वर से गोली चलाई थी लेकिन ऐन मौके पर हाथ कांपने के कारण निशाना चूक गया.  पुलिस ने इस मामले में सुरेंद्र प्रसाद नाम के एक संदिग्ध को हिरासत में लिया था. इसके बाद 1971 में जब पश्चिम बंगाल में चुनाव हुए तो सीपीआई-एम सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई. इस जीत के बाद भी ज्योति बसु ने सरकार बनाने से मना कर दिया और राज्‍य में राष्‍ट्रपति शासन लगा दिया गया.

विरासत

साल 2000 में उन्होंने स्वेच्छा से मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया। 17 जनवरी 2010 को उनके निधन के बाद भी उनकी सेवा की भावना खत्म नहीं हुई. उन्होंने अपना शरीर मेडिकल रिसर्च के लिए दान कर दिया। ज्योति बसु प्रधानमंत्री तो नहीं बने लेकिन उन्होंने जो सम्मान हासिल किया, वह दुर्लभ है। उनकी विरासत हमें सिखाती है कि राजनीति केवल सत्ता पाने का माध्यम नहीं, बल्कि सिद्धांतों और अनुशासन का क्षेत्र है। वे इस बात के प्रमाण हैं कि इतिहास में नाम केवल पद से नहीं, बल्कि सही समय पर लिए गए कठिन निर्णयों से बनता है।

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Written By: Shivani Singh
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Jyoti Basu Biography: भारतीय राजनीति में कुछ कहानियां सत्ता के संघर्ष से नहीं, बल्कि सिद्धांतों के त्याग से बनती हैं. यह कहानी एक ऐसे नेता की है, जिसे देश की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठने का अवसर मिला लेकिन अपनी पार्टी के निर्देश के आगे उन्होंने उसे ठुकरा दिया. इसी निर्णय ने ज्योति बसु को राजनीति के नैतिक शिखर पर स्थापित कर दिया.

लंदन से लाल झंडे तक का सफर

8 जुलाई 1914 को कोलकाता के एक समृद्ध परिवार में जन्मे ज्योति बसु के पिता एक प्रतिष्ठित डॉक्टर थे. उच्च शिक्षा के लिए वे लंदन गए जहां उन्होंने मार्क्सवादी विचारधारा को करीब से समझा. 1940 में भारत लौटने पर उनके सामने एक सफल वकील बनने का रास्ता खुला था लेकिन उन्होंने अदालतों के बजाय मजदूर बस्तियों और खेतों का रुख किया. उन्होंने बैरिस्टर की आरामदायक जिंदगी त्याग कर अपना जीवन गरीबों और शोषितों के संघर्ष को समर्पित कर दिया.

संघर्ष और सत्ता का संगम

1964 में कम्युनिस्ट आंदोलन के विभाजन के समय उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का साथ चुना. आपातकाल के दौरान उन्होंने लोकतंत्र के पक्ष में मुखर होकर आवाज उठाई. 1977 में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सत्ता में आया और ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने. इसके बाद उन्होंने जो इतिहास रचा, वह बेमिसाल था. वे लगातार 23 साल तक इस पद पर बने रहे. उनके शासन की सबसे बड़ी पहचान ‘ऑपरेशन बर्गा’ (भूमि सुधार) थी जिसने लाखों गरीब किसानों को जमीन का अधिकार दिया. साथ ही उन्होंने पंचायत व्यवस्था को मजबूत कर लोकतंत्र को गांवों तक पहुंचाया.

वह एक ऐतिहासिक भूल

साल 1996 में भारतीय राजनीति एक अनिश्चित दौर से गुजर रही थी. आम चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला. भाजपा और कांग्रेस सत्ता से बाहर थीं और ‘संयुक्त मोर्चा’ सरकार बनाने की स्थिति में था. वी.पी. सिंह से लेकर हरकिशन सिंह सुरजीत तक सभी की पहली पसंद ज्योति बसु थे. ज्योति बसु इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए तैयार थे लेकिन उनकी पार्टी (CPM) की केंद्रीय समिति ने निर्णय लिया कि वे सरकार में शामिल नहीं होंगे. एक अनुशासित कार्यकर्ता की तरह ज्योति बसु ने बिना किसी विरोध के पार्टी के फैसले को स्वीकार कर लिया. बाद में उन्होंने स्वयं इस फैसले को ऐतिहासिक भूल कहा, क्योंकि उनका मानना था कि यह देश की सेवा का एक बड़ा अवसर था जिसे उन्होंने गंवा दिया गया.

एक व्यावहारिक और धर्मनिरपेक्ष छवि

ज्योति बसु केवल सिद्धांतवादी नहीं बल्कि व्यावहारिक नेता भी थे उन्होंने पश्चिम बंगाल में औद्योगिक निवेश को बढ़ावा दिया. 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जब देश के कई हिस्सों में दंगे भड़के तब उनके कड़े प्रशासन के कारण बंगाल में शांति बनी रही. उनका निजी जीवन अनुशासन और सादगी की मिसाल था. वे अपनी आय का बड़ा हिस्सा पार्टी को दे देते थे.  वर्ग-त्याग का वे जीवंत उदाहरण थे, एक उच्च वर्ग में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने खुद को पूरी तरह आम जनता के साथ मिला लिया था.

जब बाल-बाल बचे थे ज्योति बसु 

ज्योति बसु आज ही के दिन 31 मार्च 1970 को पटना रेलवे स्‍टेशन पर हुए एक हमले में वह बाल-बाल बचे थे. दिल्ली एक्सप्रेस से उतरते समय फायरिंग हुई थी. इस दौरान उन्हें बचाने में एक सीपीआई (एम) कार्यकर्ता अली इमाम गोली लगने से शहीद हो गए.  हमलावर ने बहुत करीब से देसी रिवॉल्वर से गोली चलाई थी लेकिन ऐन मौके पर हाथ कांपने के कारण निशाना चूक गया.  पुलिस ने इस मामले में सुरेंद्र प्रसाद नाम के एक संदिग्ध को हिरासत में लिया था. इसके बाद 1971 में जब पश्चिम बंगाल में चुनाव हुए तो सीपीआई-एम सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई. इस जीत के बाद भी ज्योति बसु ने सरकार बनाने से मना कर दिया और राज्‍य में राष्‍ट्रपति शासन लगा दिया गया.

विरासत

साल 2000 में उन्होंने स्वेच्छा से मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया। 17 जनवरी 2010 को उनके निधन के बाद भी उनकी सेवा की भावना खत्म नहीं हुई. उन्होंने अपना शरीर मेडिकल रिसर्च के लिए दान कर दिया। ज्योति बसु प्रधानमंत्री तो नहीं बने लेकिन उन्होंने जो सम्मान हासिल किया, वह दुर्लभ है। उनकी विरासत हमें सिखाती है कि राजनीति केवल सत्ता पाने का माध्यम नहीं, बल्कि सिद्धांतों और अनुशासन का क्षेत्र है। वे इस बात के प्रमाण हैं कि इतिहास में नाम केवल पद से नहीं, बल्कि सही समय पर लिए गए कठिन निर्णयों से बनता है।

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