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Sovereign Wealth Fund: क्या है सॉवरेन वेल्थ फंड, ईरान-इजरायल युद्ध के बीच अरब देशों का सरकारी पैसा भारत को बनाएगा सुपरपावर?

Iran-Israel War Impact: ईरान-इजरायल तनाव के बीच भारत के लिए आई बड़ी खबर! आखिर क्यों अरब देशों की अरबों की 'तिजोरी' भारत का रुख कर रही है? इस निवेश के पीछे का असली खेल यहां समझिये...

Written By: Shivani Singh
Last Updated: 2026-03-16 21:30:19

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Sovereign Wealth Fund: मिडल ईस्ट में छिड़ी जंग के बीच दुनिया भर के बाजारों में हलचल होना लाजिमी है. ऐसी स्थिति में खाड़ी देशों के सॉवरेन वेल्थ फंड्स (SWF) यानी ‘सरकारी धन कोष’ अपनी निवेश रणनीति को फिर से परख सकते हैं. भारत के लिए यह खबर इसलिए अहम है क्योंकि हमारा टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर इन फंड्स की पहली पसंद रहा है. आइए समझते हैं कि ये सरकारी फंड काम कैसे करते हैं और भारत इनके लिए इतना खास क्यों है?

आखिर क्या होते हैं ये सरकारी धन कोष?

सॉवरेन वेल्थ फंड्स यानी सरकारी धन कोष, सीधे शब्दों में कहें तो यह किसी देश की सरकार की ‘तिजोरी’ की तरह है. जिन देशों के पास तेल या प्राकृतिक संसाधनों से खूब पैसा आता है या जिनका विदेशी मुद्रा भंडार बहुत ज्यादा है, वे इस अतिरिक्त पैसे को भविष्य के लिए निवेश करते हैं. ये फंड मुख्य रूप से पांच तरह के होते हैं:

  • बचत निधि: जैसे नॉर्वे का पेंशन फंड, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए पैसा बचाता है.
  • स्थिरीकरण निधि: जो बजट को तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से बचाती है.
  • पेंशन आरक्षित निधि: जैसे कनाडा का फंड, जो रिटायरमेंट की देनदारियों के लिए होता है.
  • रणनीतिक विकास निधि: जो देश के मुख्य उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए निवेश करती है.
  • आरक्षित निवेश निधि: जो बेहतर मुनाफे के लिए विदेशी मुद्रा का पुनर्निवेश करती है.

इन फंड्स की सबसे बड़ी खासियत इनका धैर्य है. इन्हें तुरंत पैसे की जरूरत नहीं होती, इसलिए ये 10 से 20 साल लंबी परियोजनाओं (जैसे सड़क, बिजली घर या पुल) में पैसा लगाने से नहीं हिचकिचाते.

पेंशन फंड से कितने अलग हैं ये?

पेंशन फंड को हमेशा यह चिंता रहती है कि उन्हें एक तय समय के बाद लोगों को पेंशन बांटनी है, इसलिए वे सुरक्षित जगहों पर निवेश करते हैं. इसके उलट, SWF के पास ज्यादा आजादी और लचीलापन होता है. वे जोखिम उठाकर ऊंचे मुनाफे वाली प्राइवेट इक्विटी या बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में लंबे समय तक टिके रह सकते हैं.

भारत में इनका बढ़ता दबदबा

भारत आज इन ग्लोबल फंड्स के लिए निवेश का एक बड़ा केंद्र बन चुका है. हमारे हवाई अड्डों, मोबाइल टावरों और रिन्यूएबल एनर्जी (सौर और पवन ऊर्जा) में इन फंड्स ने बड़ी हिस्सेदारी खरीदी है. आंकड़ों की बात करें तो साल 2025 में इन फंड्स ने भारतीय कंपनियों में करीब 5.7 अरब डॉलर लगाए हैं. कुल निवेश की बात करें तो 2026 की शुरुआत तक भारत में इन फंड्स की कुल संपत्ति लगभग 57 अरब डॉलर तक पहुंच गई है.

