जम्मू-कश्मीरः जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में पीर पंजाल इलाके के नाम और पहचान को लेकर संग्राम छिड़ा है. केंद्रशासित राज्य में नेता प्रतिपक्ष (भाजपा) सुनील शर्मा ने ‘पीर पंजाल’ क्षेत्र के अस्तित्व को नकारते हुए इसे ‘पांचाल देव’ पर्वत श्रृंखला करार दिया है. इसके बाद से अब नया बवाल खड़ा हो गया. लोग भी इस मसले पर अपना-अपना तर्क देने में जुट गए हैं. आखिर पूरा माजरा क्या है, पढ़िए नया विवाद क्या है और क्यों शुरू हुआ?
एक साक्षात्कार में पीर पंजाल क्षेत्र में राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एनएलयू) की मांग के बारे में पूछे जाने पर भाजपा नेता सुनील शर्मा ने कहा कि उन्होंने यह नाम किसी भी शब्दकोश में नहीं सुना है और ऐसा कोई क्षेत्र (खित्ता) मौजूद नहीं है. उन्होंने दावा किया कि इस क्षेत्र को चंद्रभागा के नाम से जाना जाता है.
‘पीर पंजाल’ व ‘पांचाल देव’ में क्या अंतर है?
भौगोलिक रूप से यह हिमालय की एक पर्वत श्रेणी है. मुस्लिम प्रभाव और सूफी परंपराओं के कारण इसे ‘पीर (संत) पंजाल’ कहा जाने लगा. वहीं, शर्मा का तर्क है कि प्राचीन ग्रंथों में इसे ‘पांचाल देव स्थान’ कहा गया है, जो राजौरी, अनंतनाग और शोपियां तक फैला है. प्राचीन काल में इसे ‘पांचालधारा’ भी कहा जाता था.
इसके अलावा, पीर पंजाल क्षेत्र के नामकरण के बारे में कहा जाता है कि ‘पीर’ का अर्थ प्राचीन डोगरी भाषा में ‘पहाड़’ होता है. कश्मीरी भाषा में इसका समानार्थी शब्द है- ‘पंतसाल’. दोनों को मिलाकर और थोड़ा सा ‘बिगाड़कर’ इस इलाके को पीर पंजाल कहा जाने लगा.
राजौरी और पुंछ के लोग क्यों नाराज हैं?
पीर पंजाल श्रेणी के दक्षिण में स्थित राजौरी और पुंछ के लोग इसे अपनी पहचान मानते हैं. उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी और अन्य विधायकों का कहना है कि यहां के लोगों ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और सीमा सुरक्षा में बड़ी कुर्बानियां दी हैं. नाम को नकारना उनकी पहचान का अपमान है. सीएम उमर अब्दुल्ला ने कहा कि किसी पूरे क्षेत्र की पहचान पर सवाल उठाना गलत है.
क्या यह सिर्फ नाम की लड़ाई है या कुछ और?
प्रशासनिक कारण भी हैं. पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने हाल ही में राजौरी-पुंछ और चिनाब घाटी के लिए अलग प्रशासनिक संभाग बनाने की मांग की थी. भाजपा इसका विरोध कर रही है, क्योंकि वह जम्मू-कश्मीर को अखंड प्रशासनिक इकाई मानती है. राजनीतिक विश्लेषक नसीर गनई कहते हैं, ‘पीर पंजाल शब्द दशकों से सरकारी दस्तावेजों और जनमानस में रच-बस गया है. इसे नकारना भाषाई और क्षेत्रीय पहचान को लेकर टकराव पैदा करेगा.’