टैक्स की छूट और निवेश के नियम

भारत सरकार ने इन फंड्स को आकर्षित करने के लिए नियमों को काफी सरल बनाया है. आयकर अधिनियम की धारा 10(23FE) के तहत, बुनियादी ढांचे में निवेश करने वाले इन फंड्स को लाभांश और ब्याज पर टैक्स में छूट दी गई है. यह छूट मार्च 2030 तक बढ़ा दी गई है, जिससे विदेशी निवेशकों का भरोसा और मजबूत हुआ है.

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Last Updated: 2026-03-16 21:30:19

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Sovereign Wealth Fund: मिडल ईस्ट में छिड़ी जंग के बीच दुनिया भर के बाजारों में हलचल होना लाजिमी है. ऐसी स्थिति में खाड़ी देशों के सॉवरेन वेल्थ फंड्स (SWF) यानी ‘सरकारी धन कोष’ अपनी निवेश रणनीति को फिर से परख सकते हैं. भारत के लिए यह खबर इसलिए अहम है क्योंकि हमारा टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर इन फंड्स की पहली पसंद रहा है. आइए समझते हैं कि ये सरकारी फंड काम कैसे करते हैं और भारत इनके लिए इतना खास क्यों है?

आखिर क्या होते हैं ये सरकारी धन कोष?

सॉवरेन वेल्थ फंड्स यानी सरकारी धन कोष, सीधे शब्दों में कहें तो यह किसी देश की सरकार की ‘तिजोरी’ की तरह है. जिन देशों के पास तेल या प्राकृतिक संसाधनों से खूब पैसा आता है या जिनका विदेशी मुद्रा भंडार बहुत ज्यादा है, वे इस अतिरिक्त पैसे को भविष्य के लिए निवेश करते हैं. ये फंड मुख्य रूप से पांच तरह के होते हैं:

  • बचत निधि: जैसे नॉर्वे का पेंशन फंड, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए पैसा बचाता है.
  • स्थिरीकरण निधि: जो बजट को तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से बचाती है.
  • पेंशन आरक्षित निधि: जैसे कनाडा का फंड, जो रिटायरमेंट की देनदारियों के लिए होता है.
  • रणनीतिक विकास निधि: जो देश के मुख्य उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए निवेश करती है.
  • आरक्षित निवेश निधि: जो बेहतर मुनाफे के लिए विदेशी मुद्रा का पुनर्निवेश करती है.

इन फंड्स की सबसे बड़ी खासियत इनका धैर्य है. इन्हें तुरंत पैसे की जरूरत नहीं होती, इसलिए ये 10 से 20 साल लंबी परियोजनाओं (जैसे सड़क, बिजली घर या पुल) में पैसा लगाने से नहीं हिचकिचाते.

पेंशन फंड से कितने अलग हैं ये?

पेंशन फंड को हमेशा यह चिंता रहती है कि उन्हें एक तय समय के बाद लोगों को पेंशन बांटनी है, इसलिए वे सुरक्षित जगहों पर निवेश करते हैं. इसके उलट, SWF के पास ज्यादा आजादी और लचीलापन होता है. वे जोखिम उठाकर ऊंचे मुनाफे वाली प्राइवेट इक्विटी या बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में लंबे समय तक टिके रह सकते हैं.

भारत में इनका बढ़ता दबदबा

भारत आज इन ग्लोबल फंड्स के लिए निवेश का एक बड़ा केंद्र बन चुका है. हमारे हवाई अड्डों, मोबाइल टावरों और रिन्यूएबल एनर्जी (सौर और पवन ऊर्जा) में इन फंड्स ने बड़ी हिस्सेदारी खरीदी है. आंकड़ों की बात करें तो साल 2025 में इन फंड्स ने भारतीय कंपनियों में करीब 5.7 अरब डॉलर लगाए हैं. कुल निवेश की बात करें तो 2026 की शुरुआत तक भारत में इन फंड्स की कुल संपत्ति लगभग 57 अरब डॉलर तक पहुंच गई है.

टैक्स की छूट और निवेश के नियम

भारत सरकार ने इन फंड्स को आकर्षित करने के लिए नियमों को काफी सरल बनाया है. आयकर अधिनियम की धारा 10(23FE) के तहत, बुनियादी ढांचे में निवेश करने वाले इन फंड्स को लाभांश और ब्याज पर टैक्स में छूट दी गई है. यह छूट मार्च 2030 तक बढ़ा दी गई है, जिससे विदेशी निवेशकों का भरोसा और मजबूत हुआ है.

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